हमारे देश के हर घर में एक कहानी है. यहां ढेरों जवान रहते हैं, जो समाज और परिवार से लड़कर आगे बढ़े हैं. कुछ ऐसे भी हैं, जो बचपन से ही फौज में भर्ती होने का सपना देखा करते थे. इन्हीं में से एक थे अरुण खेत्रपाल. भारत के सबसे यंग परमवीर चक्र विजेता. ये चक्र जीतने का सपना अरुण ने महज 21 साल की उम्र में देखा था. इसे उन्होंने पूरा भी किया. और जिस देश की सेवा वो बचपन से करना चाहते थे, उसके लिए अपनी जान भी दी. यही तो एक सच्चा फौजी करता है. अरुण के इसी शौर्य की गाथा है फिल्म 'इक्कीस'.
डायरेक्टर श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी फिल्म 'इक्कीस' के चर्चे काफी वक्त से हो रहे थे. ये बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता रहे धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म है. तो वहीं अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने इसके साथ अपना थिएटर में डेब्यू किया है. अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया की भी ये पहली फिल्म है. इन सभी के साथ इसमें जयदीप अहलावत भी हैं. जाहिर है, इतने सारे एलिमेंट्स के साथ मिलकर बनी ये वॉर फिल्म खास तो होनी ही थी. आइए आपको बताते हैं कि 'इक्कीस' कैसी है.
अरुण खेत्रपाल की शौर्य गाथा
फिल्म 'इक्कीस' की शुरुआत कशमकश में डूबे ब्रिगडियर नासिर (जयदीप अहलावत) के रिटायर्ड ब्रिगडियर एमएल खेत्रपाल (धर्मेंद्र) से मुलाकात करने से होती है. भारत-पाकिस्तान के बीच लड़े गए कारगिल युद्ध को 30 साल बीत चुके हैं. साल 2001 का वक्त है, जब सीनियर खेत्रपाल पाकिस्तान गए हैं. दोनों की मुलाकात होती है, नासिर उन्हें अपने घर में ठहराते हैं और उन्हें उनके पिंड सरगोधा भी लेकर जाते हैं, जहां वो कभी रहा करते थे. बेटे को खोने का गम एमएल खेत्रपाल को आज भी है. उन्हें आखिरी बात जो पता है वो ये कि अरुण को वापस आने का ऑर्डर मिला था. लेकिन वो नहीं लौटा. उसने अपना रेडियो भी बंद कर दिया था. ऐसे में वो शहीद कैसे हुआ इसकी ठीक-ठीक जानकारी उन्हें भी नहीं है.
कहानी फ्लैशबैक में जाती है और आप यंग अरुण खेत्रपाल को देखते हैं. फौज में सेकेंड लेफ्टिनेंट का दर्जा पा चुका अरुण अपने साथियों के साथ मस्ती तो करता है, लेकिन अपने उसूलों का पक्का भी है. वो रूल्स तोड़ने के सख्त खिलाफ है और उसमें कुछ बड़ा कर दिखाने का जज्बा है. अरुण की मुलाकात मूवी थिएटर के बाहर किरण से होती है और यहां से उसकी छोटी-सी लव स्टोरी आपके देखने को मिलती है. फिर आती है जंग की बारी. खुद को साबित करने का मौका ढूंढ रहा अरुण खुद आगे आकर भारत-पाकिस्तान की जंग में जाने के लिए अपना नाम देता है. उसके कमांडिंग अफसर को लगता है कि वो बस एक जोशीला बच्चा है. लेकिन खुद अरुण को भी शायद इस बाद का अंदाजा नहीं था कि वो जहां जा रहा है, वहां दुनिया एकदम अलग है और जिंदगी का कोई भरोसा नहीं.
परफॉरमेंस
अगस्त्य नंदा को अरुण खेत्रपाल के रोल में देखना काफी रिफ्रेशिंग है. नेटफ्लिक्स फिल्म 'द आर्चीज' से एक्टिंग डेब्यू करने के बाद ये पहली बार है जब अगस्त्य बड़े पर्दे में आए हैं. उनकी एक्टिंग, एक्सप्रेशन को मिलाकर पूरी परफॉरमेंस में काफी दम और मेहनत देखने को मिलती है. यंग फौजी के रूप में अगस्त्य ने अरुण खेत्रपाल के जोश, एनर्जी और देशभक्ति को बखूबी पर्दे पर उतारा है. इसके अलावा महज 21 साल का लड़का होने के नाते जो चीजें अरुण ने देखी और एक्सपीरिएंस की हैं, जैसे एक बकरे के बलि देने से पहले हिचकना, उन्हें भी अगस्त्य ने बहुत अच्छे से निभाया है.
21 साल बहुत कम उम्र है, एक जंग पर जाने के लिए. बहुत कम है, एक बड़ा टैंक चलाकर दुश्मन से सीधे टकराने के लिए और दुनिया छोड़ जाने के लिए. लेकिन ये सबकुछ अरुण खेत्रपाल ने अपनी छोटी-सी जिंदगी में किया. उनकी जबाजी की कहानी देखते हुए आपको उनपर गर्व होता है, लेकिन उनके घरवालों के लिए बुरा भी लगता है. अगर वो जिंदा होते, तो अपनी जिंदगी में और भी कई कमाल करते. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. वो किस्मत जो उन्होंने खुद चुनी थी.
धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म
इस फिल्म में जितना स्क्रीनटाइम हीरो अगस्त्य नंदा को मिला है, लगभग उतना ही धर्मेंद्र का भी है. फिल्म के फर्स्ट हाफ में आपको ज्यादातर धर्मेंद्र दिखाई देंगे. अपने बेटे के शहीद होने के 30 साल बाद रिटायर्ड ब्रिगडियर खेत्रपाल उसी देश में गए हैं, जिसने उनसे उनका बेटा छीना था. लेकिन उनके मन में कोई मैल नहीं है. उन्हें आज भी पाकिस्तान अपने देश जैसा ही लगता है. सरगोधा से उतना ही प्यार है, जितना बचपन में हुआ करता था, बेटे की याद आज भी वैसे ही आती है और आज भी उसपर उतना ही गर्व है, जितना उस दिन था, जब अरुण ने घर पर ऐलान किया था कि 'मैं जंग पर जा रहा हूं'.
89 साल के धर्मेंद्र को आखिरी पर पर्दे पर देखना बेहद इमोशनल एक्सपीरिएंस है. लेकिन उन्हें देख आपको खुश भी होगी. इतनी उम्र में भी उन्होंने बढ़िया परफॉरमेंस दी है. हां, उम्र और सेहत की वजह से कई बार उनके डायलॉग समझ नहीं आते. मगर उनकी बातों और पिक्चर की फीलिंग एकदम वहीं की वहीं है. स्क्रीन पर धर्मेंद्र के साथ ज्यादातर वक्त जयदीप अहलावत हैं. एक बड़े सीनियर एक्टर के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर करना और अपनी छाप छोड़ना बड़ी बात है. जयदीप अहलावत ने भी वही किया है. अपने सीन के हर फ्रेम में धर्मेंद्र कमाल हैं और उन्हीं की बराबर कमाल जयदीप भी हैं. अपने सीने में एक बात दबाए नासिर के अंदर की कशमश को उन्होंने बहुत ही बढ़िया तरीके से पर्दे पर उतारा है.
अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया का डेब्यू भी अच्छा रहा. किरण के रोल में सिमर को देखना काफी सही था. अगस्त्य संग उनकी जोड़ी भी अच्छी लगी. उन्हें बहुत छोटा रोल मिला है और उसे उन्होंने ठीक निभा लिया है. फिल्म में दो कैमियो हैं- एक सीनियर एक्टर असरानी और दूसरा दीपक डोबरियाल. दीपक का कैमियो ठीकठाक रहा. असरानी भी इस साल दुनिया को अलविदा कह गए हैं. ऐसे में उन्हें और धर्मेंद्र को साथ देखना काफी इमोशनल था. जरा-से सीन में ही असरानी ने दिल खुश कर दिया.
डायरेक्शन और विजुअल्स
'अंधाधुन' जैसी बेहतरीन फिल्म बना चुके श्रीराम राघवन ने पहली बार कोई वॉर फिल्म बनाई है. 'इक्कीस' उनकी सबसे बढ़िया फिल्म तो नहीं है, लेकिन उनकी मेहनत इसमें साफ देखी जा सकती है. पिक्चर की कहानी बीच-बीच में डगमगाती है, लेकिन आपका हाथ नहीं छोड़ती. अरुण खेत्रपाल की छोटी-सी जिंदगी के कई पहलुओं को आप देखने हैं और गर्व महसूस करते हैं. मूवी का सेकेंड हाफ बढ़िया है, क्योंकि ज्यादातर एक्शन आपको उसी में देखने को मिलता है. वॉर सीन्स देखकर मजा आता है. टैंक चलाना सीखना, जंग में उनका इस्तेमाल, लैंड माइन से भरी नदी पार करने से लेकर दूसरे देश में धावा बोलने तक, कई बढ़िया सीक्वेंस आपका दिल जीत सकते हैं. साथ ही कई आपके रोंगटे भी खड़े करते हैं. अंत में आपको एक बढ़िया मैसेज धर्मेंद्र देते हैं, जो बहुत जरूरी है.
स्पेशल मेन्शन: फिल्म का एक सीन है, जब जयदीप का किरदार नासिर धर्मेंद्र के किरदार एमएल खेत्रपाल को उनके पिंड सरगोधा लेकर जाते हैं. यहां धर्मेंद्र की एक कविता- 'आज भी जी करता है, पिंड अपने नु जानवां' आप सुनेंगे. ये आपकी आंखों में आंसू लाएगी. ये कविता धर्मेंद्र ने खुद फिल्म के लिए लिखी थी. ये उनकी जुबान के साथ-साथ दिल से भी निकली है, क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें अपने गांव से बहुत प्यार था.