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क्यों ईरान के 450 Kg यूरेनियम के पीछे पड़ा है अमेरिका? जान‍िए केमेस्ट्री की इस खोज के बारे में 

यूरेनियम के 1 ग्राम से मिलती है 3 टन कोयले के बराबर ऊर्जा! आखिर किसने खोजा था यह तत्व, पीरियोडिक टेबल के किस कोने में छिपा है यह और ईरान के पास मौजूद 450 किलो यूरेनियम से क्या-क्या हो सकता है? आसान भाषा में समझें पूरा साइंस.

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Iran Uranium (Photo: ITG)
Iran Uranium (Photo: ITG)

पूरी दुनिया में इस वक्त ईरान के 450 किलोग्राम एनरिच्ड यूरेनियम को लेकर हड़कंप मचा है. अमेरिका इसे किसी भी कीमत पर कंट्रोल करना चाहता है क्योंकि 60% तक शुद्ध यह यूरेनियम परमाणु बम बनाने की दहलीज पर है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक मामूली सी दिखने वाली धातु इतनी शक्तिशाली कैसे हो गई? आइए, इसकी खोज से लेकर इसकी केमिस्ट्री तक सब कुछ समझते हैं.

किसने की थी यूरेनियम की खोज?

यूरेनियम की खोज का श्रेय जर्मन केमिस्ट मार्टिन हेनरिक क्लाप्रोथ को जाता है. उन्होंने 1789 में 'पिचब्लेंड' नामक खनिज से इसे अलग किया था. दिलचस्प बात यह है कि इसका नाम उस समय खोजे गए नए ग्रह 'यूरेनस' के सम्मान में रखा गया था. हालांकि, इसकी 'रेडियोएक्टिविटी' का पता 1896 में हेनरी बेकेरल ने लगाया था.

पीरियोडिक टेबल में कहां है यूरेनियम? 

  • सिंबल -U
  • एटॉमिक नंबर- 92 (यानी इसमें 92 प्रोटॉन होते हैं)
  • ग्रुप- यह Actinide (एक्टिनाइड) सीरीज का सदस्य है.
  • जगह- पीरियोडिक टेबल के बिल्कुल नीचे जो दो लंबी कतारें अलग से दी होती हैं, उनमें से ऊपर वाली लाइन में यह पाया जाता है.

क्यों है यह 'हीरे' से भी कीमती?

यूरेनियम की कीमत इसकी एनर्जी डेंसिटी में है. अगर 90% शुद्ध यूरेनियम का एक फुटबॉल जितना हिस्सा मिल जाए, तो वह पूरे एक शहर को साल भर बिजली दे सकता है या फिर एक सेकंड में पूरे शहर को तबाह कर सकता है. ईरान के पास मौजूद 450 किलो यूरेनियम अगर 90% एनरिच कर दिया जाए, तो इससे 10 से 12 परमाणु बम आसानी से तैयार किए जा सकते हैं.

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यूरेनियम के 3 बड़े सच

  • प्राकृतिक उपलब्धता: यह मिट्टी, चट्टानों और समुद्र के पानी में भी मिलता है, लेकिन इसे निकालना बहुत महंगा है.
  • वजन: यह लोहे से करीब 2.5 गुना भारी होता है.
  • हाफ-लाइफ: यूरेनियम-238 की उम्र 4.5 अरब साल होती है, यानी यह कभी खत्म नहीं होता.

ईरान के पास इतना 'जखीरा' आया कहां से?

ईरान के पास 450 किलोग्राम एनरिच्ड यूरेनियम का होना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि उसके 'न्यूक्लियर प्रोग्राम' का नतीजा है. इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

भूमिगत खदानें और तकनीक: ईरान के पास अपनी यूरेनियम खदानें हैं (जैसे 'सगंद' खदान). उसने हजारों 'सेंट्रीफ्यूज' मशीनें लगा रखी हैं, जो कच्चे यूरेनियम को शुद्ध करने का काम करती हैं.

परमाणु समझौते का टूटना: 2015 में दुनिया के देशों के साथ ईरान का एक समझौता हुआ था (JCPOA), जिसमें उसे एक सीमित मात्रा से ज्यादा यूरेनियम रखने की इजाजत नहीं थी. लेकिन 2018 में अमेरिका के इस समझौते से बाहर निकलने के बाद, ईरान ने पाबंदियां तोड़ दीं और तेजी से यूरेनियम स्टॉक करना शुरू कर दिया.

बिजली या बम? का विवाद: ईरान हमेशा कहता है कि उसे यह यूरेनियम सिर्फ बिजली बनाने और मेडिकल रिसर्च के लिए चाहिए. लेकिन अमेरिका का दावा है कि ईरान जिस 60% शुद्धता तक पहुंच गया है, उतनी शुद्धता बिजली बनाने के लिए नहीं, बल्कि परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ा कदम है.

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