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उत्तराखंड: विधानसभा चुनाव से पहले BJP को झटका, निकाय की 3 में से 1 सीट पर मिली जीत

उत्तराखंड के तीन निकाय चुनाव नतीजों में सत्ताधारी भाजपा को केवल एक सीट (नरेंद्रनगर) पर निर्विरोध जीत मिली, जबकि दो पर निर्दलीयों ने बाजी मारी. मुख्यमंत्री धामी के क्षेत्र चंपावत (पाटी) में पवनदीप राजन के जीजा नारायण लाल ने भाजपा उम्मीदवार को पराजित किया.

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पवनदीप राजन के जीता नारायण लाल ने पाटी सीट से बीजेपी उम्मीदवार को हराया
पवनदीप राजन के जीता नारायण लाल ने पाटी सीट से बीजेपी उम्मीदवार को हराया

उत्तराखंड में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए तीन नगर निकायों के चुनाव नतीजे बीजेपी के लिए अच्छी खबर लेकर नहीं आए हैं. गुरुवार को घोषित किए गए नतीजों में से भाजपा केवल एक अध्यक्ष पद ही जीत सकी, जबकि बाकी दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने परचम लहरा दिया.

सबसे बड़ा उलटफेर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा सीट चंपावत के अंतर्गत आने वाली पाटी नगर पंचायत में देखने को मिला. यहां अध्यक्ष पद के लिए मतों की तीन बार रिकाउंटिंग कराई गई, लेकिन फिर भी भाजपा प्रत्याशी नवीन राम को हार का मुंह देखना पड़ा. 

उन्हें भाजपा के ही बागी और निर्दलीय प्रत्याशी नारायण लाल ने 150 से अधिक मतों से शिकस्त दी. नारायण लाल मशहूर 'इंडियन आइडल' विजेता और उत्तराखंड के लोकप्रिय गायक पवनदीप राजन के जीजा हैं, और खुद पवनदीप ने उनके लिए प्रचार किया था. हालांकि, जीत के बाद नारायण लाल ने नरम रुख अपनाते हुए कहा कि उनका वैचारिक जुड़ाव भाजपा और सीएम धामी से हमेशा रहेगा.

गढ़ीनेगी में भी चूका संगठन
उधम सिंह नगर जिले की नवगठित गढ़ीनेगी नगर पंचायत में भी भाजपा को तगड़ा झटका लगा. यहां पांच प्रत्याशी मैदान में थे, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार अभिषेक सुखीजा ने भाजपा के सचिन बाठला को 94 वोटों से हराकर अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया. हालांकि, जीत के बाद सुखीजा ने संकेत दिए हैं कि वे आने वाले दिनों में भाजपा का दामन थाम सकते हैं.

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नरेंद्रनगर में लाज बची, पर वार्डों में कड़ा मुकाबला
टिहरी जिले की नरेंद्र नगर पालिका परिषद में कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने की वजह से भाजपा के पूर्व पालिकाध्यक्ष राजेंद्र विक्रम सिंह पंवार निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिए गए. लेकिन यहां के सात वार्ड सभासदों के चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर मिली, जहां 4 पर भाजपा और 3 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की.

भले ही यह चुनाव केवल तीन निकायों का था, लेकिन गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में हुई यह हार भाजपा के लिए चिंतित करने वाले जरूर हैं. राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह संगठन के भीतर तालमेल की कमी थी या फिर टिकट बंटवारे में हुई बड़ी चूक का नतीजा है.
 

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