जैसे ही मैंने 'चलो संसद' प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर के बीच से गुजरना शुरू किया, तो जहां तक नजर जा रही थी, सिर्फ लोगों का हुजूम ही दिखाई दे रहा था. हर कुछ कदमों पर कोई न कोई प्लेकार्ड थामे, नारे लगाता या माइक पर अपनी बात रखता नजर आ रहा था. वहां मौजूद लोगों ने बताया कि पिछले दो दिनों में यह जमावड़ा काफी बड़ा हो गया है. छात्र, उनके माता-पिता और आम नागरिक कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे.
वहां मौजूद हर शख्स ने NEET की परीक्षा नहीं दी थी. कई लोगों का तो इस प्रवेश परीक्षा से सीधा कोई लेना-देना ही नहीं था.
वहां स्कूल और कॉलेज के छात्र थे, नौकरीपेशा लोग थे और पूरा-पूरा परिवार आया हुआ था. स्वयंसेवक पानी की बोतलों के कार्टन लेकर घूम रहे थे, खाने का सामान बांटा जा रहा था. कोई भी वहां अकेला नहीं दिख रहा था. अजनबी एक-दूसरे की मदद कर रहे थे, एक-दूसरे की कहानियां सुन रहे थे और सभी को यह याद दिला रहे थे कि वे यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं.
मैंने वहां जितने भी लोगों से बात की, हर किसी के पास इस प्रदर्शन में शामिल होने की अपनी अलग वजह थी. तभी मेरी मुलाकात दिल्ली यूनिवर्सिटी में संगीत (Music) की पढ़ाई कर रही 22 वर्षीय स्नेहा आर्या से हुई. वो वहां इसलिए नहीं आई थी कि उसने NEET की परीक्षा दी थी. वह वहां इसलिए थी क्योंकि भ्रष्टाचार ने उससे उसके सबसे प्यारे इंसान, उसके पिता को छीन लिया था.
खोने के दर्द में छिपा एक विरोध
स्नेहा का मानना है कि लोग अक्सर NEET परीक्षा के पेपर लीक के असर को बहुत छोटा समझ लेते हैं. वो कहती हैं, 'लोग सोचते हैं कि नीट पेपर लीक एक छोटी सी बात है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. यह परीक्षा उन डॉक्टरों को चुनती है, जो बीमार होने पर या अस्पतालों में संकट के वक्त हमारी देखभाल करते हैं.'
उसके लिए एक पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षा की बहस सिर्फ दाखिले (Admissions) तक सीमित नहीं है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि देश किस तरह के डॉक्टर तैयार कर रहा है और लोग अपने सबसे मुश्किल क्षणों में उन पर कितना भरोसा करते हैं. उसका यह अटूट विश्वास एक बेहद दर्दनाक व्यक्तिगत हादसे से आया है.
आखिर स्नेहा के प्रदर्शन में शामिल होने की वजह क्या थी?
बातचीत के दौरान स्नेहा ने अपने पिता की दर्दनाक कहानी साझा की. उसने बताया कि एक बार उसके पिता पर जानलेवा हमला हुआ था, जिसके बाद उन्होंने इंसाफ पाने की बहुत कोशिश की. लेकिन कथित तौर पर उनकी शिकायत पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. उसने बताया,'मेरे पिता को बुरी तरह पीटा गया था, लेकिन जब हमने थाने में FIR दर्ज कराने की कोशिश की, तो कुछ नहीं हुआ.'
बाद में, एक दिन उनके सीने में तेज दर्द हुआ. 'जब हम उन्हें लेकर अस्पताल पहुंचे, तो वहां एक ट्रेनी डॉक्टर मौजूद था. उसने बिना कोई सही जांच किए तुरंत कह दिया कि इन्हें हार्ट अटैक आया है.' इसके तुरंत बाद परिवार से बहुत बड़ी रकम का इंतजाम करने को कहा गया. स्नेहा ने रुंधे गले से बताया, 'उन्होंने हमसे कहा कि एक घंटे के भीतर पैसों का इंतजाम करो, वरना वे मेरे पिता को नहीं बचा पाएंगे. उन्होंने हमें ब्लैकमेल किया.' उसने आगे कहा कि वे लोग इतने डरे हुए थे कि समझ ही नहीं आ रहा था कि आगे क्या करें.
...और स्नेहा के पिता की जान चली गई.
'मुझे लगता है कि जब कोई अपनी मेहनत से डॉक्टर बनता है, तो वह ऐसी हरकत कभी नहीं करता. ऐसे लोग या तो पैरवी (सपोर्ट) से डॉक्टर बनते हैं या फिर भ्रष्टाचार के दम पर. और पेपर लीक जैसी घटनाएं इसी भ्रष्ट तंत्र को और मजबूत करती हैं,' उसने कहा.'मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ हूं,' उसने दृढ़ता से जोड़ा. 'और मैं आज यहां अपने पिता के लिए खड़ी हूं.'
स्नेहा के लिए यह लड़ाई पूरे सिस्टम को बचाने की है. स्नेहा के लिए यह विरोध-प्रदर्शन सिर्फ NEET परीक्षा तक सीमित नहीं है. यह सरकारी और सार्वजनिक संस्थाओं की साख बचाने की लड़ाई है, ताकि योग्यता की जगह पैरवी और पैसों का बोलबाला न हो. उन्होंने कहा कि'मेरी मुख्य मांग यह है कि संविधान, संविधान ही रहे और इसके साथ कोई खिलवाड़ न किया जाए. व्यवस्था की निष्पक्षता को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए.' उसका मानना है कि समस्या देश के संस्थानों में नहीं है, बल्कि उन लोगों में है जो इनका गलत इस्तेमाल करते हैं.
स्नेहा ने कहा कि सिस्टम में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन लोग भ्रष्ट हैं और वे पूरे सिस्टम को भ्रष्ट बना रहे हैं. जब उनसे पूछा कि जो लोग दूर बैठकर इस प्रदर्शन को देख रहे हैं, उनके लिए वह क्या संदेश देना चाहेगी, तो उसने कहा कि जब तक हम एकजुट हैं, तब तक हम इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ लड़ सकते हैं और अपने हक के लिए खड़े हो सकते हैं. हमें एकजुट रहना चाहिए और एक-दूसरे के साथ खड़े रहना चाहिए.
स्नेहा के लिए इस आंदोलन से जुड़ना यह सुनिश्चित करने का तरीका था कि उसका व्यक्तिगत नुकसान जवाबदेही की एक बड़ी मांग का हिस्सा बने, हजारों आवाज़ों के बीच एक ऐसी आवाज़, जो एक निष्पक्ष व्यवस्था की मांग कर रही थी.
हजारों के हुजूम में स्नेहा की आवाज दिल को छू गई
प्रदर्शन स्थल पर आगे बढ़ते हुए मेरी मुलाकात कई और लोगों से हुई, जिनकी अपनी-अपनी कहानियां थीं. कुछ लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके आए थे, कुछ चिंतित माता-पिता थे, तो कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र थे. कुछ लोग सिर्फ इसलिए आ गए थे क्योंकि उन्हें लगा कि इस मोड़ पर चुप रहना गलत होगा.
लेकिन स्नेहा की कहानी मेरे दिल में उतर गई.
इंसाफ, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग से भरे इस आंदोलन में, उसके वहां मौजूद होने की वजह एक प्रवेश परीक्षा के दायरे से कहीं आगे जाती थी. उसके लिए, यह लड़ाई उस पिता के लिए थी, जिसे उसके मुताबिक इस सिस्टम ने दगा दिया था. नारों, बैनरों और उठी हुई मुट्ठियों के उस समंदर के बीच खड़ी होकर स्नेहा सिर्फ एक पेपर लीक के खिलाफ विरोध नहीं दर्ज करा रही थी, वह पूरे देश से यह समझने की गुहार लगा रही थी कि भ्रष्टाचार की कीमत किसी की जिंदगी भी हो सकती है.