गुजरात हाई कोर्ट ने सूरत के नासिरनगर इलाके में हुए अवैध डिमोलिशन (तोड़-फोड़) मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के कमिश्नर पर कड़ी नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा कि सरकार हाई कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश न करे. इसके साथ ही सवाल उठाया कि जब नगर निगम के छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया, तो कमिश्नर अब तक अपने पद पर कैसे हैं?
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत का काम सिर्फ न्याय करना नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि न्याय होता हुआ दिखाई दे. कोर्ट ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब आरोप सीधे वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं, तब कार्रवाई सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित क्यों है. दरअसल, डिमोलिशन को लेकर 26 याचिकाकर्ताओं ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
याचिका में राज्य सरकार, सूरत नगर निगम, सूरत पुलिस कमिश्नर, स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) के DCP राजदीपसिंह नकुम, एक प्राइवेट बिल्डर, पुलिस के साथ-साथ टोरेंट पावर को भी पक्षकार बनाया गया है. कोर्ट ने कहा कि इस पूरी घटना में नगर निगम कमिश्नर के मोबाइल नंबर की स्पष्ट मौजूदगी रिकॉर्ड में है. इसी मुख्य याचिका में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर सुजल प्रजापति की ओर से भी पक्ष रखा गया.
उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि कमिश्नर ने उनके काम की तारीफ की थी और बड़े अतिक्रमण (एनक्रोचमेंट) पर नजर रखने के निर्देश दिए थे. इस पर कोर्ट ने कहा कि कमिश्नर का मैसेज एफिडेविट में पेश किया गया है. इसके साथ ही आरोप लगाने वाले सस्पेंडेड कर्मचारियों ने भी अपने हलफनामे में साफ कहा है कि उन्होंने म्युनिसिपल कमिश्नर के निर्देश पर ही डिमोलिशन की कार्रवाई की थी.
हालांकि, एडवोकेट जनरल ने एग्जीक्यूटिव इंजीनियर की विश्वसनीयता पर भरोसा करने से इनकार कर दिया. उन्होंने दलील दी कि एग्जीक्यूटिव इंजीनियर सड़क से जुड़े कार्य देखते हैं, ऐसे में डिमोलिशन कार्रवाई से उनका क्या संबंध है? उन्होंने यह भी कहा कि कमिश्नर उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर देंगे. इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार अदालत को गुमराह कर रही है.
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बनाई गई जांच कमेटी के गठन पर उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यह साफ नहीं किया गया कि कमेटी आखिर किस विषय की जांच करेगी. कोर्ट ने पूछा कि जब आरोप सीधे कमिश्नर पर हैं, तो उनसे स्पष्टीकरण क्यों नहीं मांगा गया? कोर्ट ने कहा कि छोटे कर्मचारियों को तो तुरंत सस्पेंड कर दिया जाता है, लेकिन जिस अधिकारी पर सीधे आरोप लगे हैं, वो अब भी पद पर बने हुए हैं.
इससे अदालत को अलग तरह से सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है. कोर्ट ने यह भी कहा कि कमिश्नर ने अपने मोबाइल नंबर से भेजे गए मैसेज से इनकार नहीं किया है. यह भी स्वीकार किया गया है कि संबंधित मैसेज उसी नंबर से फॉरवर्ड किया गया था. ऐसे में जब आरोपों का सामना कर रहा अधिकारी अपने पद पर बना रहेगा, तो निष्पक्ष जांच कैसे संभव होगी? कमिश्नर को साफ नीयत के साथ सामने आना चाहिए.
कोर्ट ने यह भी कहा कि कमिश्नर को किसी ने तोड़-फोड़ के लिए निर्देश दिया है. एक बार अधिकारियों को ऐसी ताकत मिल जाती है, तो वे उसका गलत इस्तेमाल भी कर सकते हैं. अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा, "क्या इस देश में कानून नहीं है? 150 परिवारों को सड़क पर ला दिया." कोर्ट ने एडवोकेट जनरल से कहा कि जिस कमिश्नर के आदेश पर डिमोलिशन हुआ, वही जांच कमेटी का गठन भी कर रहे हैं.