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बंगाल चुनाव: जंगल महल की 40 सीटों का सियासी गणित, जो तय कर सकती हैं जीत-हार

पश्चिम बंगाल के जंगल महल की 40 सीटें इस बार चुनावी नतीजों की दिशा तय कर सकती हैं. आदिवासी और कुर्मी समुदाय के समीकरण के बीच बीजेपी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है, जबकि टीएमसी अपने मजबूत जनाधार को बनाए रखने में जुटी है. स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय असंतोष को लेकर दोनों दलों ने रणनीति तेज कर दी है, जिससे यह इलाका एक बार फिर सियासी मुकाबले का केंद्र बन गया है.

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जंगल महल की 40 सीटें बंगाल चुनाव का रुख तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी. (Photo: X)
जंगल महल की 40 सीटें बंगाल चुनाव का रुख तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी. (Photo: X)

चार जिलों को समेटकर बना पश्चिम बंगाल का जंगल महल बीजेपी और टीएमसी के लिए सत्ता की सीढ़ी का वो पायदान है जिसे पार करना जरूरी है. बीजेपी के लिए यहां ना केवल खोई जमीन वापस पाने की लड़ाई है बल्कि इसे बेहद मजबूती से वापस हासिल करने पर ही सत्ता की सीढ़ी चढ़ी जा सकती है. इसके लिए बीजेपी ने कमर कस ली है और पश्चिम बंगाल कि इन 40 सीटों के लिए अलग रणनीति बनाई है.

जंगल महल में बीजेपी की ओर से आदिवासी और कुर्मी समाज, दोनों को साधने के लिए एक योजना को अंजाम दिया गया है. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुड़ा, झाड़ग्राम और पश्चिम मिदनापुर जिलों को मिलाकर जंगल महल का इलाका बनता है, जहां लगभग 6 से 8 प्रतिशत के बीच आदिवासी और लगभग 30 प्रतिशत के आसपास कुर्मी समाज के लोग रहते हैं. यहां का चरित्र और समस्याएं दूसरी जगहों से अलग हैं.

ऐसे में बीजेपी को जंगल महल के लिए अलग तरीके की योजना बनानी पड़ी. इस योजना का खाका दुर्गापुर में हुई एक उच्च स्तरीय मीटिंग में खींचा गया. इस बैठक के बाद बीजेपी ने तय किया है कि इस इलाके में पानी की समस्या, माफिया खास तौर पर बालू माफिया, अनुसूचित जनजाति (ST) की जमीनों पर अवैध कब्जे, फर्जी जाति प्रमाण पत्र रैकेट, आदिवासी युवाओं को इंजीनियरिंग और शिक्षण की नौकरियों से वंचित रखना, सिंदरी और रघुनाथपुर-I जैसे ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों बंद होने और डॉक्टरों की भारी कमी जैसे मुद्दों को पार्टी चुनाव में उठाएगी.

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जंगल महल में बीजेपी ने झोंकी ताकत

इसके लिए बीजेपी के ग्रासरूट वर्कर्स और नेता घर-घर जाकर लोगों को इन बातों के बारे में बताएंगे और बीजेपी के पक्ष में जनमत तैयार करने की कोशिश करेंगे. दुर्गापुर में हुई इस उच्च स्तरीय बैठक में राज्य प्रभारी सुनील बंसल, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य सहित इलाके के वरिष्ठ नेता और उम्मीदवार शामिल थे. मीटिंग में शामिल एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बीजेपी का मानना है कि जंगल महल को वापस पाने के लिए युद्ध-स्तर पर काम करना शुरू कर दिया गया है.

पार्टी का मानना है कि नरेगा का फंड रोक दिया गया था, और अयोध्या हिल्स, जंगल महल के लोगों के लिए कल्याण सुनिश्चित करने का वादा भी पार्टी को करना होगा तभी जाकर खोई जमीन वापस मिल सकती है. हालांकि पार्टी को पता है कि यह राह इतनी आसान भी नहीं है, उसके लिए जंगल महल के गणित को जान लेना बेहद जरूरी है. पश्चिम बंगाल के चार जिले पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मिदनापुर और झाड़ग्राम को जंगलमहल कहा जाता है. कभी वामपंथियों का गढ़ और माओवाद से प्रभावित यह इलाका 2011 के विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव में आ गया.

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इलाके में कैसा रहा है BJP का प्रदर्शन?

लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इस जंगल महल में भारी भरकम जीत दर्ज कर गहरी पैठ बना ली और 2021 के विधानसभा चुनाव में पुरुलिया की 9 सीटों में से 7 सीटें जीतीं. वहीं बांकुरा की 12 सीटों में से 8 सीटें बीजेपी ने जीती थीं. झारग्राम की 4 सीटों में से एक भी नहीं और पश्चिम मिदनापुर की 15 सीटों में से केवल 2 सीटें जीतने में पार्टी सफल हो पाई थी. ऐसे में पार्टी को सबसे ज्यादा मेहनत पश्चिम मिदनापुर और झाड़ग्राम में करनी है. यहां भले ही पार्टी को लोकसभा चुनाव में सफलता मिली हो, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी का जनाधार खिसक गया था.

इन इलाकों में 2011 से पहले माओवाद चरम पर था और झाड़ग्राम के लालगढ़ को तो माओवादियों ने मुक्त अंचल घोषित कर अपने कब्जे में ले लिया था. लेकिन ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद माओवादियों पर नकेल कसी और उनके सबसे बड़े नेता किशनजी मुठभेड़ में मारा गया. इन इलाकों में माओवादी गतिविधियों में कमी आना ममता बनर्जी के पक्ष में गया, जिसका श्रेय भी लेना वह नहीं भूलतीं. ममता बनर्जी कहती रही हैं कि उनके सत्ता में आने के बाद ही जंगल महल कि हंसी वापस लौटी. ऐसे में अगर बीजेपी को सत्ता में आना है तो जंगल महल कि ये 40 सीटें उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.

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