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सिनेमा का थलपति बनेगा तमिलनाडु का ‘जन नेता’? या चुनाव से पहले CBFC की कैंची साबित होगी स्पीड ब्रेकर

तमिलनाडु चुनाव 2026 में विजय की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही फिल्म जन नायगन रिलीज से पहले ही अटक गई. इस फिल्म के जरिए फैन बेस को वोट में बदलने की कोशिश अधूरी रह गई. किसी को ये संयोग लगा, किसी को साजिश! अब सवाल ये है कि बिना इस सिनेमाई सपोर्ट के, विजय चुनावी मैदान में जीत पाएंगे?

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जन नायगन फिल्म के अटकने से कैसे बिगड़ा विजय का खेल? (Photo: ITGD)
जन नायगन फिल्म के अटकने से कैसे बिगड़ा विजय का खेल? (Photo: ITGD)

तमिलनाडु चुनाव 2026 में वोटिंग शुरू होने के साथ ही सुपरस्टार से नेता बने विजय जोसेफ का टेस्ट भी शुरू हो गया है. वोटिंग शुरू होने के साथ ही जनता को बार-बार विजय की फिल्म जन नायगन (हिंदी टाइटल- जन नेता) बहुत याद आ रही है. विजय के राजनीतिक टेस्ट की कुंजी मानी जा रही जन नायगन 9 जनवरी 2026 को रिलीज होनी थी, चुनाव से तीन महीने पहले.

विजय ने घोषणा कर दी थी कि ये उनके एक्टिंग करियर की आखिरी फिल्म है. लेकिन जन नायगन विजय के करियर का आखिरी पड़ाव भर नहीं थी. इन तीन महीनों में ये फिल्म विजय के पॉलिटिकल डेब्यू के लिए मजबूत मंच तैयार करने वाली थी. मगर सेंसर बोर्ड के टेबल पर जन नायगन का अटकना सिर्फ सिनेमाई मसला नहीं रहा. ये तमिलनाडु चुनाव 2026 में बड़ा मैटर साबित होने वाला है.

चुनाव से पहले ‘जन नायगन’: विजय का सबसे बड़ा राजनीतिक दांव
विजय के फिल्मी करियर का सुर 2010 के बाद से ही लगातार बदला है. वे सिर्फ जनता की सीटियां-तालियां बटोरने वाले एंटरटेनर के रोल में नहीं रहे. विजय, व्यवस्था से टकराने वाला, भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होने वाला और आम आदमी के पक्ष में बोलने वाला हीरो बनने लगे.

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जन नायगन इस इमेज का सबसे बड़ा पोस्टर होने वाली थी— एक ऐसी फिल्म, जहां कहानी से ज्यादा हीरो विजय का संदेश मायने रखता. जहां पर्दे का किरदार और असल जिंदगी का राजनीतिक चेहरा, लगभग एक हो जाता. जनता ने जिस हीरो को 'थलपति' यानी 'सेनापति' का टाइटल दिया, वो अपने फैन्स की सेना लेकर 'जन नेता' बन जाता.

तमिलनाडु में फिल्मों का राजनीतिक मंच बन जाना नया नहीं है. पहले करुणानिधि, फिर MGR इसी रास्ते से मुख्यमंत्री बने. फिर जयललिता ने भी यही रास्ता पकड़ा. लेकिन बाद में यह रास्ता उतना सीधा नहीं रहा. कमल हासन ने राजनीतिक कदम उठाए, अपनी पार्टी बनाई. लेकिन उनकी हीरो इमेज सीधे वोट में नहीं बदल सकी.

रजनीकांत की पॉलिटिकल एंट्री का इंतजार जनता ने सालोंसाल किया. लेकिन उन्होंने इतना लेट कर दिया कि फिर जनता ने ही ध्यान नहीं दिया. यानी सिनेमा से राजनीति तक का यह पुल अब पहले जितना आसान नहीं है. विजय इसी चुनौतीपूर्ण रास्ते पर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे— और जन नायगन इस कोशिश का सबसे अहम हिस्सा थी.

चुनाव 2026 से पहले ‘फैन्स' को 'वोटर’ बनाने की कोशिश
तमिलनाडु की राजनीति में व्यक्तित्व का असर बेहद गहरा रहा है. यहां नेता सिर्फ नीतियों से नहीं, अपनी पॉलिटिकल इमेज से भी पहचाने जाते हैं. विजय के पास यह आधार पहले से मौजूद है. उनका फैन बेस बड़ा है और संगठित भी. लेकिन राजनीति में यह पर्याप्त नहीं होता. फैन को वोटर में बदलना पड़ता है.

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जन नायगन इसी बदलाव का माध्यम बन सकती थी. फिल्म के जरिए विजय खुद को उस भूमिका में पेश करना चाहते थे, जो पर्दे से निकलकर सीधे वास्तविक राजनीति में फिट हो जाए— एक ऐसा चेहरा, जो व्यवस्था से सवाल करता है और जनता के साथ खड़ा दिखता है. अगर यह फिल्म चुनाव से पहले रिलीज होती, तो उसका असर कई स्तरों पर दिखता. एक तरफ यह उनके समर्थकों को और मजबूत करती, दूसरी तरफ कन्फ्यूज मतदाताओं के बीच उनकी एक स्पष्ट राजनीतिक छवि बनाती.

आज के समय में फिल्मों का असर सिर्फ थिएटर्स तक सीमित नहीं रहता. उसके डायलॉग, सीन्स और मैसेज, व्यापक चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं. चुनाव से ठीक पहले ऐसा प्रभाव, किसी भी रूटीन प्रचार से कहीं ज्यादा असरदार हो सकता था. यानी जन नायगन सिर्फ एक फिल्म नहीं थी. बड़ी सावधानी से तैयार किया गया मोमेंट थी— जहां सिनेमा और राजनीति एक-दूसरे में घुलते हुए नजर आते.

चुनाव से पहले फिल्म अटकना किसके लिए फायदेमंद?
तमिलनाडु की दो प्रमुख ताकतें— द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (DMK) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (AIADMK); लंबे समय से सत्ता के केंद्र में रही हैं. इनके बीच का संतुलन काफी हद तक तय रहा है.

DMK की विरासत तमिलनाडु का वो सिस्टम है, जो आरक्षण और बाकी सिद्धांतों के जरिए सामाजिक न्याय की बात करता है. लेकिन फिर भी तमिलनाडु की एक पूरी नई पीढ़ी को रोजगार और भविष्य के लिए इस सिस्टम से उम्मीद नहीं है. और DMK की राजनीति खुद अब एक ही परिवार की विरासत बन चुकी है. दूसरी तरफ AIADMK पहले MGR और फिर जयललिता के पर्सनालिटी कल्ट के भरोसे चलती है. उनके राजनीतिक समाधान जनता से ताली बटोर लेने वाले ज्यादा होते हैं, जमीन पर असर दिखाने वाले कम.

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ऐसे में विजय जैसे बड़े चेहरे की मौजूदगी में लोगों को इस संतुलन को बदलने की उम्मीद दिखी. थुपक्की (2012), कत्थी (2014) और मर्सल (2017) जैसी फिल्मों में विजय ने कॉर्पोरेट शोषण, किसानों की ज़मीन, मेडिकल करप्शन और सरकारी मशीनरी पर सीधे सवाल उठाए. इन फिल्मों ने सिर्फ सिस्टम की आलोचना नहीं की, बल्कि विरासत में मिली सत्ता पर भी सवाल उठाए. विजय की आखिरी फिल्म जन नायगन, उनके इस पॉलिटिकल एजेंडे को एक बड़ी मुहीम में बदलने का काम कर सकती थी.

युवा और शहरी मतदाताओं में विजय की पहले से बनी पैठ को ये फिल्म और मजबूत करने की कोशिश में थी. और ये वोट बैंक किसी भी चुनाव की दिशा-दशा तय करता है. इसलिए विजय की एंट्री को सिर्फ एक नए खिलाड़ी का डेब्यू नहीं थी, खेल बदलने का चांस होने वाली थी.

दूसरी तरफ, तमिलनाडु में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटीं राष्ट्रीय पार्टियों के लिए भी विजय एक महत्वपूर्ण चेहरा बन गए. वो संभावित पार्टनर भी हो सकते हैं और समीकरण बिगाड़ने वाला एलीमेंट भी. ऐसे में जन नायगन का अटकना, विजय के समर्थकों को महज एक फिल्म का मामला नहीं लगता. उन्हें इसमें राजनीतिक पेंचबाजी भी नजर आती है. तमिलनाडु के चुनावों से ठीक पहले ऐसी स्थिति को महज संयोग मानना आसान नहीं है!

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बिना फिल्म के, क्या वही असर बन पाएगा?
अब विजय के फैन्स बार-बार यही सोच रहे हैं कि अगर जन नायगन समय पर दर्शकों तक पहुंच जाती, तो क्या चुनावी दंगल में विजय का भौकाल बड़ा हो जाता? तमिलनाडु का इतिहास बताता है कि सिनेमा, राजनीति को प्रभावित करने का दम तो रखता है. आज ये असर पहले जितना भले न लगता हो, लेकिन विजय के मामले में शायद खेल बदल सकता था. विजय के पास लोकप्रियता है, समर्थन का बड़ा आधार है और एक बनती हुई राजनीतिक इमेज भी है. लेकिन उसे वोट में बदलने के लिए जिस निर्णायक क्षण की जरूरत थी, जन नायगन वही बन सकती थी.

ये कहानी अधूरी रह गई. फिल्म पर्दे तक नहीं पहुंची लेकिन चुनाव तो सिर पर आ पहुंचे! अब देखना यह है कि बिना इस फिल्म के, विजय वही असर बना पाते हैं या नहीं— जिसकी उम्मीद उनको और उनके फैन्स को जन नायगन से थी. अगर विजय तमिलनाडु चुनाव में गेम चेंजर बने तो ये सब बातें महज चुनावी गप्पबाजी साबित होंगी. लेकिन अगर विजय का खेल कमजोर पड़ा, तो खुद उन्हें और उनके फैन्स को भी जन नायगन का अटकना रह-रहकर याद आता रहेगा!

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