IIT बॉम्बे में छात्र साहिल वाकोडे की मौत के बाद जिन दो प्रोफेसरों का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें IIT बॉम्बे के डायरेक्टर शिरीष बी केदारे और प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला शामिल हैं. साहिल के माता-पिता और छात्रों की ओर से लगातार दो प्रोफेसरों के इस्तीफे की मांग की जा रही है. वहीं, प्रोफेसर शिरीष का संस्थान से रिश्ता काफी पुराना है. वह 41 साल से कैंपस को अच्छे से जानते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने IIT बॉम्बे से ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और अब डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं. इसके अलावा भी उन्होंने क जगहों पर अपनी सेवाएं दी हैं. तो चलिए जानते हैं.
41 साल पुराना रिश्ता
प्रोफेसर शिरीष का IIT बॉम्बे से काफी पुराना रिश्ता रहा है. वह संस्थान को 41 साल से जानते हैं. साल 1985 में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की थी. इसके बाद से 1992 में यहीं से PHD की डिग्री हासिल की थी. इसके बाद उन्हें मई 2024 में डायरेक्टर के तौर पर नियुक्त किया गया था.
कई पदों पर दी सेवाएं
निदेशक बनने से पहले उन्होंने शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर अपनी सेवाएं दी. इनमें ONGC के पूर्व स्वतंत्र निदेशक, शिक्षा मंत्रालय के अधीन आईआईटी परिषद के मनोनीत सदस्य और IIT मद्रास के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य के रूप में शामिल रहे.
कई पेपर्स हो चुके हैं पब्लिश
IIT बॉम्बे के प्रोफाइल में दी गई के मुताबिक, शिरीष केदारे के 57 इंटरनेशनल और 10 नेशनल जर्नल्स में पेपर पब्लिश हो चुके हैं. इसके अलावा कॉन्फ्रेंस और प्रोसीडिंग्स में 44 इंटरनेशनल और 7 नेशनल पेपर्स छप चुके हैं.
इनसे भी जुड़ा है नाम
इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आमतौर पर शोध के लिए पारंपरिक और स्थापित विषयों को चुना जाता है, लेकिन प्रो. शिरीष केदारे ने इस चलन से हटकर एक अनोखे विषय पर काम किया. उनका शोध हवा की ऊर्जा को उपयोगी शक्ति में बदलने वाली रेसिप्रोकेटिंग विंड मशीन पर केंद्रित था.
गांव के विकास को बनाया लक्ष्य
पीएचडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद जहां अधिकांश छात्र बड़ी कंपनियों में करियर बनाने का सपना देखते हैं, वहीं प्रो. शिरीष केदारे ने गांवों के विकास की दिशा में काम करने का फैसला किया. वर्ष 1992 से 1995 के बीच उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए काम किया.
कोचिंग कल्चर के खिलाफ उठाई आवाज
प्रो. शिरीष केदारे कोचिंग कल्चर को लेकर भी अपनी राय जाहिर कर चुके हैं. उनका मानना है कि जरूरत से ज्यादा कोचिंग पर निर्भरता छात्रों की समझने और विषय को गहराई से सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि कोचिंग संस्थान अक्सर छात्रों को परीक्षा पास करने की रणनीतियों पर अधिक केंद्रित करते हैं, जिससे उनकी कॉन्सेप्चुअल समझ प्रभावित हो सकती है.
ONGC, NTPC और IIT मद्रास की जिम्मेदारियां
प्रो. शिरीष केदारे कॉर्पोरेट और सरकारी संस्थानों से जुड़ी विभिन्न जिम्मेदारियां भी निभा चुके हैं. वह महारत्न कंपनी ONGC में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर रहे हैं. इसके अलावा वह NTPC की Research Advisory Council (RAC) और IIT मद्रास के Board of Governors का भी हिस्सा रह चुके हैं.