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'नहीं पता और कितने दिन जिंदा रहूंगी... प्लीज साथ दो!' 13 दिन से भूख हड़ताल पर बैठी हबीबा का छलका दर्द

झारखंड सरकार की भ्रष्ट परीक्षा प्रणाली और पंचायत सचिव भर्ती में 9 साल की नाइंसाफी के खिलाफ बोकारो की हबीबा का सत्याग्रह जारी है. 13 दिनों की भूख हड़ताल से हबीबा का 8 किलो वजन कम हो चुका है, लेकिन उनका हौसला अटूट है. रांची के स्टेडियम में डटीं हबीबा ने साफ कर दिया है कि बिना जंग जीते वे घर नहीं लौटेंगी.

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हबीबा ही नहीं दो और मह‍िला अभ्यर्थी भी कर रहीं भूख हड़ताल
हबीबा ही नहीं दो और मह‍िला अभ्यर्थी भी कर रहीं भूख हड़ताल

'रात से तबियत बहुत बिगड़ चुकी है... शरीर साथ छोड़ रहा है, 8 किलो वजन घट चुका है. लेकिन मां ने कहा है, घर आओगी तो जंग जीतकर ही आना!'  रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में चल रहे प्रतियोगी छात्रों के आंदोलन के बीच से आया यह बयान किसी एक लड़की की बेबसी नहीं, बल्कि झारखंड के पूरे परीक्षा सिस्टम की लाचारी को बयां कर रहा है. जेएसएससी और जेपीएससी (JSSC-JPSC) में बड़े सुधारों और परीक्षाओं में हुई धांधली की जांच की मांग को लेकर राजभवन और स्टेडियम के बाहर डटे अभ्यर्थियों के आंदोलन का आज 23वां दिन है.

इस सत्याग्रह का एक दर्दनाक और उग्र चेहरा बनी हैं बोकारो के कसमार (सुरजुडी) की रहने वाली हबीबा, जो पिछले 13 दिनों से बेमियादी भूख हड़ताल पर बैठी हैं. अस्पताल की चौखट और धरने के मंच के बीच जिंदगी से जूझ रहीं हबीबा ने aajtak.in को अपना एक वीड‍ियो मैसेज भेजा है.

वीडियो में बेहद कमजोर आवाज में हबीबा कहती हैं, ' मुझे नहीं पता कि मैं और कितने दिन जिंदा रहूंगी, लेकिन मुझे इस भ्रष्ट और तानाशाही रवैये वाले सिस्टम से लड़ना है. यह सिस्टम दीमक की तरह हमारे बच्चों के भविष्य को खा चुका है और पैसों में डिग्रियां व नौकरियां बेच रहा है. मेरा शरीर कमजोर हो रहा है, चक्कर आ रहे हैं, लेकिन जब तक यह जंग जीत नहीं लेती, पीछे नहीं हटूंगी.' 

हबीबा ने भावुक अपील करते हुए पूरे झारखंड और देशवासियों से इस लड़ाई में कंधा से कंधा मिलाकर खड़े होने का आह्वान किया है.

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10 साल का संघर्ष, 1 दिन की उम्र ने छीना हक!
हबीबा की यह लड़ाई सिर्फ आज की नहीं है. 5 भाइयों और 3 बहनों के बड़े परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाए हबीबा साल 2017 से सरकारी सिस्टम की मार झेल रही हैं. हबीबा ने बताया कि 12वीं पास करने के बाद उन्होंने परीक्षा दी और सरकारी भर्ती परीक्षा में पास भी हो गईं. एक साल हिंदी टाइपिंग और फिर एक साल डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में निकल गया. जब फाइनल रिजल्ट आया, तो महज 1 दिन उम्र कम होने का हवाला देकर हबीबा का चयन रोक दिया गया.

3 अटेंप्ट और 9 साल बर्बाद
2022 में बाकी अभ्यर्थियों की जॉइनिंग हो गई, लेकिन हबीबा आज तक थर्ड लिस्ट का इंतजार कर रही हैं. JPSC में 3 अटेंप्ट दे चुकी हबीबा के किसान पिता बीमार हैं और भाई पेंटिंग-वेल्डिंग का काम कर घर का खर्च उठा रहे हैं. वहीं रांची में प्रोटेस्ट की ताजा स्थिति यह है कि एक तरफ सरकार और मंत्रियों का दावा है कि छात्रों की जायज मांगों पर दो दौर की वार्ता हो चुकी है, सीआईडी जांच चल रही है और आईआईटी-आईआईएम के विशेषज्ञों को मिलाकर परीक्षा सुधार कमेटी बनाई जा रही है.

लेकिन दूसरी तरफ, धरनास्थल पर डटे छात्रों का गुस्सा चरम पर है. अभ्यर्थियों ने हाल ही में सरकार के बयानों को '25 रटे-रटाए बहाने' करार देकर सोशल मीडिया पर पूरी लिस्ट जारी कर दी है. अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार सिर्फ टाइम पास कर रही है, जबकि हबीबा जैसी बेटियों की जान जोखिम में पड़ी हुई है.
 

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