सुबह-सुबह गाजियाबाद से दिल दहलाने वाली खबर आई. तीन किशोर लड़कियों ने एक सोसायटी में नौवीं मंजिल के फ्लैट से कूदकर जान दे दी. दिनभर चली तमाम चर्चाओं के बीच कोरियन टॉस्क बेस्ड गेम वाला एंगल भी सामने आया. हालांकि घटना में कई ट्विस्ट-टर्न आते रहे, लेकिन कोरियन गेम वाले एंगल ने मामले में ज्यादा ध्यान खींचा. बीते कुछ वर्षों में इंटरटेनमेंट की पीठ पर बैठकर देश में भी कोरियन कल्चर अपनी जगह बना रहा है. यूथ K-Pop, K-Drama और K-Games में खास दिलचस्पी ले रहे हैं. लेकिन सवाल K-Games को लेकर है, क्योंकि ये अब जानलेवा हो रहे हैं, लेकिन क्यों?
कोरियन कल्चर हो रहा है हावी
कई इंस्टा रील्स पर कंटेट क्रियेटर्स अपनी क्रिएटिविटी में कोरियन बिहेवियर को भी शामिल कर रहे हैं. उनके बोलने के अंदाज, एक्सप्रेशन और यहां तक कि टिफिन बॉक्स पर भी कोरियन कल्चर हावी होता दिख रह है और स्क्रॉल्स के जरिए लोगों के बीच पॉपुलर हो रहा है. प्रॉब्लम यहां से शुरू हो रही है, जब ये पॉपुलैरिटी हैबिट में बदल रही है और हैबिट ऐसी जिसे छोड़ने के लिए सोचना भी टेंशन भरा है. किशोर पन से जवानी की दहलीज पर कदम रख रहे बहुत बड़े एज ग्रुप के लिए ये एक नई टेंशन है, जहां पहले से ही दुनिया प्रेशर में है, K-Games नया प्रेशर जोन क्रिएट कर रहे हैं.
हर दिन नया चैलेंज, हर दिन नए टास्क
यानी आज के टीनएजर और न्यू यूथ घंटों ऑनलाइन गेमिंग और टास्क-बेस्ड डिजिटल वर्ल्ड में डूबे हुए हैं. जहां हर दिन नए चैलेंज हैं, एक सख्त टाइम लिमिट है और जहां लूजर होने का मतलब बेइज्जती. और इसे सह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. दुनिया के कई हिस्सों में, खासकर एशिया में, 'कोरियन गेम्स और टास्क-बेस्ड डिजिटल एक्टिविटीज़' से जुड़ी ऐसी खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं.
सवाल यह नहीं कि एक गेम जानलेवा कैसे हो सकता है? असली सवाल ये है कि 'कोरियाई गेमिंग'की दुनिया में ऐसा क्या है कि एक खेल, टास्क और लाइफ के बीच की बारीक लाइन को मिटा देता है? इसका जवाब सिर्फ एल्गोरिदम में नहीं, बल्कि कोरिया की सदियों पुरानी रहस्यमयी परंपराओं में छिपा है.

ऊपरी तौर पर साउथ कोरिया को मॉडर्न टेक्निक, ई-स्पोर्ट्स एरीना, हाई स्पीड इंटरनेट और के-पॉप की चमक से पहचाना जाता है. सियोल की हाईराइज बिल्डिंग्स और चौबीसों घंटे खुले गेमिंग कैफ़े उसकी नई पहचान हैं, लेकिन इसी कोरिया के नीचे एक और कोरिया सांस लेता है, जो शमनवाद (वहां की रहस्यभरी प्राचीन परंपरा), लोककथाओं, आत्माओं और उनसे जुड़े अनुष्ठानों से बना है.
तनाव, अकेलापन और मेंटल प्रेशर
यही वजह है कि जब कोरियन गेम्स बन रहे हैं तो उनका पहला मोटो भले ही मनोरंजन हो, लेकिन वो अनजाने में (या जानबूझ कर) उस क्लास को टारगेट कर रहे हैं जो इस बदलती दुनिया में खुद को भीड़ के बीच भी अकेला महसूस कर रहे हैं. ऐसे में ये गेम ऐसा मेंटल एक्सपीरियंस बनकर सामने आते हैं, जहां प्लेयर खुद को उस गेम के पीछे बुनी गई स्टोरी लाइन का हिस्सा मानने लगते हैं.
कोरियन गेम्स का लाइफ पर असर
'Squid Games', 'Alice in Borderland', 'Sweet Home' जैसे k-ड्रामा में दिखाए गए गेम्स हों या ऑनलाइन कोरियन टास्क-बेस्ड गेम्स हर जगह एक जैसे पैटर्न दिखता है. जहां नियम बेहद सख़्त हैं, टाइम बहुत कम है, गलती हुई तो उसकी पनिशमेंट बहुत बुरी है और हार की तो कोई जगह ही नहीं है, वहां हार मतलब बाहर होना नहीं, बल्कि मौत है.
यानी हारने के बाद जिंदगी का कोई मतलब नहीं. या फिर ऐसा कि मरकर ही आप दोबारा इस गेम का हिस्सा बन सकते हो, वो भी नई लाइफ लाइन, नई टइमिंग, नए टास्क और नई ऊर्जा के साथ. ये थॉट जितना कूल दिख रहा है, असल में ये बेहद डार्क है. यहीं से कोरियन कल्चर का रहस्यवाद हावी हो जाता है. जिसमें आत्माओं का अनुष्ठान और पुनर्जन्म जैसे शब्द अलग ही व्याख्या के साथ शामिल हो जाते हैं.
ऑनलाइन गेम्स में यह 'बाहर होना' भले ही डिजिटल होता है, लेकिन मेंटल लेवल पर इसे एक्सेप्ट कर पाना मुश्किल हो जाता है और डिजिटल दुनिया में अपमान की तरह बन जाता है. खासकर टीनएजर्स के लिए, जो आज के दौर में आइडेंटिटी क्राइसिस और इस दुनिया में अपनी एक्सेप्टेंस खोज रहे हैं. यहीं से ऑनलाइन गेम्स और टास्क एक 'मेंटल प्रेशर सिस्टम'में बदल जाता है.
कोरियन प्राचीन परंपरा, जिनकी झलक इन गेम्स में है
अब यहां उस प्राचीन कोरियन परंपरा का जिक्र जरूरी हो जाता है, जिसकी झलक इन सीरीज और गेम्स में दिखाई देती है. कोरिया में आस्था की सबसे पुरानी परंपरा यहां के 'शमनवाद (मुइज़्म)' से निकली है. इसमें 'मुदांग' यानी शमन, इंसानों और आत्माओं की दुनिया के बीच एक ब्रिज की तरह माने जाते थे. शमन अनुष्ठानों में डर, पीड़ा और मानसिक टूटन कोई हादसा नहीं, बल्कि प्रोसेस का हिस्सा होती थी.
शमनवाद की जड़ों में जो असल विचार था, उसमें कहा जाता था कि 'परीक्षा के बिना शुद्धि नहीं'और जो कष्ट सहकर निकलता है वही आगे बढ़ सकता है. दुनिया भर की तमाम जिम में पसीना बहाते बॉडी बिल्डर्स के पोस्टर्स के साथ लिखे क्वोट 'No Pain No Gain' का रूट कनेक्शन कोरियन कल्चर ही है. साल 2024 में आई कोरियन रॉम-कॉम टीवी सीरीज 'नो गेन नो लव' इसी कॉन्सेप्ट को नाम बदलकर इस्तेमाल करती है.

शमनवाद से निकली ऐसी ही फिलॉसफी कोरियन गेम्स के भीतर भी मौजूद हैं. यानी एक परंपरा जो मॉडर्न सोसायटी में तो नजर नहीं आती लेकिन डिजिटल वर्ल्ड में जिंदा हो जाती है. यहां टास्क, टेस्ट के बराबर हो जाता और एलिमिनेशन बहुत चुप्पी के साथ आपके अयोग्य होने का ऐलान कर देता है और सर्वाइवल आपको योग्य बनाता है. यानी जीतने की तो बात है ही नहीं, बात जिंदा रहने की है, लड़ते रहने की है और संघर्ष जारी रखे रहने की है.
गेम कैसे बन जाता है जिंदगी का हिस्सा?
ये सीधे-सीधे जिंदगी का हिस्सा बन जाती है और फिर हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब असल जिंदगी के बजाय गेम के भीतर ही जिंदगी जीने लगे हैं. मौत कठिन वहां भी होती हैं, लेकिन वहां गेम का हिस्सा रहती है. प्लेयर वहां मरता है तो उसे खुद की मौत मान लेता है. और सभी धर्मों में ये बात बहुत साफ-साफ कही गई है कि मरने से बड़ी बात है खुद को मरा हुआ मान लेना. ऑनलाइन टास्क बेस्ड गेम प्लेयर्स के साथ यही हो रहा है. वो हमारे लिए, सोसायटी के लिए या सोसायटी के सामने बाद में मर रहे हैं, लेकिन गेम में उनकी डेथ पहले ही हो गई है.
कोरियाई कहानियों के किरदार, जो गेम में शामिल हो चुके हैं
कोरियाई लोककहानियों के किरदार भी सीधे गेम्स की दुनिया में उतर आए हैं, जो वैसा ही असर डाल रहे हैं, जैसा उन्होंने कहानियों को मोड़ने में अपनी भूमिका निभाई है. जैसे कोरियन लोककथा का किरदार 'डोक्काएबी'जो पूरी तरह राक्षस नहीं है, लेकिन उसकी चालाकी और नैतिकता के बीच धुंधली लाइन है. डोक्काएबी को 'Rainbow Six Siege' गेम में 'अटैकिंग ऑपरेटर' के किरदार में देखा जाता है, जहां इसका नाम ग्रेस है. डोक्काएबी गेम में दुश्मनों के फोन हैक कर लेती है और उनकी लोकेशंस बताती है. आपने 'Gen-Z' के बीच ये स्लैंग सुना होगा, 'हैकर है भाई हैकर' ये स्लैंज Gen-Z उसके लिए इस्तेमाल करते हैं जो इन्फॉर्मेशन निकाल लेता हो या कुछ बोल्ड स्टेप लेता है.
इसी तरह एक और किरदार है 'गुमीहो' जो नौ-पूंछों वाली लोमड़ी है. ये प्रेम, धोखे और त्रासदी का सिंबल है. गुमिहो कई गेम्स में अपनी इसी छल वाली ताकत के साथ मौजूद है. Black Desert Online और League of Legends में गुमिहो नजर आती है. कोरियन गेम्स इन किरदारों को विलेन या सिर्फ हीरो तक ही सीमित नहीं करते हैं, बल्कि इनके जरिए वे प्लेयर्स के फैसलों की नापतौल भी करते हैं. ये कोरियाई थॉट प्रोसेस को ही दिखाता है, जहां अच्छाई और बुराई के बीच कोई शॉर्प लाइन नहीं होती है.
कोरियन सोसयाटी में कंपटीशन का प्रेशर
दक्षिण कोरिया की सोसायटी दुनिया की ऐसी सोसायटी है, जहां कंपटीशन चरम पर है. पढ़ाई, जॉब और परफॉर्मेंस का प्रेशर वहां भी है. गेम्स और ड्रामा इस प्रेशर का आईना हैं, लेकिन जब यही गेम्स भारत जैसे देशों में पहुंचते हैं और बिना किसी गेटकीपर और बिना किसी कल्चरल रेफरेंस के आसानी से हैबिट में शामिल हो जाते हैं तब धीरे-धीरे खतरनाक बनने लगते हैं.

गाजियाबाद की घटना में अगर इस थॉट प्रोसेस की मौजूदगी है (हालांकि पुलिस ने सुसाइड में गेम एंगल से इनकार किया है) तो ये सिर्फ चौंकने के लिए बज रहा अलॉर्म नहीं है, बल्कि अब समय है कि इसे सुनकर एक्टिव हो ही जाना चाहिए. क्योंकि ऐसे गेम्स में प्लेयर उसमें छिपी फिलॉसफी के साथ तो जुड़ जाता है, लेकिन उसे उस सिक्योरिटी सिस्टम का पता ही नहीं है, जो उन पारंपरिक अनुष्ठानों में मौजूद था. आप यूं समझिए कि आप बिना लाइफ जैकेट पहने वाटर डाइविंग के लिए गहरे पानी में छलांग लगा चुके हैं.
भारतीय परंपराओं में क्या है खेल?
इसके उलट भारतीय परंपरा में खेल जीवन का हिस्सा है, जीवन का फैसला नहीं और जहां जीवन का फैसला खेल करता है (जैसे महाभारत में) तो उसका क्या रिजल्ट होता है, ये हम जानते ही हैं, लेकिन असल खेलों में हार के बाद भी फिर से मौके की बात होती है, खात्मे की नहीं. कोरियन गेम्स में हार अक्सर अस्तित्व पर ही सवाल उठा देती है. यही फर्क दोनों संस्कृतियों को अलग करता है.
वो सवाल, जिसका जवाब हमें खोजना है..
आज जब गेमिंग ऐप्स, ऑनलाइन टास्क और वर्चुअल चैलेंज हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं, तो सवाल सिर्फ कोरियन गेम्स या ऐसे किसी थॉट प्रोसेस वाले गेम का नहीं है, असल सवाल ये है कि 'क्या हमारे बच्चे खेल खेल रहे हैं, या खेल ही हमारे बच्चों के साथ खिलवाड़ कर रहा है? क्या हम इस खतरनाक सवाल को सुन पा रहे हैं?