एक छात्र डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखता है. वह फॉर्म भरता है, नामचीन कोचिंग ज्वाइन करता है, महंगी टेस्ट सीरीज खरीदता है, घर से दूर हॉस्टल या पीजी में रहता है, किताबें खरीदता है और कई बार एक-दो नहीं, बल्कि तीन-तीन साल तक जी-तोड़ तैयारी करता है.
उसके इस लंबे और थका देने वाले सफर में बहुत से लोग मोटी कमाई करते हैं. कोचिंग संस्थान करोड़ों की फीस बटोरते हैं. हॉस्टल और पीजी मालिक मनमाना किराया लेते हैं. टेस्ट सीरीज बेचने वाली कंपनियां और एडटेक प्लेटफॉर्म्स का टर्नओवर बढ़ता है, और पब्लिशर्स की किताबें धड़ाधड़ बिकती हैं. लेकिन जब परीक्षा में कोई बड़ी गड़बड़ी होती है, पेपर लीक की खबर आती है, परीक्षा केंद्र पर तकनीकी समस्या होती है या रिजल्ट को लेकर कोई बड़ा विवाद खड़ा होता है, तब सबसे बड़ा नुकसान किसका होता है?
इसका सीधा और कड़वा जवाब है- वही छात्र और साथ मं उसके पेरेंट्स जो अपना तन, मन और धन सब कुछ इस सिस्टम में इनवेस्ट कर चुके थे. पर बदले में क्या मिल रहा है? मानसिक तनाव और अनिश्चित भविष्य!
नीट लीक का 'महाराष्ट्र कनेक्शन' और गेस पेपर का खेल
जांच एजेंसियों की पड़ताल में इस बार जो सच सामने आया, उसने कोचिंग इंडस्ट्री के चेहरे से शराफत का नकाब पूरी तरह उतार दिया है. नीट पेपर लीक मामले के तार अब सीधे महाराष्ट्र और मुंबई के कोचिंग नेटवर्क से जुड़े दिख रहे हैं. जांच में सामने आया है कि लातूर के RCC कोचिंग के संचालक शिवराज मोटेगांवकर और पुणे-मुंबई के कई कोचिंग सेंटर्स व टीचर्स इस पूरे खेल में शामिल थे.
हद तो तब हो गई जब परीक्षा से ठीक पहले व्हाट्सएप ग्रुप्स और कोचिंग सेंटर्स के जरिए 'गेस पेपर' बांटे गए. दावा किया जा रहा है कि इस 60 पन्नों के तथाकथित 'गेस पेपर' में से करीब 140 से 150 सवाल हूबहू असली परीक्षा में आ गए! यानी जिसे कोचिंग संस्थान अपनी 'एक्सपर्ट प्रेडिक्शन' या गेस पेपर बताकर बच्चों को बांट रहे थे, वह असल में 10 दिन पहले लीक हुआ असली नीट का पर्चा था, जिसे पीडीएफ बनाकर 10-12 लाख रुपये में बेचा गया था.
'गंदी मछली' के खिलाफ क्यों चुप है पूरा कोचिंग साम्राज्य?
अब सबसे बड़ा और तीखा सवाल देश की उस कोचिंग इंडस्ट्री से है जो खुद को छात्रों का मसीहा बताती है. करोड़ों अरबों का यह पूरा साम्राज्य देश के उन्हीं मासूम छात्रों के दम पर चलता है, जो अपनी रात की नींद और पैरेंट्स की खून-पसीने की कमाई इन सेंटर्स में झोंक देते हैं.लेकिन जब इनकी अपनी ही बिरादरी की 'गंदी मछलियां' पकड़ी गईं, जब मुंबई और पुणे के कोचिंग सेंटर्स का नाम खुलेआम एफआईआर और गिरफ्तारियों में आया, तो देश के किसी दूसरे बड़े कोचिंग संस्थान ने इसकी 'कट्टरता' से निंदा क्यों नहीं की?
देश भर में फैले इन बड़े-बड़े कोचिंग ब्रांड्स ने इस धोखाधड़ी के खिलाफ एक सुर में आवाज क्यों नहीं उठाई? सड़कों पर छात्रों के पक्ष में कोई बड़ा प्रदर्शन या कोचिंग्स का सामूहिक विरोध क्यों नहीं दिखा?
रहस्यमयी चुप्पी का सच...
जवाब बहुत कड़वा लेकिन साफ है क्योंकि खेल सबका चल रहा है. छात्र रोए या हताश हो, उनकी एडवांस फीस तो इन कोचिंग्स के बैंक खातों में पहले ही सुरक्षित पहुंच चुकी है. इस पूरी इंडस्ट्री का मोटो अब 'शिक्षा' नहीं, बल्कि 'एडमिशन और मुनाफा' बन चुका है. अपनी बिरादरी के खिलाफ बोलने से उनका खुद का नेक्सस कमजोर होने का डर रहता है.
क्या धरा रह जाएगा हजारों करोड़ का बिजनेस?
इस पूरे सिस्टम में एकमात्र ऐसा व्यक्ति छात्र है, जो हर बार अपना पैसा, समय, मानसिक ऊर्जा और भविष्य दांव पर लगाता है. लेकिन इस बार का गुस्सा अलग है.पेपर लीक से आज भले ही किसी रसूखदार कोचिंग माफिया को कोई फर्क न पड़ रहा हो, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब छात्र इस कड़वे सच को समझ जाएंगे.
अगर यही हाल रहा, तो छात्र नीट-जेईई जैसी परीक्षाओं से पूरी तरह मुंह मोड़ लेंगे. जिस दिन छात्रों और अभिभावकों का यह भरोसा पूरी तरह टूट गया और उन्होंने इन परीक्षाओं की तैयारी करना ही छोड़ दिया, उस दिन यह हजारों करोड़ का कोचिंग साम्राज्य और पेपर लीक का पूरा धंधा ताश के पत्तों की तरह धरा का धरा रह जाएगा. अब समय आ गया है कि सरकार परीक्षाओं की शुचिता हर हाल में बरकरार रखे और इन मूकदर्शक बने कोचिंग्स पर नकेल कसे, वरना इस व्यवस्था को ढहने से कोई नहीं बचा पाएगा.