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250 रुपये दिहाड़ी, छह महीने काम... चाय की चुस्की देने वाले मजदूरों का हाल बेहाल, उत्तर बंगाल के चाय बागान से ग्राउंड रिपोर्ट

उत्तर बंगाल की चुनावी जंग में 20 से अधिक सीटों पर हार-जीत तय करने वाले चाय बागान मजदूर आज भी बदहाली में जी रहे हैं. दुनिया भर में अपनी चाय का स्वाद पहुंचाने वाले इन मजदूरों के चूल्हे आज भी लकड़ी से जलते हैं और उनकी दिहाड़ी 250 रुपये पर सिमटी है.

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उत्तर बंगाल के चाय बागान से ग्राउंड रिपोर्ट. (photo: ITG)
उत्तर बंगाल के चाय बागान से ग्राउंड रिपोर्ट. (photo: ITG)

उत्तर बंगाल के चाय बागान मजदूर चुनावी मौसम में आर्थिक संकट और रोजगार की असुरक्षा से बुरी तरह जूझ रहे हैं. जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और दार्जिलिंग जैसे जिलों की लगभग 20 से 22 विधानसभा सीटों पर इन मजदूरों का सीधा प्रभाव है. जलपाईगुड़ी के करीब 170 चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी समुदाय के ये मजदूर वर्तमान में मात्र 250 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर काम करने को मजबूर हैं. चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल कांग्रेस (TMC) और BJP दोनों ही दल इन वोटरों को लुभाने में जुटे हैं. राजनीतिक दलों के वादों और लुभावने भाषणों के बीच आर्थिक संकट और रोजगार की असुरक्षा से जूझ रहे चाय बागान मजदूरों के दर्द आजतक ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में समझने की कोशिश की है. 

उत्तर बंगाल की 54 सीटों में से लगभग 20 से 22 सीटें ऐसी हैं, जहां पर चाय बागान के मजदूरों का अच्छा खासा प्रभाव है. इनमें से सबसे ज़्यादा चाय बागान के मजदूर जलपाईगुड़ी ज़िले में है, जहां विधानसभा की सात सीटें आती हैं.

एक आंकड़े के मुताबिक, लगभग 20-22प्रतिशत के आस-पास चाय मजदूर जलपाईगुड़ी जिले में हैं. यहां लगभग 170 चाय बागान है. जो विश्व प्रसिद्ध 'डूअर्स चाय' और खास तौर पर CTC (क्रश, टियर, कर्ल) चाय के उत्पादन के लिए मशहूर है. जिले में करीब 20-22 प्रतिशत आबादी चाय मजदूरों की है. पर विडंबना ये है कि पूरी दुनिया को चाय का स्वाद देने वाले ये मजदूर खुद बुनियादी सुविधाओं से मरहूम हैं. चाय बागान से फैक्ट्री तक पत्तियां पहुंचाने का सफर बेहद कठिन है. आज भी ये मजदूर चाय के असली स्वाद से कोसों दूर हैं और गरीबी के कारण लकड़ियों पर खाना पकाने को मजबूर हैं.

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इन बागानों में काम करने वालों में 80 प्रतिशत महिलाएं हैं. इनमें से कई महिलाओं को राज्य सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना का लाभ मिल रहा है. हालांकि, कई महिलाएं मानती हैं कि 1500 रुपये प्रति महीने की मदद के बजाय अगर उन्हें सिलाई मशीन या रोजगार के अन्य साधन मिलें, तो वो अधिक स्वावलंबी बन सकेंगी. महंगाई का आलम ये है कि सिलेंडर होने के बावजूद महंगा होने के कारण लकड़ी का इस्तेमाल करना पड़ता है.

उधर, चाय बागान के इलाकों में पिछले कुछ सालों में बीजेपीकी पैठ बढ़ी है, जबकि टीएमसी अपनी योजनाओं के दम पर वापसी की कोशिश में है. मजदूरों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का एकमात्र भरोसा बागान के डॉक्टर या सरकारी अस्पताल ही हैं. पेंशन में बढ़ोतरी और काम की निश्चितता उनके लिए सबसे बड़े मुद्दे हैं. चुनाव के वक्त नेताओं के लुभावने भाषण तो सुनाई देते हैं, लेकिन मजदूरों की बुनियादी स्थिति में बदलाव की गति बेहद धीमी है.

उत्तर बंगाल की 54 सीटों में से करीब दो दर्जन सीटों पर जीत का रास्ता इन्हीं चाय बागानों से होकर गुजरता है. इस बार के चुनाव में बागान की महिलाएं जो बहुमत में निर्णायक भूमिका निभाएंगी. उनका वोट जिस पार्टी की ओर जाएगा, चुनावी तराजू का पलड़ा उसी ओर झुकना हुआ दिखाई दे सकता है. इन मजदूरों की बदहाली को दूर करने का जो भी ठोस भरोसा दिलाएगा. वही इस सियासी लड़ाई का सिकंदर बनेगा.

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