रजत कपूर एक बेहतरीन एक्टर के साथ-साथ अपनी अनकन्वेंशनल डायरेक्शन के लिए भी पहचाने जाते हैं. रजत की हालिया रिलीज फिल्म आरके-आरके ने क्रिटिक्स का ध्यान अपनी ओर खींचा था. फिल्म भले बॉक्स ऑफिस पर सक्सेस का स्वाद नहीं चख पाई लेकिन क्रिटिक्स को फिल्म बहुत पसंद आई थी.
रजत की फिल्मोग्राफी को देखें, तो उनकी फिल्मों का सिलेक्शन हमेशा से लीक से हटकर रहा है. रजत कभी क्यों किसी कमर्शल एंगल से फिल्में बनाते हैं. इसके जवाब में वे कहते हैं, 'मैंने 1995 से अपने डायरेक्शन की शुरुआत की है. आजतक में मैंने नौ फिल्में बना ली हैं. इस बीच मुझे कभी ख्याल नहीं रहा कि अपनी फिल्मों का कमर्शल कैसे बनाया जाए या ये कैसे चलेगी. मैं कभी इसकी चिंता नहीं करता हूं बल्कि मुझे टेंशन इस बात की होती है कि मैं कैसे इस फिल्म को बेस्ट बनाकर लोगों के सामने ला सकूं. जब फिल्म बनकर कंपलीट हो जाती है, उसके बाद मेरे हाथ में कुछ भी नहीं रहता है. इतना पता है कि अपनी क्रिएटिविटी से समझौता नहीं करना है. मैंने अपने 45 फिल्मों के करियर में तीन-चार ऐसी फिल्मों में एक्टिंग की हैं, जिसे लेकर मैं बहुत शर्मिंदा होता हूं.उनका नाम नहीं लेना चाहता.'
जब उनसे सवाल किया गया कि वो मानते हैं कि मौजूदा दौर में पैरलल सिनेमा और कमर्शल की लाइन ब्लर हुई है? ओटीटी ने ऐसे मेकर्स को एक नया प्लैटफॉर्म दिया है? जवाब में रजत कहते हैं,'मुझे लगता है कि यह दौर एक्टर्स के लिए बेहतर है. अच्छे एक्टर्स को वो मौके मिलने शुरू हुए हैं, जो सालों से काम के लिए भटक रहे थे. अब जाकर उन्हें एक्सपोजर मिला है. विजय वर्मा हो, जयदीप अहलावत, प्रतीक गांधी जैसे एक्टर के नाम को लोग नहीं जानते थे, लेकिन अब हर किसी को उनका काम और नाम दोनों पता है. हालांकि क्या ओटीटी की वजह से काम बेहतर शुरू गया है, उसका अंदाजा नहीं है. इन दिनों जो ओटीटी पर कंटेंट बनाए या लिखे जा रहे हैं, उससे मैं पर्सनल तौर पर बहुत सहमती नहीं रखता हूं.
रजत आगे कहते हैं, 'देखिए मैं अपने एक्सपीरियंस पर ही बात कह सकता हूं. हाल ही मैंने एक फिल्म बनाई थी, जिसका नाम था 'आरके वर्सेज आरके', छोटे पैमाने पर मेरी फिल्म रिलीज हुई थी. रिव्यूज भी बहुत बेहतरीन आए थे. जितने भी लोगों ने फिल्म देखी, सबको अच्छी लगी. इसके बावजूद अभी कोई भी ओटटी इसे खरीदने को तैयार नहीं है. अब मैं ये कैसे कहूं कि इन ओटीटी प्लैटफॉर्म को अच्छे सिनेमा की समझ है. फॉर्म्यूला उनको भी चाहिए, अपने तरह का फॉर्म्यूला.'
रजत कहते हैं, मैं तो कहूंगा कि स्ट्रगल अब भी मेरी बरकरार है. यह कह लें, स्ट्रगल पहले से ज्यादा बढ़ गया है. आज से दस साल पहले ऑडियंस सिनेमाघर तो आती ही थी, लेकिन अभी तो वो आने को तैयार ही नहीं है, क्योंकि उन्हें लगता है कि अब तो ओटीटी पर ही आ जाएगा, तो जाकर सिनेमा देखेंगे. जो ऑडियंस मिथ्या, आंखों देखी के वक्त आई थी, अब वो ऑडियंस नहीं आती है. लोगों की आदतों में बदलाव आया है. वो बाहर निकलते भी हैं, तो बड़ी बजट की फिल्म देखने के मकसद से ही, हमारी फिल्मों के लिए तो कतई नहीं. ओटीटी प्लेटफॉर्म की वजह फुटफॉल तो कम नहीं बल्कि बंद हो गया है. यह नया दौर है, जिसे लेकर लोग उत्साहित हो रहे हैं, वो हमारे जैसे मेकर्स के लिए आजाब है.