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MBBS=1.25 करोड़! बच्चे को प्राइवेट कॉलेज से डॉक्टर बनाना आसान नहीं, पढ़ें- एक मां की आपबीती

दिल्ली की एक मां ने अपने बच्चे के प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में दाखिले के बाद सामने आई कड़वी हकीकत का खुलासा किया है. 1.25 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी बच्चों को खराब हॉस्टल सुविधाएं, मिलावटी खाना, साफ पानी की कमी और रैगिंग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. कॉलेज प्रशासन सिक्योरिटी मनी वापस नहीं करता और फाइन वसूली जाती है.

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आखिर क्यों करोड़ों खर्च करके भी घुटने को मजबूर हैं मेडिकल छात्र और पेरेंट्स?
आखिर क्यों करोड़ों खर्च करके भी घुटने को मजबूर हैं मेडिकल छात्र और पेरेंट्स?

'जब हम अपने बच्चे का दाखिला देश के एक नामी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में करा रहे थे, तो लगा कि अब भविष्य सुरक्षित है. लेकिन सवा करोड़ रुपये खर्च करने के बाद जो हकीकत सामने आई, उसने हमें अंदर से हिलाकर रख दिया. हम सिर्फ पैसा नहीं दे रहे, अपने बच्चे की मानसिक शांति और सेहत की बलि भी चढ़ा रहे हैं.'

यह दर्द भरा बयान दिल्ली की एक प्राइवेट कर्मचारी और मां का है, जिनकी बेटी उत्तर प्रदेश के एक नामी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से MBBS थर्ड इयर की पढ़ाई कर रही है. नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के उस काले सच पर बात की है, जो चमचमाती ब्रोशर और विज्ञापनों के पीछे छिपा दिया जाता है.

बजट और हिडन चार्ज: 'दिखाया कुछ, वसूला कुछ'
मां के मुताबिक, प्राइवेट कॉलेज से MBBS कराने का कुल खर्च आज की तारीख में 1.25 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाता है.

फिक्स्ड फीस का सच: उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकार की तरफ से फीस तय (फिक्स) तो है, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने इसके अलावा लूट का अलग रास्ता निकाल रखा है. यहां के हॉस्टल में एसी रूम का विकल्प आसानी से नहीं मिलता. उत्तर प्रदेश की भीषण गर्मी में भी बच्चों को खुद का कूलर लगाने तक की इजाजत नहीं है. अगर कोई बच्चा छुपकर कूलर या सर्दियों में हीटर लगा ले, तो भारी-भरकम 'फाइन' (जुर्माना) ठोक दिया जाता है.

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सिक्योरिटी मनी डकारने का खेल: एडमिशन के वक्त जमा कराई गई रिफंडेबल सिक्योरिटी मनी (जो लाखों में होती है) को कॉलेज प्रशासन रिफंड न करने के बहाने ढूंढता है. छोटे-छोटे नियमों के उल्लंघन पर पर्चा फाड़कर फाइन वसूला जाता है, ताकि वह पैसा वहीं एडजस्ट हो जाए.

'नकली पनीर और तैरता हुआ तेल...'

मेडिकल के छात्रों को सुबह से शाम तक कड़ी पढ़ाई और अस्पतालों में ड्यूटी करनी होती है. ऐसे में उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत पौष्टिक आहार की है, लेकिन हकीकत इसके उलट है:

मिलावटी और अनहेल्दी फूड: हॉस्टल के खाने में हद से ज्यादा तेल और बेहद घटिया क्वालिटी का सामान इस्तेमाल होता है. बातचीत में मां ने बताया, 'सब्जी में नाम के लिए पनीर होता है, लेकिन सब जानते हैं कि वह नकली और मिलावटी होता है. खाने की क्वालिटी चेक करने के लिए कोई औचक निरीक्षण (FSSAI) नहीं होता.'

साफ पीने के पानी की किल्लत: इतने महंगे हॉस्टल में भी बच्चों को साफ पीने का पानी मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती. बच्चों को दूध या कोई अन्य हेल्दी डाइट नहीं दी जाती.

'सीनियर-जूनियर' के नाम पर बुलीइंग
प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग आज भी एक कड़वी सच्चाई है, जिसे कॉलेज प्रशासन और खुद बच्चे भी दबाकर रखते हैं:

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सीनियर का खौफ: फर्स्ट ईयर के बच्चों को यह कहकर चुप कराया जाता है कि तुम्हें आगे नोट्स, बुक्स और एग्जाम्स के लिए सीनियर्स की मदद चाहिए होगी. इसी मजबूरी का फायदा उठाकर हद दर्जे की रैगिंग की जाती है.

शारीरिक शोषण: लड़कियों के मुकाबले लड़कों के साथ रैगिंग के नाम पर बेहद क्रूर व्यवहार होता है. ग्रुप्स में लड़कों को पीटे जाने और गंभीर चोटें आने तक के मामले सामने आते हैं, लेकिन कोई मुंह नहीं खोलता.

सिंगल आउट होने का डर: अगर कोई बच्चा या पेरेंट्स इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो पूरा कॉलेज और सीनियर्स का ग्रुप उस बच्चे को 'सिंगल आउट' (अकेला) कर देता है. उसका कॉलेज में रहना दूभर कर दिया जाता है.

वो कहती हैं कि यह सिर्फ एक कॉलेज की कहानी नहीं है. एम्स (AIIMS) जैसे सरकारी और प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर देश के कोने-कोने में फैले प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल्स की यही कहानी है.

(नोट: छात्र की सुरक्षा, उसके करियर और कॉलेज प्रशासन द्वारा किसी भी तरह के मानसिक व शैक्षणिक उत्पीड़न के डर को देखते हुए, इस रिपोर्ट में छात्रा, उसकी मां और उनके कॉलेज के वास्तविक नाम व पहचान को पूरी तरह से गुप्त रखा गया है.)

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