भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी को प्रचंड जीत मिली है. बीएनपी करीब 20 साल के बाद एक बार फिर से बांग्लादेश में सरकार बनाने जा रही है और तारिक रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री होंगे. बीएनपी को दो-तिहाई सीटों पर जीत मिली है जबकि कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को तगड़ा झटका लगा है.
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद सत्ता की कुर्सी का सपना देखने वाले शफीकुर रहमान की अगुवाई वाला कट्टरपंथी जमात ए इस्लामी गठबंधन को करारी मात खानी पड़ी है. बांग्लादेश चुनाव में 200 से ज्यादा सीटें जीतने में सफल रही तो जमात-ए-इस्लामी 70 सीट भी नहीं जीत सकी. इस तरह से सत्ता में आने का ख्वाब देखने के वाली जमात ए इस्लामी का सपना पूरी तरह धराशाही हो गया.
बांग्लादेश के चुनावी नतीजे ऐसे समय आए हैं, जब पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव के लिए सियासी सरगर्मी तेज है. पिछले दो साल से राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे बांग्लादेश के आम चुनाव में बीएनपी की बंपर जीत का सियासी असर भारत के संबंध के साथ बल्कि बंगाल और असम की सियासत पर भी पड़ेगा?
बांग्लादेश से असम और बंगाल की सीमा
असम और पश्चिम बंगाल दोनों राज्यों की सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं, इसलिए वहां होने वाली सियासी उथल-पुथल भारत के इन दोनों राज्यों के सामाजिक और चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करेगा. बांग्लादेश की 4000 किलोमीटर की सीमा भारत से लगती है. यह भारत की किसी भी पड़ोसी के साथ सबसे लंबी सीमा है. ऐसे में भारत की शांति और सुरक्षा के लिए एक स्थिर बांग्लादेश जरूरी है.
पश्चिम बंगाल चुनाव की सियासी तपिश के बीच बांग्लादेशी घुसपैठियों और बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार बीजेपी की राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं. पिछले कई महीनों से बंगाल में बीजेपी नेताओं ने इन दो मुद्दों को प्रमुख चुनावी मुद्दों के तौर पर आगे बढ़ाया है.
बांग्लादेश का बंगाल से सियासी कनेक्शन
बांग्लादेश के हालात सीधे तौर पर बंगाल की राजनीति को प्रभावित करते हैं. सीमा सुरक्षा पर बीजेपी और टीएमसी के बीच जुबानी जंग बड़ा आकार ले चुकी है. इतना ही नहीं असम में भी बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा हमेंशा से गर्म रहा है और मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा लगातार अवैध घुसपैठ करने वालों को चिह्नित करके वापस भेजने की मुहिम में जुटे हैं.
असम और बंगाल दोनों राज्यों में मुस्लिम समुदाय की आबादी 30 फीसदी के करीब है. दोनों राज्य की बांग्लादेश से सीमा लगने के चलते पहले से बीजेपी घुसपैठ के मुद्दे को सियासी हवा दे रही थी. शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार बांग्लादेश ही हिंसा बंगाल और असम में धार्मिक ध्रुवीकरण का माहौल बनता रहा था.
बीजेपी इस मुद्दे को 'हिंदुओं के अस्तित्व के संकट' के रूप में पेश कर रही है. शुभेंदु अधिकारी जैसे बीजेपी नेता इसे बंगाल के भविष्य से जोड़ रहे हैं, और 'बंगाल को बांग्लादेश नहीं बनने देंगे' जैसी बातें कर रहे हैं. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बांग्लादेश की स्थिति को 'गंभीर खतरा' बताया है. घुसपैठियों को लेकर हेमंत अभियान चलाए हुए हैं. ऐसे में अब बांग्लादेश के चुनाव में जिस तरह से बीएनपी को जीत मिली है और जमात-ए-इस्लामी को हार उठाना पड़ा है, उसका सियासी असर इन दोनों राज्यों पर पड़ सकता है.
बंगाल की राजनीति में कैसे पड़ेगा असर
बीजेपी की ओर से अभी तक बांग्लादेश की युनूस सरकार को निशाने पर लिया जा रहा था. चाहे वो घुसपैठ का मुद्दा हो या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या. बीजेपी की ओर से बंगाल में यूनुस के पुतले जलाये गए थे और कोलकाता में बांग्लादेश हाई कमीशन तक मार्च भी किया था. बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी की ओर से सैंकड़ों साधु संतों के साथ बीजेपी ने बांग्लादेश हाई कमीशन का घेराव कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी.
बंगाल में बीजेपी की राजनीति का बड़ा हिस्सा बांग्लादेश के हालातों पर निर्भर रहा है. ऐसे में बांग्लादेश में कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के चुनाव हारन और बीएनपी के जीत भारत के साथ सियासी रिश्ते को मजबूती तो मिलेगी ही साथ ही बंगाल और असम की राजनीति में अब धार्मिक ध्रुवीकरण का माहौल ठंडा पड़ेगा?
बंगाल और असम चुनाव पर सियासी प्रभाव
बांग्लादेश चुनाव को कवर करने ढाका गए वरिष्ठ पत्रकार अशोक राज कहते हैं कि बांग्लादेश के चुनावी नतीजे एक नई उम्मीद की किरण लेकर आया है. तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी को जिस तरह से जीत मिली है, उससे भारत के साथ अच्छे रिश्ते बन सकते हैं. जमात-ए-इस्लामी जैसी के सामने बीएनपी को उदारवादी पार्टी के तौर पर देखा जाता है. ऐसे में बीएनपी के आने के भारत में बांग्लादेश को लेकर जिस तरह का माहौल बन रहा था, उस पर विराम लगेगा.
अशोक राज कहते हैं कि इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि बांग्लादेश में जब चुनाव का ऐलान हुआ था तो भारत ने उसका स्वागत किया था. इसके बाद तारिक रहमान की मां और बीएनपी की नेता खालिदा जिया के निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश मंत्री जयशंकर को अपना दूत बनाकर बांग्लादेश भेजा था. जयशंकर पीएम मोदी के द्वारा खालिदा जिया के लिए लिखे श्रद्धांजलि पत्र भी साथ लेकर गए थे.
वह कहते हैं कि भारत के संसद में बजट सत्र के पहले दिन खालिदा जिया को श्रद्धांजलि दी गई थी. इससे एक बात साफ है कि भारत पूरी तरह से बांग्लादेश में लोकतांत्रिक बहाली का समर्थक था और बीएनपी के आने से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव कम होंगे तो उसका असर भारत में भी पड़ेगा. ऐसे में बंगाल और असम की सियासत में जो माहौल बनाया जा रहा था, उसमें कमी ही नहीं बल्कि रोक लगेगी.
बीएनपी सरकार क्या नई उम्मीद की किरण है?
बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकार का गठन हो रहा है. बंगाल में बीजेपी घुसपैठ का मुद्दा उठा रही थी तो टीएमसी भी घुसपैठ के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्रालय और बीएसएफ को ज़िम्मेदार ठहराने में जुटी, लेकिन अब बदलते हालातों में टीएमसी के लिए बांग्लादेश में स्थिर सरकार राजनीतिक बढ़त कीओर इशारा कर रही है. हालांकि राजनीति के अलावा भी बांग्लादेश के हालात सीधे तौर पर भारत को प्रभावित करते हैं, क्योंकि बांग्लदेश से होने वाली तस्करी से लेकर घुसपैठ पर रोक की उम्मीद लगाई जा रही है.
भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां कोई बाड़ नहीं है. इन्हीं इलाकों से जानवरों की तस्करी, नशीली दवाओं का व्यापार और नकली करेंसी का आना-जाना होता है. ऐसे में बांग्लादेश में मज़बूत और स्थिर सरकार के होने से इस पर विराम लग सकता है. बांग्लादेश की स्थिरता एक बड़ी चिंता है. एक मजबूत सरकार के साथ एक स्थिर बांग्लादेश का मतलब होगा कि सीमाएं सुरक्षित रहेंगी, क्योंकि अब दोनों पक्ष बातचीत करेंगे. भारत बांग्लादेश से आतंकवादियों की एंट्री को लेकर भी चिंतित है। ऐसे में मज़बूत सरकार होने से इस पर भी लगाम लगेगी.
धार्मिक कट्टरपंथ पर लगेगा विराम
मुताबिक मोहम्मद यूनुस के शासन में बांग्लादेश में आई एस आई की गतिविधियां बढ़ी हैं और पाकिस्तान के साथ उनके संबंध जगजाहिर है. इसके चलते कई कट्टरपंथियों और आतंकवादियों को रिहा भी किया गया. ऐसे में तारिक रहमान के नेतृत्व में मज़बूत बीएनपी सरकार के होने से भारत सीधे तौर पर बांग्लादेश के साथ इन मुद्दों पर चर्चा करने के साथ इन गतिविधियों पर विराम लगेगा.
शेख हसीना सरकार गिरने से पहले, काउंटर-टेररिज्म दोनों देशों के बीच संबंधों का एक अहम हिस्सा रहा है. दोनों देशों ने पहले जो काउंटर-टेरर ऑपरेशन किए हैं. ऐसे में वे बिना किसी रुकावट के हुए हैं. भारत चाहेगा कि यह संतुलन बना रहे और इसलिए, लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार का होना बहुत जरूरी है.
बांग्लदेश और भारत के रिश्ते मजबूत होंगे
बांग्लादेश और भारत लंबे समय से व्यापारिक साझेदार रहे हैं. भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए एक स्थिर बांग्लादेश बहुत जरूरी है. हसीना की सरकार के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध काफी अच्छे थे. दोनों देशों ने मिलकर आर्थिक सहयोग बढ़ाया था. इसमें व्यापार से आगे बढ़कर ऊर्जा सहयोग और बिजली का व्यापार भी शामिल था. और इन सभी का भविष्य फ़िलहाल अनिश्चित लग रहा है.
ऐसे में स्थिर मज़बूत बांग्लादेश सरकार के आने से व्यापार और आपसी सहयोग को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। सबसे बड़ी बात है कि बांग्लादेश भारत के लिए एक ट्रांजिट रूट भी है ख़ास तौर पर नार्थ ईस्ट के राज्यों के लिए। ऐसे में लोकतांत्रिक सरकार के होने से सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम होगी और फ़ायदा मिलेगा.