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पॉलिटिक्स या प्रेशर? 2024 के चुनाव में BSP प्रमुख मायावती का क्या है सियासी प्लान?

लोकसभा चुनाव के बीच बार-बार उम्मीदवार बदलकर और फिर भतीजे आकाश आनंद को हटाकर बसपा प्रमुख मायावती चर्चा में है. मायावती की राजनीतिक चालों ने वोटर्स को उनके 2024 के एजेंडे को लेकर भ्रमित कर दिया है. लोगों के मन में सवाल है- 'बहन जी' प्रेशर में हैं या फिर वे इस पॉलिटिक्स के पीछे कोई बड़ी रणनीति के तहत काम कर रही हैं?

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बसपा प्रमुख मायावती.
बसपा प्रमुख मायावती.

लोकसभा चुनाव के बीच उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की 'रहस्यमयी' राजनीतिक चालों से घिरा हुआ है. चुनाव की शुरुआत में विपक्ष ने बसपा को 'बीजेपी की बी टीम' बताकर निशाने पर लिया. हालांकि, तीसरे चरण तक मायावती इस लेबल को हटाने के लगभग करीब पहुंच गई थीं. अपने भतीजे और पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद की मदद से बसपा ना सिर्फ बीजेपी के रथ को रोकने की कोशिशें करती दिखीं, बल्कि इंडिया ब्लॉक (सपा-कांग्रेस) के खिलाफ भी लड़कर राजनीतिक हालात को बदल रही थीं.

खुद मायावती को ज्यादा चुनावी रैलियों पर फोकस करते देखा गया. लेकिन फिर अचानक जल्दबाजी में लिए गए कई निर्णयों से बसपा ने अपने बारे में एक कमजोर धारणा बना ली. हालांकि, इस सवाल का जवाब दिया जाना बाकी है कि पॉलिटिक्स या प्रेशर के बीच मायावती का सियासी प्लान क्या है?

सरल शब्दों में कहें तो मायावती अपनी छवि बदलने के लिए सब कुछ कर रही थीं. ज्यादा से ज्यादा एक्टिव होने से लेकर बीजेपी पर अपने हमले बढ़ाने और सभी वर्गों तक पैठ बनाने की मशक्कत करते दिखीं. तीसरे चरण तक उम्मीदवार चयन से मायावती की रणनीति को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं. माना गया कि शायद 'बहन जी' बीजेपी से मुकाबला करने के लिए बड़े फैसले करने से नहीं हिचक रहीं हैं.

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नैरेटिव तब बदलना शुरू हुआ, जब उन्होंने आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी से यह कहकर हटा दिया कि वो अभी अपरिपक्व हैं. इतना ही नहीं, प्रमुख सीटों पर उम्मीदवारों को भी बदल दिया. ये वो सीटें थीं, जिन पर सपा और विपक्षी नेताओं के समीकरण गड़बड़ा सकते थे और बीजेपी को मदद मिल सकती थी. मायावती की राजनीतिक चालों में होने वाले उतार-चढ़ाव से कयासबाजी भी तेज हो गई और उनके मन में क्या चल रहा है, यह जानने की उत्सुकता भी बढ़ती गई.

यूपी में अभी भी 27 सीटों पर चुनाव होना बाकी है और मायावती जिस तरह से मैदान में उतरती हैं, वो चुनावी मैदान में महत्वपूर्ण लहर पैदा कर सकता है. चूंकि मतदान के पांच चरण पहले ही पूरे हो चुके हैं, इसलिए बसपा प्रमुख के राजनीतिक फैसलों ने एक नई बहस छेड़ दी है. जिस बात पर हैरानी जताई जा रही है- वह यह है कि पार्टी ने अपनी कमजोर छवि पेश करते हुए 14 उम्मीदवारों को बदल दिया है. सवाल यह है कि क्या मायावती अपनी चुनावी रणनीतियों में लड़खड़ा गई हैं या बीजेपी को मौन समर्थन देने का आरोप यहीं बना रहेगा?

2024 प्रतिष्ठा की लड़ाई?

बसपा की तेजी से बदलती चालों को समझने की कोशिश करने से पहले पिछले दो आम चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन से यह स्पष्ट हो जाता है कि 2024 भी मायावती के लिए एक प्रतिष्ठा की लड़ाई है, क्योंकि वो पार्टी द्वारा 2019 में जीती गई 10 सीटों पर कब्जा करने की कोशिश करेंगी. 2019 में सपा और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के साथ गठबंधन था. इस बार बसपा अकेले में मैदान में हैं. इससे पहले 2014 में पार्टी का खाता तक नहीं खुला था. बसपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने गठबंधन सहयोगियों के मुस्लिम, यादव और जाट वोट बैंकों से फायदा पहुंचा था और जीत मिली. लेकिन इस चुनाव में एक अच्छा परिणाम पार्टी को यूपी में तीसरे मोर्चे के रूप में खुद को स्थापित करने में मदद कर सकता है.

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आकाश आनंद को हटा दिया गया

इस चुनाव में दो महत्वपूर्ण मोड़ आए, जब बसपा को मायावती के फैसलों के कारण काफी चुनावी जोखिम का सामना करना पड़ा. पहला झटका चुनाव के बीच भतीजे आकाश आनंद को हटाकर राष्ट्रीय संयोजक पद से हटा दिया गया. इससे बसपा के युवा वोटर्स में निराश देखी जा रही है और वे विकल्प की तलाश में समाजवादी पार्टी का रुख कर रहे हैं. मायावती ने खुद सोशल मीडिया पर अपने फैसले की जानकारी दी.और ट्वीट किया, बीएसपी एक पार्टी के साथ ही बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के आत्म-सम्मान, स्वाभिमान और सामाजिक परिवर्तन का भी मूवमेंट है जिसके लिए कांशीराम जी और मैंने खुद भी अपनी पूरी जिंदगी समर्पित की है और इसे गति देने के लिए नई पीढ़ी को भी तैयार किया जा रहा है. इसी क्रम में पार्टी में अन्य लोगों को आगे बढ़ाने के साथ ही आकाश आनंद को नेशनल कोॉर्डिनेटर और अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, लेकिन पार्टी और मूवमेंट के व्यापक हित में पूर्ण परिपक्वता आने तक अभी उन्हें इन दोनों अहम जिम्मेदारियों से अलग किया जा रहा है. जबकि उनके पिता आनंद कुमार पार्टी और मूवमेंट में अपनी जिम्मेदारी पहले की तरह ही निभाते रहेंगे. बसपा का नेतृत्व पार्टी और मूवमेंट के हित में और बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के कारवां को आगे बढ़ाने में हर प्रकार का त्याग और कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटने वाला है.

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इसके जवाब में आकाश आनंद ने ट्वीट किया और मायावती को अपना आदर्श बताया. आकाश ने कहा, बहन जी, आप पूरे बहुजन समाज के लिए एक आदर्श हैं, करोड़ों देशवासी आपको पूजते हैं. आपके संघर्षों की वजह से ही आज हमारे समाज को एक ऐसी राजनैतिक ताक़त मिली है जिसके बूते बहुजन समाज आज सम्मान से जीना सीख पाया है. आप हमारी सर्वमान्य नेता हैं. आपका आदेश सिर माथे पे. भीम मिशन और अपने समाज के लिए मैं अपनी अंतिम सांस तक लड़ता रहूंगा.

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जौनपुर के फैसले ने चौंकाया...

ऐसा ही दूसरा कदम जौनपुर में टिकट को लेकर उठाया. बसपा ने पहले पूर्व सांसद और बाहुबली नेता धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला को टिकट दिया, फिर रातोंरात टिकट काटना पड़ा. मायावती ने अपने मौजूदा सांसद श्याम सिंह यादव का टिकट काटकर धनंजय की पत्नी को समायोजित किया था. लेकिन, उन्हें तब तगड़ा झटका लगा, जब जेल से बाहर आकर धनंजय सिंह ने कथित तौर पर बीजेपी के साथ समझौता कर लिया. मायावती को वापस श्याम सिंह यादव को टिकट देना पड़ा. धनंजय ने बसपा पर उन्हें अपमानित करने का आरोप लगाया. 2009 में बसपा से जौनपुर सीट जीतने वाले धनंजय सिंह ने कहा, बसपा ने मुझे चौथी बार धोखा दिया. 2012, 2014 और 2017 में पार्टी ने मुझे टिकट का आश्वासन दिया लेकिन आखिरी समय में मुझे धोखा दिया. जौनपुर में 25 मई को छठे चरण में मतदान होने जा रहा है. फिलहाल, इन दो घटनाक्रमों ने बसपा को करारा झटका दिया है. पार्टी ने जिस तरह शुरू में अपनी ताकत दिखाई थी, अब नए सिरे से वापसी करना मुश्किल हो गया है.

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एक नजर उन 14 सीटों पर, जहां बीच चुनाव में बदले गए उम्मीदवार

जौनपुर: बहुजन समाज पार्टी के पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी को पहले पार्टी के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया गया था. लेकिन बाद में उनका टिकट काट दिया और मौजूदा सांसद श्याम सिंह यादव को फिर से टिकट दे दिया.

वाराणसी: बसपा ने दो बार अपना उम्मीदवार बदला. शुरुआत में अतहर जमाल लारी को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन एक हफ्ते बाद बसपा ने सैयद नियाज अली मंजू को उम्मीदवार बना दिया. बाद में उनका टिकट काट दिया और एक बार फिर अतहर जमाल लारी पर भरोसा जताया.

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आजमगढ़: बसपा ने सबसे पहले भीम राजभर को चुना. हालांकि उनका टिकट काट दिया गया और साबिया अंसारी को उम्मीदवार बनाया गया. बाद में साहिबा अंसारी का टिकट भी काट दिया गया और उनके पति मसूद अहमद को उम्मीदवार घोषित कर दिया.

अलीगढ: बसपा ने पहले गुफरान नूर को अपना उम्मीदवार घोषित किया. बाद में उनकी जगह हितेंद्र उपाध्याय को उम्मीदवार बनाया.

मथुरा: बसपा ने यहां भी अपना उम्मीदवार बदला. पहले कमल कांत उपमन्यु को टिकट दिया, लेकिन बाद में उनका टिकट काट दिया गया और चौधरी सुरेश सिंह को टिकट दिया गया.

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फिरोजाबाद: पार्टी ने पहले सत्येन्द्र जैन सोली को अपना उम्मीदवार बनाया और बाद में चौधरी बशीर को उम्मीदवार बनाया गया.

झांसी: पार्टी ने सबसे पहले अधिवक्ता राकेश कुशवाहा को अपना उम्मीदवार घोषित किया, लेकिन बाद में उनकी जगह रवि कुशवाह को उम्मीदवार बनाया गया.

डुमरियागंज: बहुजन समाज पार्टी ने पहले गोरखपुर के रहने वाले ख्वाजा शमसुद्दीन को अपना उम्मीदवार बनाया. चार दिन बाद जब बीएसपी ने अपनी 11वीं लिस्ट जारी की तो शम्सुद्दीन का टिकट काट दिया और मोहम्मद नदीम मिर्जा के नाम का ऐलान कर दिया.

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संतकबीरनगर: बहुजन समाज पार्टी ने पहले मोहम्मद आलम को अपना उम्मीदवार बनाया था. लेकिन 15 दिन बाद उनका टिकट रद्द कर दिया और दानिश अशरफ को टिकट दे दिया गया. उसके बाद पार्टी ने फिर से अपना उम्मीदवार बदला और नदीम अशरफ को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया.

मैनपुरी: बसपा ने पहले गुलशन शाक्य को अपना उम्मीदवार बनाया. लेकिन कुछ दिनों बाद उनका टिकट काट दिया गया और शिव प्रसाद यादव को उम्मीदवार घोषित कर दिया.

गाजियाबाद: अंशय कालरा उर्फ ​​राकी को बसपा उम्मीदवार के रूप में उतारा गया. फिर नंदकिशोर पुंडीर को टिकट दे दिया गया.

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अमेठी: रवि प्रकाश मौर्य को बसपा उम्मीदवार बनाया गया. लेकिन बाद में उनका टिकट काट कर नन्हे सिंह चौहान को दे दिया गया.

भदोही: बसपा ने पहले अतहर अंसारी को अपना उम्मीदवार बनाया. लेकिन उनका टिकट काट कर इरफान अहमद को दे दिया गया. बाद में हरिशंकर सिंह चौहान पर भरोसा जताया.

बस्ती: बसपा के पूर्व प्रत्याशी दयाशंकर मिश्र का टिकट काट दिया गया और उनकी जगह लवकुश पटेल को टिकट दिया गया.

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बीएसपी सेल्फ गोल कर रही है?

यहां तक ​​कि बसपा वोटर्स का भी मानना ​है कि अगर बहन जी ने इंडिया ब्लॉक में शामिल होने के प्रस्ताव को नहीं ठुकराया होता या कम से कम कांग्रेस को साथ ले लिया होता तो वो पार्टी की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए बेहतर स्थिति में होतीं. जानकार कहते हैं कि बसपा का परंपरागत वोटर्स जाटव समाज मायावती के साथ बना हुआ है, लेकिन समुदाय के शिक्षित और युवा सदस्य उनसे नाराज दिख रहे हैं और एक विकल्प की तलाश कर रहे हैं. कुछ जगहों पर उन्हें समाजवादी पार्टी या चंद्रशेखर आजाद की पार्टी में उम्मीद नजर आती है. हालांकि, थोड़े पुराने वर्कर्स अभी भी मायावती को अपना नेता मानते हैं.

चुनाव के प्रति बसपा की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चौथे चरण के चुनाव तक मायावती अपने उम्मीदवार बदलती रहीं. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने उत्तराधिकारी को भी अचानक हटा दिया, जिससे उनके अभियान की गति पटरी से उतर गई. इस चुनाव से पहले जब भाजपा का 'बी-टीम' टैग लगभग खत्म हो गया था, तब टिकट वितरण को लेकर मायावती का अपने दम पर लड़ने के लिए सराहना की जा रही थी. ये फैक्टर बीजेपी और सपा दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकते थे. मुजफ्फरनगर में प्रजापति उम्मीदवार चुनना बीजेपी के संजीव बालियान के लिए सिरदर्द बना रहा. दूसरी ओर, पहले चरण में एक ठाकुर उम्मीदवार ने बीजेपी को बेचैन कर दिया था, लेकिन तीन चरणों के बाद जब जौनपुर और बस्ती में उम्मीदवार बदले गए तो बीजेपी की मदद करने के आरोप फिर से मायावती को परेशान करने लगे.

जिस तरह से बस्ती में दयाशंकर मिश्र का टिकट काटा गया, उससे इन आरोपों को बल मिला है. दयाशंकर मिश्रा भाजपा के जिलाध्यक्ष थे. जब बीजेपी से टिकट नहीं मिला तो वा बसपा में शामिल हो गए थे और उन्हें बस्ती सीट से मैदान में उतारा गया था. लेकिन आखिरी समय में मायावती ने अपना मन बदल लिया और मिश्रा की जगह लवकुश पटेल को उम्मीदवार बना दिया. लोगों ने पूछा, क्या वो चाहती थीं कि बीजेपी जीते? जौनपुर में बसपा एक बार फिर पुराने नेता श्याम सिंह यादव पर निर्भर हो गई, जिससे लड़ाई बीजेपी बनाम सपा में तब्दील हो गई. 

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सबकी निगाहें पूर्वांचल पर हैं

25 मई को छठे चरण में यूपी की 14 सीटों पर मतदान है. इनमें सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फूलपुर, इलाहाबाद, अंबेडकरनगर, श्रावस्ती, डुमरियागंज, बस्ती, संत कबीर नगर, लालगंज, आजमगढ़, जौनपुर, मछलीशहर और भदोही में चुनाव हो रहे हैं. 2019 में बीजेपी ने 9 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि चार बीएसपी के पास और एक समाजवादी पार्टी के पास गई थी. 

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