भारत में दवाओं की कीमतों पर नजर रखने वाली संस्था नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने कैंसर की 543 दवा की कीमतों (MRP) में बदलाव किया है. कुछ दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत से ज्यादा की कमी हुई है, हालांकि, इस राहत के बावजूद कैंसर की कुछ बेहद महंगी दवाओं के दाम में बदलाव नहीं हुआ है.
NPPA ने दवाओं की जो नई कीमत तय की है उसमें ब्रेस्ट कैंसर के कुछ मरीजों को दी जाने वाली दवा पाल्बोसिक्लिब के एक ब्रांड और पैक की कीमत 40,421 रुपये से घटाकर 2,720 रुपये कर दी गई है. इसी तरह कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा थायोटेप की एक शीशी की कीमत करीब 80,072 रुपये से घटकर 7,150 रुपये हो गई है. इसके अलावा डासैटिनिब, लेंवाटिनिब और ओलापैरिब जैसी दवाओं की कीमतों में भी बड़ी कटौती की गई है, लेकिन कैंसर की कुछ दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
कीट्रूडा जैसी महंगी दवाओं के काम कम क्यों नहीं हुए?
कीमतों में कटौती के बावजूद कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ बेहद महंगी दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.इनमें इम्यूनोथेरेपी की दवा कीट्रूडा भी शामिल है. कीट्रूडा का इस्तेमाल 21 से ज्यादा तरह के कैंसर के इलाज में होता है. अभी भी इसकी कीमत 2,16,500 रुपये ही बनी हुई है. ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली रिबोसाइक्लिब की कीमत भी 24,435 रुपये पर ही स्थिर है।. टैग्रिसो , टेसेंट्रिक, डार्ज़ालेक्स और इम्फिन्ज़ी जैसी दवाओं के MRP में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है.
क्यों कम नहीं हुई कुछ दवाओं की कीमत?
मरीजों के हितों की वकालत करने वाले समूह 'ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क' (AIDAN) से जुड़ीं मालिनी ऐसोला ने इस बारे में बताया है. वह कहती हैं कि पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव न आने का एक कारण यह है कि सरकार ने बहुत सोच-समझकर उन दवाओं को इसमें शामिल नहीं किया है, जो 'पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम' (PAPs) के तहत मुफ्त में दी जाती हैं.
PAP के तहत, दवा कंपनियां प्रिस्क्रिप्शन वाली दवाएं मुफ्त या भारी छूट पर उपलब्ध कराती हैं. उदाहरण के लिए, कैंसर के मरीजों को दो शीशियों का भुगतान करने पर तीसरी शीशी मुफ्त दी जा सकती है. उन्होंने कहा कि हम PAP को बाहर रखे जाने के खिलाफ रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि इससे अस्पतालों और बिचौलियों को भारी मुनाफा कमाने का मौका मिल जाता है.
ऐसोला ने यह भी बताया कि कई मामलों में कीमतों में की गई भारी कटौती एक ऐसे उदार फॉर्मूले के तहत है, जो अस्पताल या वितरक को अभी भी 42.8% का मुनाफा देता है. अगर सरकार ने इतना अधिक मुनाफा मार्जिन रखने की अनुमति न दी होती, तो कीमतों में और भी ज्यादा कमी आई होती.
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दवाओं के मार्जिन पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
कैंसर की दवाओं की बढ़ती कीमतों और दवा से जुड़े कारोबार में रखे जाने वाले मार्जिन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी सवाल उठे हैं. अदालत देश में कीमतों के दायरे से बाहर आने वाली सभी दवाओं पर मार्जिन की सीमा तय करने पर विचार कर रही है. इस मामले में आदेश सुरक्षित रखा गया है.
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इलाज का खर्च सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं
कैंसर के इलाज का खर्च केवल दवाओं तक की सीमित नहीं है. कैंसर के मरीजों को सर्जरी करानी होती है. कई तरह के टेस्ट होते हैं और अस्पताल में भर्ती के लिए भी काफी खर्चा होता है. हालांकि दवाओं की कीमतों में कमी से मरीजों को राहत तो मिलेगी, लेकिन हर दवा पर ये नियम लागू होना जरूरी है. NPPA द्वारा 137 नॉन-शेड्यूल कैंसर ड्रग्स के लिए ट्रेड मार्जिन को MRP के 30% तक सीमित करने के फैसले के बाद, संशोधित कीमतें 9 नवंबर से लागू हो जाएंगी.