एक टाइम था जब कॉलेज से ग्रेजुएट हुए न्यू स्टूडेंट्स महीनों तक घर पर बैठे रहना पसंद करते थे बजाय इसके कि वे यह एक्सेप्ट करें कि वे कोई ऐसी जॉब कर रहे हैं जो उनकी डिग्री के हिसाब से वर्थ इट नहीं है. एग्जाम्पल के लिए अगर कहे तो एक बी.कॉम ग्रेजुएट टैक्सी चला रहा है? जब कोई रिलेटिव पूछता, "बेटा, आजकल क्या कर रहे हो?" तो आप यह जवाब तो बिल्कुल नहीं देते.
छोटे-मोटे काम, ड्राइविंग, वेट्रेस का काम... इन्हें तो अच्छे घर के बेटे-बेटियां भी नहीं मानते थे, और इस हिपोक्रेसी के लिए हम सोसायटी को ही ब्लेम करते है. जॉब के साथ एक डेशिगनेशन, एक ऑफिस और हो सके तो एक विजिटिंग कार्ड होना जैसे बेसिक नीड थी.
लेकिन इस जेन जी जेनरेशन के साथ कुछ बदलता सा सिनैरियो नजर आ रहा है. जेन जी बहुत सी चीजों के लिए ब्लेम किया गया है. जैसे बार-बार नौकरी बदलना, पेशेन्स की कमी होना, काम करने के लिए मना करना और फ्लैक्सिबिलीटी की डिमांड करने जैसे बहुत से रीजन्स के लिए. लेकिन जेन जी एक चीज इस पूरे प्रोसेस में बहुत अच्छे से समझ ली है कि 'कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता'.
जेन जी का मानना है कि कोई जॉब अगर आपको पैसे दे रही है, आपको कुछ सीखा रही है या आपको वो बनाने का करियर बनाने का फ्रीडम दे रही है जो आप बनाना चाहते हो इसमें इम्बैरेसिंग क्या है? जैसा कि एक्टर रवि किशन ने भी बड़े क्रेजी वे में बोला था, 'मनी फॉलोज माय ब्रर्दर'!
और शायद यहीं पर हैमटोर देबबर्मा की एंट्री होती है. 22 साल की उम्र में B.com ग्रैजुएट बेंगलुरु में Uber black चलाते है. देबबर्मा ने भी कॉन्टेंट क्रिएशन की शुरुआत की है और एंटरप्रेन्योरशिप में उनका अच्छा इंटरस्ट है. कॉलेज के बाद वो भी किसी कॉर्पोरेट नौकरी की तलाश कर सकते थे लेकिन इसके बजाय, उन्होनें गाड़ी चलाना चुना. और इसके जरिए लाखों लोगों को उनके लाइफ को देखने का मौका मिला. उनके डेली लाइफ वीडियो को 23 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. इस पूरे वीडियो में सबसे ज्यादा चर्चा हुई उस पार्ट की जिसमें एक स्क्रीनशॉट शेयर किया गया कि हफ्ते में उनकी लगभग 46 हजार रुपये की कमाई हुई.
लेकिन देबबर्मा की स्टोरी यहीं खत्म नहीं होती. उनकी कहानी उनके कमाई से ज्यादा इंटरेस्टिंग है.
एक ग्रैजुएट को गाड़ी क्यों नहीं चलानी चाहिए?
देबबर्मा से पूछा गया कि क्या उन्हें इस जॉब प्रोफाइल को अपनाने में कोई हेजीटेशन थी, तो उनका जवाब सीधा-सादा 'नहीं' था. इंडिया टुडे डिजिटल के साथ एक स्पेशल बातचीत में उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा प्रोफेशन चुनने में कोई बुराई है जिसका आप सचमुच मजा आता हों." देबबर्मा को गाड़ी चलाने का हमेशा से कार्स में ड्राइविंग का शौक था. जब उनको एक ऊबर ब्लैक चलाने का चान्स मिला तो वो उसे एक्सपीरियंस करना चाहते थे. इस फैसले के पीछे कोई नौकरी की कमी नहीं थी, या कॉर्पोरेट लाइफ के लिए कोई रिजेक्शन नहीं था. बस एक यंग मैन वो ट्राय करना चाहता था जो उसे पसंद था.
और शायद यहीं पार्ट स्टोरी को इंटरेस्टिंग बनाता है. क्योंकि वो गाड़ी क्यों चला रहा है, यह सवाल अक्सर एक ऐसी परसेप्शन से बना दिखता है जिसके क्लैरिफिकेशन की कोई जरूरत नहीं है उसके पास डिग्री है, तो वो ऐसा क्यों कर रहा है?
देबबर्मा ने भी ये बात सुनी है
वे कहते हैं, “ज्यादातर लोग मानते हैं कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद तुरंत ही किसी कॉर्पोरेट कंपनी में नौकरी कर लेनी चाहिए” लेकिन उनका मानना है कि हर किसी को यही रास्ता नहीं अपनाना चाहिए. लोग उनसे पूछते हैं कि डिग्री पूरी करने के बावजूद वे गाड़ी क्यों चला रहे हैं. वे इसे नेगेटिव रूप से नहीं लेते. उनके लिए ये एक ऐसा दौर है जिसमें वे लोगों से मिल सकते हैं, खुद को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और यह पता लगा सकते हैं कि वे वास्तव में क्या करना चाहते हैं. वे कहते हैं, “मैं अभी जो भी फैसले ले रहा हूं, उनसे मैं पूरी तरह सैटिसफाइड हूं.”
यह सेंटेंस यंगस्टर्स के काम को लेकर बदलती सोच को जॉब के फ्यूचर पर लिखी किसी भी LinkedIn पोस्ट से कहीं बेहतर समझाता है.
देबबर्मा की ऑफिस में 4 वील्स है
देबबर्मा के लिए डेली लाइफ ग्लैमरस नहीं है. वो काम के लिए रैडी होते है और हम बाकी लोगों की तरह ही रोड पर निकल पड़ते है.
फिर अनप्रिडिक्टिबिलिटी शुरु होती है
देव की एक जर्नी बहुत ही शॉर्ट और सायलेंट होती है. और शायद दूसरी जर्नी उनकी किसी बड़े बिजनसमैन या एंटरप्रेन्योर के साथ भी हो सकती है. देब की हर राइड अलग है क्योंकि उनके हर राइड की अपनी एक अलग स्टोरी है. यही एक बात है जो उन्हें इस जॉब में पसंद है. “आप अपना दिन इस अनप्रिडिक्टिबिलिटी के साथ शुरू कर सकते हैं कि आप किससे मिलने वाले हैं.”
लगातार बदलते वर्क स्पेस में काम करने का एक यूनीक बेनिफिट भी है: आप जिन लोगों से मिलते हैं, वे आपकी एजुकेशन का हिस्सा बन जाते हैं. देबबर्मा कहते हैं कि उन्हें लोगों से कॉन्वरसेशन्स करना और उनसे कुछ सीखने का मौका मिलना अच्छा लगता है.
देबबर्मा अपनी राइड्स के बाद अपना लाइफ के दूसरे पार्ट में स्विच कर लेते है. जोकि कॉन्टेंट क्रिएशन और उनके दूसरे इंटरेस्ट है. देब के दिन का मतलब सिर्फ गाड़ी चलाना, कमाना और घर जाना नहीं है. बल्कि गाड़ी चलाना, लोगों से मिलना, कुछ नया करना, लर्न और चीजों को समझना है. ऐसे लोगों के लिए जिसने अभी तक यह तय नहीं किया है कि उसका लॉन्गटर्म करियर कैसा होगा, ये तरीका उसे सूट करता है.
क्या 46 हजार रुपए कमाना रियल इशू है?
बेशक, डेबबर्मा का अब वायरल हो चुका वीडियो लोगों का अटेंशन ले रहा है स्पेशली वो नंबर, जिसकी वजह से लोग वीडियो के कमेंट सेक्शन में पहुंचे. हफ्ते में 46 हजार रुपये कमाना सुनने में काफी अच्छा लगता है, खासकर जब इसके साथ 22 साल की उम्र और ‘Uber Black ड्राइवर’ जैसी बातें जुड़ी हों. लेकिन डेबबर्मा खुद भी अपनी पूरी कहानी को सिर्फ कमाई तक एक्सक्लूसिव नहीं रखना चाहते.
देबबर्मा का मानना है कि इनकम अच्छी है, लेकिन वो अपना एक्सपीरियंस सिर्फ वो कितना कमाते है इससे नहीं दिखाना चाहते. उनकी अर्निंग इस चीज पर डिपेंड करती है कि वो कौन-सी राइड कितनी लंबी चला रहे है. फ्लैक्सिबिलिटी मैटर करती है और इसके साथ आप किससे मिल रहे है और क्या सीख रहे है.
उन्होनें एक मेमोरेबल एक्सपीरीयंस शेयर करते हुए बताया कि एक बार वो एक प्रीस्ट थोमस से मिले जिन्होनें गाड़ी से निकलने से पहले उनके फ्यूचर के लिए प्रयेर की. उन्होनें बताया कि वो एक बहुत सिंपल मोमेंट था लेकिन वो उस मुमेंट को अप्रिशिएट करते है और अभी भी याद करते है.
अब तक देब का कोई बड़ा खराब एक्सपीरियंस नहीं रहा है. वो अभी कुछ ही हफ्तों से Uber Black चला रहे है और उनके मुताबिक अब तक का एक्सपीरियंस ज्यादातर अच्छा ही रहा है. कुछ दिन थकाने वाले होते हैं और कुछ राइड्स प्लान के मुताबिक नहीं जातीं. लेकिन उसे अब तक अपने इस फैसले पर पछतावा नहीं हुआ है.
ये सिर्फ 22 साल के एक लड़के की कहानी नहीं
डेबबर्मा के Uber चलाने की अपनी वजह है. लेकिन वह अकेले ऐसे नहीं है, जिसने करियर का अलग रास्ता चुनकर ड्राइविंग शुरू की है. 22 साल के रुद्र के पास BCA की डिग्री है और वो पहले नोएडा में फाइनेंस कंसल्टेंट के तौर पर काम कर चुके हैं. लेकिन रोज 10 से 12 घंटे काम करने के बाद भी जो सैलरी मिलती थी, उसे दिल्ली-NCR में रहने के एक्सपेंसेज के हिसाब से सही प्रूफ करना उन्हें टफ लगता था इसलिए उन्होंने वह जॉब छोड़ दी.
शुरुआत में उन्होंने अपने परिवार को भी नहीं बताया कि उन्होंने ड्राइविंग शुरू कर दी है. आज उनका रोज करीब 5 हजार रुपये कमाने का टारगेट रहता है और उनका कहना है कि अब उनका परिवार भी उनके फैसले को समझता है और सपोर्ट करता है.
फिर पिक्चर में आती है भावना. दो साल से ज्यादा टाइम से कैब चला रही हैं. उन्होंने शुरुआत में सिर्फ इसलिए ड्राइविंग सीखी थी क्योंकि वो ये स्किल सीखना चाहती थीं. जब पहली बार रोड पर उतरीं, तो वो नर्वस हुई थीं और उनमें कॉन्फिडेंस की कमी थी. उनके पति, बच्चों और ट्रस्टवर्दी लोगों ने उन्हें इसे ट्राय करने केलिए मोटिवेट किया. आज वो कहती हैं कि प्रोफेशनली ड्राइविंग करने को लेकर उन्हें अब कोई हेजीटेषन फील नहीं होती. बल्कि इस काम ने उन्हें और ज्यादा कॉन्फिडेंट बनाया है.
शायद पुराने टाइम से कही जा रही वह बात इसी ओर इशारा करती है-कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, बस इंसान की सोच छोटी या बड़ी होती है. ये एक बिल्कुल इंडियन पर्सपेक्टिव है, और शायद हमारे सोसाटी को आज भी इसे सिर्फ कहने के बजाय अपनी जिंदगी में उतारने की नीड है.
(ये कहानी इंडिया टुडे के लिए Tiasa Bhowal ने की है.)