जबलपुर में एक पिता रोज फुटपाथ पर स्कूल बैग बेचकर परिवार चलाते हैं. उनकी दुकान के ठीक सामने बने सरकारी स्कूल में उनका बेटा पढ़ता था. सुबह स्कूल जाने से पहले वह पिता की दुकान लगवाता, शाम को दुकान समेटने में हाथ बंटाता और फिर पढ़ाई करता. इसी मेहनत और हौसले के दम पर ओम चौकसे ने NEET परीक्षा पास कर डॉक्टर बनने की राह पकड़ ली. यह सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों, संघर्ष और एक पिता के भरोसे की कहानी है.
जबलपुर के मॉडल हाई सेकेंडरी स्कूल के बाहर फुटपाथ पर रमेश चौकसे छोटी-सी दुकान लगाते हैं. दुकान में रंग-बिरंगे स्कूल बैग टंगे रहते हैं. रमेश चौकसे की नजर सिर्फ ग्राहकों पर नहीं होती, उनकी नजर बार-बार स्कूल के गेट की ओर चली जाती थी, जहां उनका बेटा ओम चौकसे बैग कंधे पर टांगे स्कूल के अंदर जाता था. शायद उस वक्त रमेश चौकसे भी नहीं जानते थे कि एक दिन इसी स्कूल से पढ़ने वाला उनका बेटा डॉक्टर बनने की राह पर निकल पड़ेगा.

ओम किसी संपन्न परिवार से नहीं आते. घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि हर दिन की कमाई से ही अगले दिन का खर्च चलता था. पिता फुटपाथ पर स्कूल बैग बेचते हैं. उसी कमाई से परिवार का खर्च चलता है और बच्चों की पढ़ाई भी.
लेकिन घर की तंगी ने कभी ओम के सपनों की ऊंचाई कम नहीं की. स्कूल जाने से पहले ओम का दिन किताबों से नहीं, पिता की दुकान से शुरू होता था. वह सुबह घर से निकलकर सबसे पहले फुटपाथ पर दुकान लगाने में पिता का हाथ बंटाते. बैग सजाते, सामान व्यवस्थित करते और फिर स्कूल में अपनी क्लास में पहुंच जाते. शाम को छुट्टी होने के बाद फिर उसी दुकान पर लौटते. पिता के साथ दुकान समेटते और फिर घर जाकर पढ़ाई में जुट जाते.
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यही ओम की रोज की दिनचर्या थी. ओम बचपन से पढ़ाई में तेज थे. उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि घर की हालत उनके सपनों की सीमा तय करेगी. दसवीं बोर्ड परीक्षा में ओम ने पूरे मध्य प्रदेश में सातवां स्थान हासिल किया. इसके बाद 12वीं बोर्ड परीक्षा में भी वह प्रदेश के टॉप-10 छात्रों में शामिल रहे. स्कूल के शिक्षक भी उनकी मेहनत और लगन की मिसाल देते थे. ओम की जिंदगी में एक ऐसा पल भी आया, जिसने उनके सपने की दिशा तय कर दी.
कुछ साल पहले हार्ट अटैक से उसकी दादी का निधन हो गया. परिवार इस दुख से उबर भी नहीं पाया था कि ओम ने मन ही मन एक फैसला कर लिया. ओम ने तय किया कि वह डॉक्टर बनेंगे. ऐसा डॉक्टर, जो मरीजों को बेहतर इलाज दे सके और किसी परिवार को इलाज की कमी की वजह से अपनों को खोने का दर्द न झेलना पड़े. यही सपना ओम के संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत बन गया.

NEET की तैयारी आसान नहीं थी. कंपटीशन लाखों छात्रों के बीच था. फिर परीक्षा से जुड़ा विवाद और पेपर लीक की घटना भी सामने आई. लेकिन ओम ने हार नहीं मानी. पढ़ाई जारी रखी और दोबारा पूरे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा दी.
री-NEET के घोषित नतीजों में ओम ने 720 में से 521 अंक हासिल कर पहली ही कोशिश में परीक्षा पास कर ली. इससे पहले हुई परीक्षा में उसके 625 अंक आए थे, लेकिन पेपर लीक के बाद बदली परिस्थितियों ने हौसले को कमजोर नहीं होने दिया. ओम की सफलता सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार की जीत है.
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पिता रमेश चौकसे कहते हैं कि उन्होंने हमेशा बेटे को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. आर्थिक मुश्किलें जरूर थीं, लेकिन कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि सपने पैसे देखकर पूरे होते हैं. उन्हें विश्वास था कि बेटा मेहनत करेगा तो मंजिल जरूर मिलेगी. आज जब ओम ने NEET पास कर लिया है, तो उन्हें लगता है कि उनकी वर्षों की मेहनत रंग लाई है.

मां वेदांती चौकसे भी बेटे की इस सफलता को ओम की मेहनत और अनुशासन का परिणाम मानती हैं. उनका कहना है कि ओम ने कभी हालात का बहाना नहीं बनाया. वह जितनी जिम्मेदारी से पढ़ाई करता था, उतनी ही जिम्मेदारी से घर और पिता की दुकान में भी हाथ बंटाता था.
ओम की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें संघर्ष सिर्फ आर्थिक नहीं था. यहां हर दिन समय से लड़ाई थी. सुबह दुकान, दिन में स्कूल, शाम को फिर दुकान और रात में पढ़ाई. लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की. आज भी स्कूल के बाहर रमेश चौकसे की बैग की दुकान लगती है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब उस दुकान को देखने वालों के लिए वह सिर्फ बैग बेचने की जगह नहीं रही. वह इस बात की गवाही देती है कि सपनों की कोई कीमत नहीं होती. मेहनत, अनुशासन और हौसला हो तो फुटपाथ से भी डॉक्टर बनने का सफर शुरू किया जा सकता है. ओम अब डॉक्टर बनना चाहते हैं. वह मानते हैं कि जिंदगी ने संघर्ष सिखाया है और यही संघर्ष आगे चलकर उन्हें एक बेहतर डॉक्टर बनाएगा.