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पिता के सामने उठीं बेटे-बहू और पोतों की अर्थियां, 5 दिन बाद गांव पहुंचे शव... अंतिम यात्रा देख रो पड़ा पूरा इलाका

पांच दिन पहले इस घर में छुट्टियों की बातें हो रही थीं. बच्चों ने शायद अपने बैग खुद पैक किए होंगे. मां ने रास्ते के लिए कुछ जरूरी सामान रखा होगा. फिर एक रात आई... हिमाचल की एक खाई ने सब कुछ निगल लिया. और अब, पांच दिन बाद, उसी घर के बाहर चार एंबुलेंस खड़ी थीं. एक में बेटा था, दूसरी में बहू, और बाकी दो में वे पोते, जिनके लौटने का इंतजार पूरा गांव कर रहा था.

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चंबा हादसे में खत्म हो गया पूरा परिवार. (Photo: ITG)
चंबा हादसे में खत्म हो गया पूरा परिवार. (Photo: ITG)

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के कुथरेल गांव ने शायद ऐसा मंजर पहले कभी नहीं देखा था. गांव की सड़क पर एक के पीछे एक चार एंबुलेंस पहुंचीं. हर एंबुलेंस में एक शव था. किसी में बेटा, किसी में बहू और दो में मासूम पोते. देखते ही देखते पूरा गांव पंचायत भवन के बाहर जमा हो गया. लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ दिन पहले जो परिवार छुट्टियां मनाने निकला था, वह अब ताबूतों में लौट रहा है. हिमाचल प्रदेश के चंबा में हुए सड़क हादसे ने चंद्राकर परिवार की चार जिंदगियां एक साथ छीन लीं.

दरअसल, 29 मई की रात हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में बैरागढ़-साच पास-किलाड़ मार्ग पर एक कार करीब 500 मीटर गहरी खाई में जा गिरी. हादसा इतना भीषण था कि कार में सवार सभी आठ लोगों की मौत हो गई. इन आठ लोगों में चार लोग छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के चंद्राकर परिवार से थे- अरविंद चंद्राकर, उनकी पत्नी प्राची चंद्राकर और उनके दो बेटे दर्श व अक्षद.

father loses son daughter in law and two grandsons chamba car crash heartbroken story

अरविंद चंद्राकर बेंगलुरु में आईटी इंजीनियर थे. परिजनों के मुताबिक, वे करीब 20 साल से आईटी सेक्टर में काम कर रहे थे. पत्नी और दोनों बच्चे भी उनके साथ बेंगलुरु में रहते थे. परिवार अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बाद हिमाचल प्रदेश घूमने गया था. किसी ने नहीं सोचा था कि यह सफर उनका आखिरी सफर होगा.

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हादसे के बाद शवों को निकालने और जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने में कई दिन लग गए. मंगलवार को चारों शव रायपुर एयरपोर्ट लाए गए. वहां से चार अलग-अलग एंबुलेंसों में उन्हें दुर्ग जिले के ग्राम कुथरेल पहुंचाया गया. जैसे ही एंबुलेंस गांव पहुंचीं, माहौल पूरी तरह बदल गया. घरों से लोग बाहर निकल आए. रिश्तेदारों की आंखों में आंसू थे और गांव के बुजुर्ग खामोशी से खड़े थे. गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी ऐसा दृश्य नहीं देखा था.

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पंचायत भवन में चारों शव अंतिम दर्शन के लिए रखे गए. ताबूत खुले तो परिजनों का दर्द फूट पड़ा. महिलाएं बिलख-बिलखकर रोने लगीं. बच्चों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है. कुछ देर बाद चारों की अंतिम यात्रा एक साथ निकली. अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की आंखें नम थीं. पूरे रास्ते सिर्फ सन्नाटा और सिसकियां सुनाई दे रही थीं.

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अरविंद चंद्राकर के पिता श्यामलाल चंद्राकर भिलाई इस्पात संयंत्र से रिटायर कर्मचारी हैं. उन्होंने अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया, उसे इंजीनियर बनते देखा और फिर बेंगलुरु में सफल करियर बनाते भी देखा. लेकिन शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन बेटे, बहू और दोनों पोतों की अर्थियां एक साथ देखनी पड़ेंगी. अंतिम संस्कार की रस्म अरविंद के छोटे भाई रविंद्र चंद्राकर ने निभाई. उन्होंने अपने बड़े भाई, भाभी और दोनों भतीजों को मुखाग्नि दी.

हादसे के बाद क्या हुआ?

घटना के बाद राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी हादसे पर दुख जताया और हिमाचल प्रदेश सरकार से संपर्क कर रेस्क्यू ऑपरेशन में सहयोग की बात कही. बताया गया कि दुर्घटना स्थल बेहद दुर्गम इलाके में था. खाई की गहराई और कठिन परिस्थितियों के बीच शवों को निकालना आसान नहीं था. कुथरेल गांव में शोक है. हर कोई बस यही कह रहा है कि घूमने निकला एक खुशहाल परिवार खत्म हो गया. चार ताबूत, चार अर्थियां और एक ऐसा हादसा, जिसने पूरे गांव को शोक में डुबो दिया.

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