मेडिकल साइंस और न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक ऐसी क्रांतिकारी खोज हुई है, जो लकवा (Paralysis) से पीड़ित लाखों मरीजों की जिंदगी और उनकी खामोश दुनिया को हमेशा के लिए बदलकर रख सकती है. अब तक पैरालाइज्ड मरीज डिजिटल स्क्रीन या तकनीक के जरिए सिर्फ अपनी बात लिखकर या सीमित आवाज में कह पाते थे, लेकिन अब वे बोलने के साथ-साथ इशारे भी कर सकेंगे.
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (UCSF) की 'चांग लैब' के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ब्रेन इम्प्लांट तैयार किया है, जो मरीज के दिमाग से एक साथ निकलने वाले बोलने और हिलने-डुलने दोनों संकेतों को डिकोड कर सकता है. न्यू साइंटिस्ट जर्नल में प्रकाशित इस शोध ने न्यूरोलॉजी की दुनिया में हलचल मचा दी है.
क्यों खास है यह तकनीक और कैसे करती है काम?
शोधकर्ताओं के अनुसार, रोजमर्रा की जिंदगी में हमारी बातचीत का एक बड़ा हिस्सा शारीरिक इशारों पर निर्भर करता है. मसलन, 'शायद' कहते हुए सिर हिलाने का मतलब अलग होता है और सिर झुका लेने का अलग. वैज्ञानिकों ने लकवे से पीड़ित दो मरीजों के दिमाग के 'सेंसरीमोटर कॉर्टेक्स' जो बोलने और मूवमेंट को कंट्रोल करता है, उसमें आईफोन के आकार का एक माइक्रो-इम्प्लांट लगाया.
इसके बाद मरीजों से 10 चुनिंदा वाक्यांशों (जैसे 'हैलो', 'आपसे मिलकर अच्छा लगा') और 10 तरह के इशारों (हाथ मिलाना, ताली बजाना) को दोहराने की कोशिश कराई गई. उनके दिमाग से निकले सिग्नल्स के आधार पर एक खास AI मशीन लर्निंग मॉडल तैयार किया गया. इस तकनीक में मरीज के विचारों को तुरंत डिकोड करके स्क्रीन पर दिख रहे एक डिजिटल 'अवतार' में बदला गया, जिसने मरीज की सोच के मुताबिक ठीक वही शब्द बोले और वही शारीरिक इशारे भी किए.
लैब टेस्ट में 88% तक मिली सटीकता
इस प्रयोग को दो मरीजों पर टेस्ट किया गया, जिन्हें 'ब्रावो-1आर' (स्ट्रोक के बाद लकवाग्रस्त) और 'ब्रावो-6' (मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित) नाम दिया गया. दोनों ही अपनी शारीरिक गतिविधियों और बोलने की क्षमता पूरी तरह खो चुके थे. पहले मरीज (Bravo-1r) के मामले में AI मॉडल ने 88 फीसदी सटीकता के साथ उनके इशारों और 84 फीसदी सटीकता के साथ उनकी आवाज के संकेतों को डिकोड किया. दूसरे मरीज के मामले में यह सटीकता क्रमशः 66 और 70 प्रतिशत रही.
अब बिना स्क्रीन के सीधे शरीर से होंगे इशारे!
स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लॉज़ेन के न्यूरो-विशेषज्ञों ने इसे एक बेहद ठोस और मजबूत वैज्ञानिक सफलता बताया है. शोध का नेतृत्व कर रहीं UCSF की वैज्ञानिक सामंथा ब्रोसलेर का कहना है कि फिलहाल तकनीक को और ज्यादा शब्दों और सटीक इशारों के लिए ट्रेन किया जा रहा है. आने वाले समय में इसका अंतिम लक्ष्य मरीजों को किसी 'अवतार' या 'स्क्रीन' का सहारा दिए बिना, कृत्रिम आवाज और उनकी अपनी मांसपेशियों व जोड़ों (यदि वे सुरक्षित हों) के जरिए सीधे संवाद करने के काबिल बनाना है.