देश के युवाओं में सिगरेट और शराब की लत पहले से ही एक बड़ी समस्या रही है और उनके बीच अब एक नए तरह के नशे का चलन बढ़ रहा है. इसको न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंस (एनपीएस) कहा जाता है. शहरी इलाकों और बड़ी- बड़ी पार्टियों में इसका इस्तेमाल ज्यादा किया जा रहा है. कई युवाओं को लगता है कि शराब या सिगरेट की तुलना में यह ज्यादा आनंद देता है और सेहत के लिए खतरनाक भी नहीं है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ये सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा है. कुछ मामलों में तो ये मौत का कारण तक बन सकता है.
राष्ट्रीय मादक पदार्थ सेवन सर्वेक्षण की साल 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की लगभग 20% आबादी कोई न कोई नशा करती है. इनमें सबसे आम शराब है. इसके बाद भांग और अफीम का नंबर आता है, हालांकि बीते कुछ सालों में ये पैटर्न काफी बदला है. अब न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंस का नशा करने वाले भी बढ़ रहे हैं. इसको लेकर एक्सपर्ट ने चिंता जाहिर की है.
इसके बारे में दिल्ली AIIMS के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर और मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. यतन पाल सिंह बलहारा ने Aajtak.in को डिटेल में बताया है.
क्या होता है न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंस
प्रोफेसर डॉ. यतन पाल सिंह बलहारा बताते हैं कि बीते कुछ सालों में न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंस का नशा करने वालों की संख्या बढ़ गई हैं.ओपीडी में भी इस तरह के केस अब ज्यादा आ रहे हैं .यह देखा जा रहा है कि युवाओं को शराब, सिगरेट जैसी चीजें पुराने शौक लग रहे हैं.
डॉ. बलहारा बताते हैं कि न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंस एक तरह के सिंथेटिक ड्रग्स होते हैं. इनको कई तरह के केमिकल्स की मदद से लैब में तैयार किया जाता है. इनका नशा कोकिन या गांजे जैसा हो सकता है, लेकिन इनमें केमिकल्स का काफी इस्तेमाल किया जाता है. ये दिखने में कैप्सूल और पाउडर जैसे होते हैं.
डॉ बलहारा के मुताबिक, युवाओं को यह भ्रम होता है कि इस नशे से ज्यादा आनंद मिलता है और शरीर को नुकसान नहीं होता, लेकिन ऐसा नहीं है. ये बहुत खतरनाक है. इससे काफी नुकसान हो सकता है. हार्ट बीट के अचानक बढ़ने से लेकर हाई बीपी तक का रिस्क हो सकता है. अधिक डोज जानलेवा भी साबित हो सकती है. लेकिन फिर भी इसका चलन बढ़ रहा है. कई युवाओं में इसकी लत भी देखी जा रही है.
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नशा करना और नशे की लत लगने में क्या अंतर है
किसी चीज का कभी-कभी सेवन करना और उसकी लत लगना ये दोनों अलग-अलग चीजें हैं. इनमें बड़ा अंतर सेल्फ कंट्रोल का है. जब तक आपको खुद पर कंट्रोल है कि किस दिन नशा करना है और किस दिन नहीं तो ये लत नहीं है, लेकिन अगर आपका खुद पर कंट्रोल खत्म है और किसी भी स्थिति में आपको नशा करना ही है तो यह लत है.
उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति हफ्ते में एक या दो बार अपनी इच्छा से शराब, सिगरेट, चरस या गांजा पीता है तो इसे नशा करना कहते हैं. लेकिन जब व्यक्ति खुद पर कंट्रोल खोने लगे और रोजाना इन चीजों का सेवन करने लगे तो यह लत बन जाती है.
लत की सबसे बड़ी पहचान यह है कि व्यक्ति को पता होता है कि इससे उसका शरीर खराब हो रहा है और पैसे भी काफी खर्च हो रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह खुद को रोक नहीं पाता है. ऐसा व्यक्ति समय और हालात भी नहीं देखता है. किसी भी स्थिति में उसको नशा करना ही होता है. ऐसी स्थिति में डॉक्टरों से सलाह लेकर इलाज कराना बहुत जरूरी हो जाता है. इससे लत छूट सकती है.
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नशा छोड़ने के बाद भी लोग दोबारा इसकी गिरफ्त में क्यों आ जाते हैं?
कई लोग दवा, काउंसलिंग और मजबूत इच्छाशक्ति की मदद से नशा छोड़ देते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर से इसकी ओर लौट जाते हैं. इसे मेडिकल भाषा में रिलैप्स कहा जाता है. फिर से नशे की तरफ जाने का सबसे बड़ा कारण पुराना माहौल होता है.अगर व्यक्ति दोबारा उन्हीं दोस्तों के संपर्क में आता है जिनके साथ वह पहले नशा करता था तो उसके फिर से नशा शुरू करने की संभावना बढ़ जाती है.
क्या मानसिक तनाव भी नशे की तरफ धकेलता है?
ऐसे कई केस देखे जाते हैं जहां लोग मानसिक तनाव के कारण नशा करते हैं और उनको इसकी लत लग जाती है. ऐसा इसलिए होता है
क्योंकि किसी भी प्रकार के नशे में ऐसी चीजें होती हैं जो ब्रेन में जाकर असर करती है. नशा करने से शरीर में डोपामाइन हार्मोन ज्यादा रिलीज होता है और व्यक्ति को अच्छा महसूस होता है. यह अच्छा महसूस होना कुछ समय की राहत देता है, लेकिन फिर इस राहत को बार- बार पाने के लिए व्यक्ति नशा करता रहता है.
नशा छुड़ाने का बेस्ट तरीका क्या है
डॉ बलहारा बताते हैं कि नशा छोड़ने के लिए सबसे जरूरी व्यक्ति का निश्चय दृढ़ करना है. आपकी इच्छाशक्ति इसमें एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है. अगर आपने मन में ठान लिया कि इसको छोड़ना है तो आधा काम हो जाता है. इसके साथ ही सही उपचार लेना भी जरूरी है. इसके लिए आप डॉक्टर से सलाह लें. डॉक्टर काउंसलिंग, दवाओं और थेरेपी की मदद से नशे की लत से व्यक्ति को बाहर निकाल सकते हैं.