किताबों की डिग्रियां और बड़े-बड़े संस्थानों के सर्टिफिकेट ही सफलता की गारंटी नहीं होते, इस बात को उत्तराखंड के एक साधारण युवा ने साबित कर दिखाया है. अल्मोड़ा जिले के काफ्लिखान गांव के रहने वाले रवि टम्टा ने बिना किसी फॉर्मल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के, केवल इंटरनेट और अपने दम पर एक इलेक्ट्रिक 'फ्लाइंग कार' का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है.
उनके इस सिंगल-सीटर वाहन 'HAPIDA SKYNeX' ने पिछले दिनों अपनी सफल टेस्ट फ्लाइट भी पूरी कर ली है. यह साबित करता है कि अगर कुछ सीखने का जज्बा हो, तो क्लासरूम की चारदीवारी भी आपकी सफलता के आड़े नहीं आती.
पहाड़ की मुश्किलों से आया फ्लाइंग कार का आइडिया
रवि का यह सफर आसान नहीं था. वे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में पढे-बढ़े हैं, जहां पहाड़ी रास्तों की वजह से सफर करना कितना मुश्किल होता है, यह किसी से छिपा नहीं है. खासकर, मेडिकल इमरजेंसी या अस्पताल पहुंचने के लिए लंबे और घुमावदार रास्तों का सामना करना पड़ता है. इसी परेशानी से निजात पाने के लिए रवि के मन में पर्सनल एयर मोबिलिटी (उड़ने वाले वाहन) का ख्याल आया था.
उन्होंने साल 2015 में इस सपने पर काम करना शुरू किया और अपनी कंपनी 'Hapida Sky Private Limited' के जरिए इस प्रोटोटाइप को जमीन पर उतारा. यह गाड़ी बिना किसी रनवे के वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग (VTOL) करने में सक्षम है. इसमें ड्रोन की तरह कई इलेक्ट्रिक मोटर्स और प्रोपेलर्स का इस्तेमाल किया गया है. यह बैटरी से चलने वाला वाहन है, जिसमें किसी एविएशन फ्यूल की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि, यह अभी शुरुआती चरण में है और इसे कमर्शियल तौर पर पैसेंजर ढोने में अभी वक्त लगेगा.
इंटरनेट बना गुरु और पिता बने प्रेरणा
रवि ने गांव के स्कूल से शुरुआती पढ़ाई करने के बाद नैनीताल कैंपस से बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) की डिग्री ली. उनके पिता हरीश राम एक मैकेनिक हैं. घर में कोई बड़ा टेक्निकल बैकग्राउंड न होने के बावजूद रवि ने हार नहीं मानी. बिना किसी लैब या महंगे उपकरणों के उन्होंने इंटरनेट को ही अपना क्लासरूम बनाया और सालों की टेस्टिंग के बाद इस मुकाम को हासिल किया.
यह पहली बार नहीं है जब रवि ने कोई अनोखा आविष्कार किया हो. इससे पहले वे मोबाइल चार्ज करने वाले जूते, दृष्टिबाधित लोगों के लिए स्मार्ट छड़ी, बांस चीरने वाली मशीन और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के लिए फायर फाइटिंग इक्विपमेंट भी बना चुके हैं.
पहाड़ों के सफर को आसान बनाने की उनकी यह कोशिश भले ही अभी रेगुलेटरी अप्रूवल्स और डीजीसीए (DGCA) की मंजूरियों के दौर से गुजर रही हो, लेकिन उनकी यह कहानी देश के करोड़ों युवाओं को यह सिखाती है कि जिज्ञासा और कड़ी मेहनत से किसी भी नामुमकिन लगने वाले सपने को सच किया जा सकता है!