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जब विजय को झुकाने पर अड़ गई थीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता! रोक दी गई फिल्म, इवेंट में हुआ 'अपमान'

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री बनने जा रहे सुपरस्टार विजय को कभी उसी कुर्सी की ताकत ने बड़ी मुश्किल में डाल दिया था. 2013 में विजय की फिल्म थलाइवा पूरे भारत में समय पर रिलीज हो गई, सिवाय उनके अपने राज्य तमिलनाडु के. जयललिता सरकार ने रिलीज रोकने को लेकर ऐसे गेम खेले कि लोगों को विजय को देखकर दया आती थी.

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विजय और जयललिता का पंगा किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म से कम नहीं था! (Photo: ITGD)
विजय और जयललिता का पंगा किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म से कम नहीं था! (Photo: ITGD)

सुपरस्टार विजय को सोशल और पॉलिटिकल चेंज की बात करने वाली फिल्मों ने पहले जनता का 'थलपति' (सेनापति या लीडर) बनाया. अब चुनावों में शानदार जीत के बाद थलपति विजय, मुख्यमंत्री की शपथ लेने से बस एक कदम दूर हैं. लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब इस मुख्यमंत्री की कुर्सी ने विजय के लिए तगड़ी आफत खड़ी कर दी थी. ये बात एक दशक से ज्यादा पुरानी है और तब इस कुर्सी पर बैठी थीं 'थलाइवी' के नाम से मशहूर स्वर्गीय जयललिता.

बड़े स्टार्स से खूब होते थे जयललिता के पंगे
तमिलनाडु में सुपरस्टारडम को पॉलिटिकल ताकत में बदला था MGR (मरुथुर गोपालन रामचंद्रन) ने. MGR ने जब अपनी अलग पार्टी AIADMK बनाई तो फिल्मी स्टारडम से कमाए अपने फैन्स को ही अपना कार्यकर्ता बना लिया. MGR की करीबी रहीं जयललिता भी तमिलनाडु सिनेमा में टॉप एक्ट्रेस रह चुकी थीं. और MGR के निधन के बाद AIADMK से वही मुख्यमंत्री बनीं.

शायद यही वजह है कि वो इरादतन ऐसे एक्टर्स पर नकेल कसने की कोशिशें करती रहती थीं, जिनके साथ तगड़ा फैन सपोर्ट होता था और जो गाहे-बगाहे पॉलिटिक्स की खिड़की खोलकर देखते रहते थे. उन्हें इस बात का तो फर्स्ट हैंड अनुभव था ही कि तमिलनाडु की पॉलिटिक्स में फिल्म स्टारडम कितना बड़ा हथियार साबित होता है. सुपरस्टार रजनीकांत से जयललिता की पंगेबाजी की कई कहानियां हैं. जहां रजनीकांत को फैन्स ने 'थलाइवा' (बॉस या सुप्रीम लीडर) टाइटल दिया था, वहीं जयललिता का टाइटल था 'थलाइवी'— थलाइवा का फीमेल वर्जन.

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रजनीकांत के अलावा जयललिता ने एक्टिव पॉलिटिक्स में आ चुके तमिल स्टार, 'कैप्टन' विजयकांत से भी बहुत पैंतरेबाजी की थी. 2013 में जयललिता सरकार ने कमल हासन की विश्वरूपम की राह में बहुत रोड़े अटकाए थे. ऐसे में पॉलिटिक्स में ताकझांक करते विजय को भी जयललिता की तिरछी नजर का सामना करना पड़ा था.

जब 'थलपति' की राह में 'थलाइवी' बन गईं बैरिकेड!
2000 के दशक की शुरुआत से ही विजय ऐसी फिल्में करने लगे थे जो सरकारी व्यवस्था और पॉलिटिक्स पर सवाल उठाती थीं. तमिलनाडु की जनता को ये तभी से समझ आने लग गया था कि विजय राजनीति में उतरना तो चाहते ही हैं, ऐसा होगा कब वो अलग सवाल था. विजय के पिता, तमिल सिनेमा के बड़े डायरेक्टर एस ए चंद्रशेखर भी बता चुके थे कि वो ऐसा ही चाहते हैं. 2009 में चंद्रशेखर ने अपने बेटे के सारे फैन क्लब्स को एक बड़े संगठन में बदल दिया, जिसे VMI (विजय मक्कल इयक्कम) के नाम से जाना जाता था.

इसी VMI को विजय ने 2024 में अपनी पार्टी TVK में बदला है. लेकिन 2010 के बाद से ही विजय और उनके पिता के कई बयान और एक्टिविटीज से राजनीतिक महक आने लगी थी. धमाका तब हुआ, जब चंद्रशेखर ने विजय को लेकर फिल्म बनाई थलाइवा. इस फिल्म की टैगलाइन थी— टाइम टू लीड यानी अब नेतृत्व करने का वक्त आ गया है! 8 अगस्त 2013 को ये फिल्म थिएटर्स में रिलीज होने वाली थी. मगर उससे पहले कई फिल्म थिएटर्स को किसी अनजान संगठन से बम धमाकों की धमकी मिलने लगी. मुख्यमंत्री जयललिता की तमिलनाडु सरकार ने सुरक्षा कारणों से फिल्म रिलीज करने से इनकार कर दिया. 8 अगस्त को थलाइवा पूरे देश में रिलीज हो गई, सिवाय विजय के अपने ही राज्य तमिलनाडु के.

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रिपोर्ट्स बताती हैं कि जयललिता खुद फिल्म के टाइटल 'टाइम टू लीड' से आहत थीं और चंद्रशेखर-विजय को इसे बदलने के लिए कहा गया था. विजय और उनके पिता जयललिता से मिलने भी पहुंचे मगर उन्हें बिना मुलाकात लौटना पड़ा. टैगलाइन बदलने के बाद नया मसला एंटरटेनमेंट टैक्स का आ गया. 2006 से तमिलनाडु में, तमिल टाइटल वाली फिल्मों को एंटरटेनमेंट टैक्स में छूट मिला करती थी.

रिपोर्ट्स बताती हैं कि थलाइवा इसी आधार पर डिस्ट्रीब्यूटर्स को बेची गई थी की टैक्स में छूट मिलेगी, तो आपको फायदा अच्छा होगा. मगर एक बात सब जानते हैं— अगर सरकार पीछे पड़ गई, तो कौन बच पाया है! 8 अगस्त को बाकी देश में तो थलाइवा रिलीज हो ही चुकी थी. तमिलनाडु में विजय के तलबगारों तक पाइरेटेड वर्जन पहुंचने लगे. डिस्ट्रीब्यूटर्स का गला सूखने लगा, कहीं रिलीज की इजाजत मिलने तक फिल्म की ऑडियंस ही खत्म न हो जाए.

आखिरकार थलाइवा की टैगलाइन ‘टाइम टू लीड’ हटाई गई. विजय ने वीडियो मैसेज शेयर किया― फैन्स से मेरी अपील है कि शांति बनाए रखें और मुख्यमंत्री जयललिता पर मुझे पूरा विश्वास है कि वो पाइरेसी को रोकने के लिए कदम उठाएंगी और फिल्म रिलीज की इजाजत देंगी. मैंने खुद उनसे मीटिंग की दरख्वास्त की है ताकि मैं सामने से समझा सकूं कि ये फिल्म केवल एक एंटरटेनर है. इसमें कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं छुपा है.

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अंततः 20 अगस्त को विजय की थलाइवा तमिलनाडु में रिलीज हो पाई. तबतक यूएस, यूके और मलेशिया में फिल्म हिट हो चुकी थी. केरल और आंध्रप्रदेश में भी. मगर पाइरेसी ने ऐसा खेला किया कि तमिलनाडु में फिल्म फायदेमंद नहीं साबित हुई. कई साल बाद थलाइवा के प्रोड्यूसर रमेश ने बताया कि घाटे की भरपाई के तौर पर विजय ने उन्हें अपनी आधी फीस लौटा दी थी.

मगर जयललिता नई शायद विजय को अभी 'दिल से माफ' नहीं किया था! थलाइवा की रिलीज के एक महीने बाद तमिलनाडु सरकार ने इंडियन सिनेमा के सौ साल सेलिब्रेट करने के लिए एक शानदार इवेंट किया. इस इवेंट में बाकी तमाम फिल्मी नाम स्टेज के सामने वाली सीटों पर थे. लेकिन रजनीकांत के बॉक्स ऑफिस भौकाल को चैलेंज करना शुरू कर चुके 'थलपति' विजय को, पीछे की आखिरी लाइन में सीट दी गई थी.

जयललिता सरकार के इवेंट सबसे पीछे कुछ ऐसे बैठे दिखे थे विजय (Photo: X/@PeaceBrwVJ)

करीब आधे इवेंट में अपने आसपास की खाली कुर्सियों के बीच विजय अकेले बैठे नजर आए. लेकिन बाद में तमिल स्टार विक्रम और जयललिता से टक्कर ले चुके रजनीकांत की बेटी, डायरेक्टर-सिंगर ऐश्वर्या रजनीकांत विजय के बगल में जाकर बैठे.

जयललिता पर विजय का पलटवार
विजय ने बदला लिया 2018 में आई अपनी फिल्म सरकार से. विजय का हीरो यूएस से आया एक बड़ा कॉरपोरेट खिलाड़ी था, जो वोट करने तमिलनाडु लौटता है तो पाता है कि उसकी जगह कोई वोट डाल चुका है. वोट चोरी के खिलाफ उसकी लड़ाई, सरकार और मुख्यमंत्री को भी लपेट लेती है. फिल्म में जयललिता सरकार की कई योजनाओं की धज्जियां उड़ाईं. कहानी में, मुख्यमंत्री पद की दावेदार, पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी कोमलवल्ली विलेन थी. जो अपने पिता की तरफ से, विजय से दो-दो हाथ करने विदेश से लौटी है. दिलचस्प फैक्ट― जयललिता का नाम उनके प्राइमरी स्कूल के दिनों में कोमलवल्ली मिलता है!

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सरकार रिलीज हुई तो तमिलनाडु में जयललिता की पार्टी AIADMK की सरकार थी. हालांकि तबतक जयललिता का निधन हो चुका था. लेकिन पार्टी ने खूब बवाल काटा और मामला हाईकोर्ट तक गया. तब जाकर मेकर्स ने फिल्म में 5 सेकंड की फुटेज हटाई, 3-4 जगह ऑडियो म्यूट किया, ताकि जयललिता वाले रेफरेंस थोड़े छुप जाएं और सरकार की नई कॉपी थिएटर्स में भेजी. लेकिन तबतक डैमेज तो हो चुका था!

अब जब विजय खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे तो जरूर उन्हें वो दिन याद आएंगे जब इसपर बैठीं जयललिता से मिलने के लिए वो परेशान थे. संभव तो ये भी है कि 2010 के आसपास डायरेक्ट पॉलिटिक्स में आने से बच रहे विजय को जयललिता वाली घटना ने राजनीतिक ताकत के लिए और पुश किया हो! देखना ये भी होगा कि अब खुद जयललिता वाली कुर्सी पर बैठने जा रहे विजय क्या उदाहरण सेट करते हैं. मगर इस कहानी की वजह से ही जब विजय कुर्सी पर बैठेंगे, तो ये मोमेंट सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, सिनेमैटिक भी होगा!

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