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मार्कशीट जला दो, मुझे इसकी जरूरत नहीं... 22 साल के छात्र नेता हिमंत ने अपनी ही डिग्री को लेकर कही थी ये बड़ी बात!

आज जब 126 सीटों के नतीजे आ रहे हैं, तो सबकी निगाहें इसी 'डॉक्टर' पर टिकी हैं. विपक्ष ने भले ही उन पर भ्रष्टाचार और अवसरवाद के आरोप लगाए हों, लेकिन उनका चुनावी हलफनामा अब तक बेदाग रहा है. वह अपनी लोकप्रियता, विकास के दावों और असमिया पहचान की लड़ाई के दम पर एक बार फिर सत्ता की दहलीज पर खड़े नजर आ रहे हैं.

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Himanta says Mamata Banerjee ‘scared’ as BJP pushes beef ban, UCC in Bengal
Himanta says Mamata Banerjee ‘scared’ as BJP pushes beef ban, UCC in Bengal

असम की राजनीति में एक कहावत मशहूर है कि सत्ता का रास्ता गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से होकर गुजरता है. आज चुनावी नतीजों के रुझानों में बढ़त बनाए हुए हिमंत बिस्वा सरमा इसी कॉलेज की उपज हैं. उनके दोस्त याद करते हैं कि जब कॉलेज के दिनों में सब अपनी डिग्रियों को सहेज रहे थे, तब 22 साल के हिमंत कहते थे कि मेरी मार्कशीट जला दो, मुझे इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि एक दिन मैं असम का मुख्यमंत्री बनूंगा.

10 साल की उम्र में शुरू हुआ सियासी सफर
1969 में जोरहाट के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे हिमंत का बचपन गुवाहाटी में बीता. उनके पिता कैलाश नाथ सरमा एक कवि थे, लेकिन बेटे का मन राजनीति में रमा था. महज 10-12 साल की उम्र में जब असम 'बाहरी' लोगों के खिलाफ आंदोलनों से जल रहा था, तब हिमंत ने छात्र राजनीति में कदम रख दिया था. दिलचस्प बात यह है कि वह एक बाल कलाकार भी रहे हैं और एक असमिया फिल्म में हाथी पर सवार होकर गाना भी गा चुके हैं.

पढ़ाई में भी रहे अव्वल
भले ही वह मार्कशीट जलाने की बात करते थे, लेकिन पढ़ाई में वह हमेशा अव्वल रहे. उनका शैक्षणिक सफर किसी भी युवा के लिए प्रेरणा है. हिमंत ने राजनीति विज्ञान में गुवाहाटी विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की है. उन्होंने गुवाहाटी के सरकारी लॉ कॉलेज से एलएलबी किया और राजनीति में पूरी तरह उतरने से पहले वकालत भी की. राज्य के प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज से उन्होंने राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन पूरा किया.

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वक्ता ऐसे कि हारकर भी जीत गए
1996 में वह पहली बार चुनाव हार गए थे लेकिन हार ने उन्हें और मजबूत बनाया. साल 2001 में वह पहली बार विधानसभा पहुंचे और तब से जलुकबाड़ी सीट पर उनका कब्जा बरकरार है. कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले हिमंत 2015 में बीजेपी में शामिल हुए और अपनी मेहनत के दम पर पूर्वोत्तर में पार्टी का सबसे बड़ा स्तंभ बन गए.

आज जब 126 सीटों के नतीजे आ रहे हैं, तो सबकी निगाहें इसी 'डॉक्टर' पर टिकी हैं. विपक्ष ने भले ही उन पर भ्रष्टाचार और अवसरवाद के आरोप लगाए हों, लेकिन उनका चुनावी हलफनामा अब तक बेदाग रहा है. वह अपनी लोकप्रियता, विकास के दावों और असमिया पहचान की लड़ाई के दम पर एक बार फिर सत्ता की दहलीज पर खड़े नजर आ रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में हिमंत बिस्वा सरमा के करीबियों ने कई दिलचस्प खुलासे किए हैं, जो बताते हैं कि उनके भीतर नेतृत्व की क्षमता बचपन से ही थी. उनके दोस्त राहुल महंता ने कहा था कि करीब तीस साल पहले हॉस्टल में उनके साथ रहते थे. जब हम ग्रेजुएशन के बाद अपनी मार्कशीट्स को लेकर गंभीर थे, तब हिमंत बिल्कुल बेपरवाह थे. उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम मेरी मार्कशीट जला सकते हो, मुझे इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी. वो 22 साल की उम्र में ही स्पष्ट थे कि उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में करियर बनाना है और वह अक्सर कहते थे कि एक दिन मैं असम का मुख्यमंत्री बनूंगा.

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उनके चाचा सोमनाथ बताते हैं कि राजनीति के प्रति हिमंत का आकर्षण बहुत कम उम्र में ही जाग गया था. उनके मुताबिक हिमंत ने 10-12 साल की उम्र में ही राजनीति में कदम रख दिया था, उस समय पूरे राज्य में 'बाहरी' लोगों के खिलाफ आंदोलन का दौर था.

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