'उस दिन मैं सिर्फ आठवीं क्लास में पढ़ती थी. पापा अस्पताल में थे, लेकिन इलाज पूरा नहीं हो पाया. वजह... घर में पैसे नहीं थे. फिर एक दिन पापा चले गए. उसी दिन मैंने तय कर लिया कि डॉक्टर बनूंगी, ताकि किसी और बेटी को गरीबी की वजह से अपने पिता को न खोना पड़े.'
यह कहानी लखनऊ की रहने वाली नीलू की जिंदगी है. ऐसी बेटी, जिसने गरीबी को अपनी किस्मत नहीं बनने दिया. जिसने पिता को खोने के दर्द को हार नहीं, बल्कि अपने सपने की सबसे बड़ी वजह बना लिया. और आज उसी जिद ने उसे NEET-UG की परीक्षा पास कराकर डॉक्टर बनने की राह पर खड़ा कर दिया है.
लखनऊ के गोमतीनगर स्थित डिगडिया गांव की नीलू तब सिर्फ आठवीं कक्षा में थीं, जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. परिवार चाहता था कि उनका बेहतर इलाज हो, लेकिन जेब में उतने पैसे नहीं थे. इलाज अधूरा रह गया और परिवार ने अपने सबसे बड़े सहारे को खो दिया. नीलू आज भी उस दिन को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं.
वह कहती हैं कि हमने गरीबी में अपने पापा को खो दिया. अगर उस समय इलाज के पैसे होते तो शायद वो आज हमारे साथ होते. उसी दिन मैंने तय किया कि डॉक्टर बनूंगी. मैं नहीं चाहती कि कोई और परिवार सिर्फ पैसों की कमी की वजह से किसी अपने को खो दे. यहीं से एक बेटी की जिद शुरू होती है. सपना सिर्फ डॉक्टर बनने का नहीं, बल्कि उन लोगों का सहारा बनने का, जिनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं होते.
मां ने घरों में झाड़ू-पोछा किया, बेटी ने किताबों से रिश्ता नहीं छोड़ा
पिता के जाने के बाद पूरा घर मां राजकुमारी के भरोसे रह गया. तीन बेटियों की जिम्मेदारी, घर का खर्च और भविष्य की चिंता... सब कुछ एक साथ उनके कंधों पर आ गया. राजकुमारी ने हार नहीं मानी. उन्होंने अस्पताल में सहायक के तौर पर काम किया. इसके अलावा घर-घर जाकर झाड़ू-पोंछा भी किया. सुबह से शाम तक मेहनत के बाद भी उनकी महीने की कमाई करीब 10 से 11 हजार रुपये ही होती थी.
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इतनी कम आमदनी में घर चलाना ही मुश्किल था. लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटियों की पढ़ाई नहीं रुकने दी. अपनी जरूरतें कम कर दीं, लेकिन बेटियों के सपनों पर आंच नहीं आने दी. नीलू कहती हैं कि मां ने कभी महसूस नहीं होने दिया कि घर में कितनी मुश्किलें हैं. उन्होंने हमेशा कहा- तुम बस पढ़ाई करो, बाकी मैं संभाल लूंगी.
स्कॉलरशिप बनी सपनों की सीढ़ी
नीलू बचपन से पढ़ाई में तेज थीं. शुरुआती पढ़ाई उन्होंने गर्ल्स स्कूल से की. दसवीं बोर्ड में 86 फीसदी अंक हासिल किए. उनकी मेहनत को पहचान मिली तो 11वीं में स्कूल में स्कॉलरशिप मिल गई. यहां उन्हें बेहतर पढ़ाई का माहौल मिला. नतीजा यह रहा कि 12वीं की CBSE परीक्षा में उन्होंने 94 प्रतिशत अंक हासिल किए.
नीलू का चयन देश की प्रतिष्ठित Vahani स्कॉलरशिप के लिए भी हुआ. यह स्कॉलरशिप हर साल देशभर के सिर्फ चुनिंदा मेधावी छात्रों को मिलती है. इसके जरिए उनकी मेडिकल पढ़ाई की ट्यूशन फीस और दूसरे शैक्षणिक खर्च उठाए जाएंगे. यानी जिस परिवार के लिए मेडिकल की फीस की कल्पना करना भी मुश्किल था, अब उसी बेटी की पढ़ाई की जिम्मेदारी स्कॉलरशिप उठा रही है.
NEET सिर्फ परीक्षा नहीं, एक वादा था
नीलू के लिए NEET सिर्फ एक एंट्रेंस एग्जाम नहीं था. यह उस वादे की पहली सीढ़ी थी, जो उन्होंने पिता की मौत के बाद खुद से किया था. वह कहती हैं कि मैं कार्डियोलॉजिस्ट बनना चाहती हूं. गरीब और जरूरतमंद लोगों का समय पर इलाज करना चाहती हूं. मैं नहीं चाहती कि किसी परिवार को सिर्फ पैसों की वजह से अपने किसी प्रियजन को खोना पड़े.
नीलू अपनी सफलता का श्रेय सिर्फ खुद को नहीं देतीं. वह कहती हैं कि गर्ल्स स्कूल ने उन्हें यह भरोसा दिया कि इंसान की पहचान उसका बैकग्राउंड नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और शिक्षा तय करती है. उनके मुताबिक, मुझे हमेशा यही सिखाया गया कि हालात कैसे भी हों, शिक्षा आपकी जिंदगी बदल सकती है. मैं चाहती हूं कि मेरी कहानी देखकर दूसरी लड़कियां भी बड़े सपने देखने की हिम्मत करें.
'इरादा बड़ा हो तो गरीबी रास्ता रोक सकती है, मंजिल नहीं'
यह सिर्फ नीलू की जीत नहीं है... यह कहानी सिर्फ एक लड़की के NEET पास करने की नहीं है. यह उस मां की कहानी है, जिसने अपनी थकान छिपाकर बेटी के सपनों को जिंदा रखा. यह उस बेटी की कहानी है, जिसने पिता की मौत को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया. यह उन हजारों परिवारों की कहानी भी है, जहां सपने अक्सर पैसों के आगे छोटे पड़ जाते हैं.
नीलू ने दिखा दिया कि अगर इरादा बड़ा हो, तो गरीबी रास्ता रोक सकती है, मंजिल नहीं. आज उनके हाथ में NEET की सफलता है. कल इसी हाथ में डॉक्टर का स्टेथोस्कोप होगा. और शायद किसी अस्पताल में एक गरीब मरीज के सामने खड़ी नीलू को हर बार अपने पिता की याद आएगी. क्योंकि यह सफर सिर्फ डॉक्टर बनने का नहीं, बल्कि उस अधूरे इलाज का जवाब है, जिसने एक बेटी से उसके पिता छीन लिए थे.