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2026 में मुस्लिम राजनीति की 'तिकड़ी' का टेस्ट... केरल-असम-बंगाल का कौन होगा 'ओवैसी'?

देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव दो महीने के बाद होने है, उसमें केरल, असम और बंगाल में मुस्लिम वोटर 27 से 35 फीसदी के बीच है. इन तीनों ही राज्यों में मुस्लिम राजनीति को भी खड़ी करने की कवायद हो रही है. ऐसे में देखना होगा कि मुस्लिम आधार वाले दलों का क्या होता है?

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मुस्लिम सियासी की प्रयोगशाला बनेगा 2026 का चुनाव (Photo-ITG)
मुस्लिम सियासी की प्रयोगशाला बनेगा 2026 का चुनाव (Photo-ITG)

जम्‍मू-कश्‍मीर के बाद असम, पश्चिम बंगाल और केरल में सबसे ज्‍यादा मुस्लिम मतदाता है. साल 2026 में देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव है, उसमें बंगाल, केरल और असम भी शामिल है. ऐसे में मुस्लिम राजनीतिक का भी असल इम्तिहान होना है, क्योंकि मुस्लिम आधार वाले तीन दलों भी पूरे दमखम के साथ किस्मत आजमा रहे हैं. असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम राजनीति के बड़े चेहरे हैं, ऐसे में देखना है कि इन राज्यों की मुस्लिम पॉलिटिक्स 2026 में किस करवट बैठती है? 

देश में भले ही मुस्लिम मुस्लिम आबादी 14 से 15 फीसदी के बीच हो, लेकिन केरल, असम और पश्चिम बंगाल में 25 से 35 फीसदी के बीच है. केरल में 27 फीसदी तो बंगाल में 30 फीसदी और असम में करीब 35 फीसदी मुस्लिम आबादी है. इस तरह तीनों ही राज्यों में मुस्लिम वोटर काफी अहम है, जिसे देखते हुए मुस्लिम दल भी अपना सियासी दम दिखाने के लिए बेताब हैं? 

मुस्लिम आधार वाले दलों का इम्तिहान

मुस्लिम वोटों की सियासत ताकत और अहमियत को देखते हुए केरल में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग तो असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की AIUDF तो बंगाल में अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेकुलर फ्रंट और हुमाऊ कबीर की जनता उन्नयन पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतर रही हैं. इन दलों का सियासी आधार पूरी तरह से मुस्लिम वोटों के इर्द-गिर्द सिमटी हुआ है, जिसके चलते 2026 में मुस्लिम लीग से मौलाना बदरुद्दीन अजमल, हुमाऊं कबीर और अब्बास सिद्दीकी के लिए सियासी इम्तिहान से कम नहीं है? 

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असम में बदरुद्दीन अजमल की राजनीति

असम में मुस्लिम वोटों की राजनीतिक अहमियत को देखते हुए मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने'ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट' (AIUDF) का गठन 2005 में किया. अजमल ने अपनी राजनीति मुस्लिम अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से असमिया भाषी और बंगाली मूल के मुसलमानों के अधिकारों के हिमायती के तौर पर शुरू की और 2009 से 2024 तक धुबरी से सांसद रहे. 

साल 2006 के विधानसभा चुनाव में AIUDF के पास 10 विधायक जीते थे, 2011 में बढ़कर 18 विधायक हो गए.  2016 में 13 सीटों पर कामयाबी मिली फिर 2021 में 16 सीटों पर जीत मिली. इस तरह हर साल, AIUDF का जनाधार बढ़ा और पार्टी मजबूत हुई है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की राजनीति को गहरा झटका लगा, जब वो अपनी ही सीट हार गए. कांग्रेस दोबारा से मुस्लिम वोटों पर अपनी पकड़ बनाती नजर आ रही है, जिसके चलते 2026 का चुनाव  अजमल के लिए काफी अहम माना जा रहा. 

असम में मुस्लिमों की पहली पसंद कौन बनेगा?

असम में तकरीबन मुस्लिम आबादी 34 फीसदी है, जो राज्य की कुल 126 सीटों में से 32 सीटों पर अहम रोल अदा करते हैं. 2021 में 31 मुस्लिम विधायक जीतकर आए थे,  लेकिन परिसीमन में मुस्लिम सीटों का गेम बदल गया है. मुस्लिम मतदाता अब 32 सीटों के बजाय 22 सीटों पर ही निर्णायक रोल में रह गए हैं. कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल दोनों की नजर मुस्लिम वोटबैंक पर टिकी हुई है. 

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मुस्लिम वोटर ही बदरुद्दीन अमजल की ताकत है तो कांग्रेस की नजर भी इसी वोटबैंक पर टिकी हुई है. 2021 में बदरुद्दीन अजमल और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ी थी, लेकिन इस बार दोनों ही अलग-अलग किस्मत आजमा रही हैं. ऐसे में मुस्लिम वोटर की पहली पसंद कौन बनेगा, यह बड़ा सवाल है, लेकिन 2024 के चुनाव में देखा गया है कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल से मुस्लिमों को मोहभंग हुआ है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधी लड़ाई में मुस्लिम वोटर किस करवट बैठेगा, यह अहम है? 

बंगाल में मुस्लिम में सियासत का क्या होगा?

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी को भले ही 27 से 28 फीसदी बताया जाता हो, लेकिन मुस्लिम वोटर 30 फीसदी के करीब हैं. राज्य की 120 सीट पर मुस्लिम वोटर्स हार जीत का रोल अदा करते हैं. मुस्लिम वोटों की सियासी ताकत को देखते हुए पहले फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेकुलर फ्रंट से पार्टी बनाई है तो इस बार हुमाऊं कबीर ने बाबर के नाम पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनाने का ऐलान कर मुस्लिम सियासत का चेहरा बनने की कवायद में है. हुमाऊ कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी के नाम से अपनी अलग राजनीतिक दल भी बना लिया है.

2026 के बंगाल चुनाव में अब्बास सिद्दीकी और हुमाऊं कबीर का सियासी टेस्ट होना है. हुमाऊ कबीर बाबरी के बहाने बंगाल में मुस्लिम राजनीति को खड़ी करने की कवायद में है, लेकिन ममता बनर्जी के साथ एकमुश्त खड़ा मुस्लिम मतदाता क्या उनके साथ आएगा, इसकी अग्निपरीक्षा होनी है. 2021 विधानसभा चुनाव में बंगाल के मुस्लिमों ने 86 फीसदी वोट टीएमसी को दिया था. इसी का नतीजा था कि मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस-लेफ्ट का सफाया हो गया था और दोनों अपना खाता भी नहीं खोल पाए थे.  ममता बनर्जी खुलकर मुसलमानों के साथ खड़ी है. ऐसे में हुमाऊं कबीर और अब्बास सिद्दीकी के साथ क्या मुस्लिम वोटर जाएंगे? 

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केरल में मुस्लिम पॉलिटिक्स क्या होगा?

दक्षिण भारत में मुस्लि आबादी सबसे ज्यादा केरल में हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो 80 लाख से अधिक है. मलप्पुरम, कोझिकोड और कन्नूर जिलों में मुस्लिम वोटर काफी अहम माने जाते हैं. केरल का मुस्लिम समुदाय अपनी शैक्षिक उपलब्धियों और राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में सक्रिय भागीदारी के लिए जाना जाता है. केरल में मुस्लिम सियासत मुख्य रूप से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के इर्द-गिर्द केंद्रित है और ठीक ठाक पकड़ मानी जाती है.

मुस्लिम लीग केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है. मुस्लिमों के बीच अपनी मजबूत सियासी पैठ बना रखा है.  1962 से लेकर अब तक प्रत्येक लोकसभा में इसके कम से कम दो सांसद रहे हैं और हर विधानसभा चुनाव में उसका खाता खुलता रहा है.केरल विधानसभा के 140 सीटों में से 32 मुस्लिम विधायक हैं. इनमें से 15 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) से, नौ वामपंथी दलों से, तीन कांग्रेस से, तीन निर्दलीय और एक-एक इंडियन नेशनल लीग और नेशनल सेकुलर कॉन्फ्रेंस से है. 

केरल में कुल 43 सीटें ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम मतदाता राजनीतिक समीकरण बना और बिगाड़ सकते हैं. पिछले कई दशकों से केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने अपना वर्चस्व मुस्लिमों के बीच बना रखा है. कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के चलते मुस्लिम वोटों का बिखराव भी नहीं हो पाता है. केरल में मुस्लिम बहुल जिला मलप्पुरम हमेशा से आईयूएमएल का गढ़ रहा है. ऐसे में केरल में मुस्लिम लीग की अपनी राजनीति है.ऐसे में देखना है कि 2026 के चुनाव में मुसमलानों की पहली पसंद कौन बनता है? 
 

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