scorecardresearch
 

DUSU प्रेसिडेंट हॉस्टल या स्टूडेंट्स की प्रॉब्लम सुलझा सकता है या नहीं? जानें उसकी पावर

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजे लगभग सामने हैं. जीत का सेहरा सजते ही नए छात्र नेताओं के सामने वादों की लंबी फेहरिस्त खड़ी है. लेकिन जिस पद को लेकर हर साल करोड़ों का धुआं उड़ाया जाता है, लाखों के पोस्टर चिपकाए जाते हैं और रैलियों में गाड़ियों के काफिले दौड़ते हैं, आखिर उस DUSU अध्यक्ष की असली ताकत क्या है?

Advertisement
X
फीस घटाने की पावर नहीं, फिर भी क्यों सबसे खास है डूसू प्रेसिडेंट का पद? जानिए इसकी अंदरूनी ताकत (AI-generated image)
फीस घटाने की पावर नहीं, फिर भी क्यों सबसे खास है डूसू प्रेसिडेंट का पद? जानिए इसकी अंदरूनी ताकत (AI-generated image)

क्या एक डूसू अध्यक्ष रातों-रात हॉस्टल की फीस कम कर सकता है? क्या उसके पास कॉलेज के नियमों को बदलने का अधिकार होता है? आइए जानते हैं कि डूसू प्रेसिडेंट का पद कागजों पर कितना पावरफुल है और असल जिंदगी में वो आम छात्रों के लिए क्या बदल सकता है. क्या डूसू प्रेसिडेंट के पास होती है हॉस्टल या फीस बदलने की सीधी पावर?

इसका सीधा और सीधा जवाब है- नहीं. वैसे तो डूसू प्रेसिडेंट के पास ऐसा कोई प्रशासनिक अधिकार या 'वीटो पावर' नहीं होती जिससे वह किसी कॉलेज की फीस घटा दे, हॉस्टल का किराया कम कर दे या परीक्षा की तारीखें बदल दे.

प्रोटेक्ट या ऑर्डर नहीं, सिर्फ प्रेशर 

जब बीते वर्षों में हॉस्टल का किराया बढ़ाया गया, तो डूसू के पास सिर्फ एक औपचारिक पत्र भेजने और विरोध करने का अधिकार था, आदेश जारी कर किराया रोकने का नहीं. वहीं एनईपी (NEP) लागू होने के बाद बढ़ी हुई फीस हो या कोई अकादमिक बदलाव, डूसू विरोध प्रदर्शन कर सकता है, धरने पर बैठ सकता है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन और उसकी गवर्निंग बॉडीज का ही होता है. लेकिन अपनी मांगों के ल‍िए व‍िरोध की राजनीति से शांतिपूर्ण ढंग से डूसू अध्यक्ष छात्रों की आवाज बन सकता है. 

Advertisement

डूसू के बाकी तीन पदों का क्या काम होता है?

उपाध्यक्ष (Vice President): प्रेसिडेंट की गैर-मौजूदगी में कामकाज संभालना. पिछले कुछ सालों में हॉस्टल एक्सेसिबिलिटी और कैंपस सेफ्टी जैसे अभियानों का नेतृत्व आमतौर पर वीपी ही करते आए हैं.

सचिव (Secretary): छात्रसंघ के आंतरिक कामकाज और डीयू से संबद्ध दर्जनों कॉलेजों की यूनियनों के बीच तालमेल बिठाना.

संयुक्त सचिव (Joint Secretary): दोनों पदों का सहयोग करना और अलग-अलग कॉलेजों में ग्राउंड लेवल पर पहुंच बनाना.

प्रशासन के सामने कितनी चलती है डूसू की?

डूसू एक प्रतिनिधि संस्था है, कोई गवर्निंग बॉडी नहीं. डूसू का कोई भी प्रतिनिधि एडमिशन के नियम नहीं बदल सकता, ट्यूशन फीस तय नहीं कर सकता, प्रोफेसर्स की भर्ती या बर्खास्तगी नहीं कर सकता और न ही कोई अकादमिक पॉलिसी बदल सकता है.

अगर आप पूछें कि इनका असली हथियार क्या है? तो डूसू की असली ताकत उसका पद नहीं, बल्कि उसकी 'विजिबिलिटी' और 'संगठित दबाव' है. धरना, मीडिया में मुद्दे उठाना, विरोध मार्च निकालना और जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना ही उनका सबसे बड़ा हथियार होता है.

कितने बजट पर चलता है डूसू?

जिस चुनाव में प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, उस डूसू का आधिकारिक सालाना बजट जानकर आप हैरान रह जाएंगे. डूसू का सालाना बजट करीब 24 लाख रुपये होता है. यह फंड हर छात्र द्वारा एडमिशन के वक्त दी जाने वाली महज 20 रुपये की सालाना फीस से इकट्ठा होता है. छात्रसंघ के पास कैंपस में कोई भी बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए अलग से कोई स्वतंत्र फंड नहीं होता.

Advertisement

फिर भी क्यों सबसे खास माना जाता है यह पद?

भले ही डूसू प्रेसिडेंट के पास सीधी प्रशासनिक शक्तियां कम हों, लेकिन इस कुर्सी का राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड जबरदस्त रहा है. देश को बड़े राजनेता देने में डूसू की भूमिका ऐतिहासिक रही है. यहां हैं कुछ उदाहरण.. 

अरुण जेटली: 1974 में डूसू प्रेसिडेंट रहे और आगे चलकर देश के वित्त मंत्री बने.
अजय माकन: 1985 में डूसू अध्यक्ष बने और राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाई.

इसके अलावा विजय गोयल, विजय जॉली, रेखा गुप्ता और अलका लांबा जैसे दिग्गज चेहरे इसी डूसू की दहलीज पार करके देश की मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित हुए हैं. यानी, डूसू अध्यक्ष का पद भले ही आपको सीमित अधिकार देता हो, लेकिन यह देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं तक पहुंचने का एक ऐसा लॉन्चपैड है जिसका असर सालों-साल नजर आता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement