नए शहर में जाने पर सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होती है नए दोस्त बनाना और अपनेपन का एहसास पाना. ओवेन अखिबी हेरेरा ने भी इसी मकसद से एक छोटी-सी शुरुआत की थी. लेकिन दोस्तों से मिलने और नए लोगों से जुड़ने की उनकी यह कोशिश धीरे-धीरे एक बड़े ग्रुप में बदल गई. इसी कोशिश ने आज न्यूयॉर्क के उनके रनिंग क्लब पीक एंड पेस के आयोजनों में हर साल 30,000 से ज्यादा लोग हिस्सा लेते हैं.खास बात यह है कि 2025 में इस क्लब ने 6.4 लाख डॉलर यानी करीब 6 करोड़ रुपये की कमाई कर ली है.
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हालांकि, क्लब से हुई कमाई हेरेरा की जेब में नहीं गई. उन्होंने लिंक्डइन पर बताया कि उन्होंने इसमें से कोई पैसा अपने लिए नहीं निकाला, बल्कि पूरी रकम क्लब को आगे बढ़ाने के लिए खर्च कर दी. क्लब के रोजाना रनिंग सेशन तो मुफ्त होते हैं, लेकिन पेड पार्टियों और दूसरे सोशल इवेंट्स से होने वाली कमाई क्लब के खर्चों को पूरा करने में मदद करती है. हेरेरा की कहानी बताते हैं कि रनिंग अब सिर्फ फिट रहने का जरिया नहीं रह गई है. भारत में भी कई युवा ऐसे क्लबों से जुड़ रहे हैं, जहां दौड़ने के साथ नए दोस्त बनाने, लोगों से मिलने और जिंदगी के कुछ अच्छे पल साथ बिताने का मौका मिलता है. यानी सुबह की एक छोटी-सी दौड़ अब लोगों के लिए दोस्ती और नए अनुभवों की शुरुआत भी बन रही है.
कैसे की 6 करोड़ की कमाई?
लंदन से न्यूयॉर्क आए हेरेरा का मकसद नए दोस्त बनाना था, लेकिन इसी कोशिश ने उन्हें एक ऐसा रनिंग क्लब शुरू करने का आइडिया दिया, जो आज 6 करोड़ रुपये से ज्यादा की कंपनी बन गई है. बता दें कि उन्होंने जुलाई 2024 में पीक एंड पेस की शुरुआत की. पहले दिन सिर्फ 12 लोग दौड़ने पहुंचे थे. लेकिन धीरे-धीरे इसकी भी संख्या बढ़ने लगी. समय के साथ क्लब में नए लोग जुड़ते रहे.
हेरेरा ने क्लब की रनिंग एक्टिविटी को मुफ्त रखा, ताकि कोई भी बिना पैसे खर्च किए इसका हिस्सा बन सके.कमाई के लिए उन्होंने पेड पार्टियों, कॉमेडी नाइट्स, हाइकिंग ट्रिप्स और स्की आउटिंग जैसे कार्यक्रम शुरू किए. इनमें कुछ इवेंट्स के टिकट 15 से 25 डॉलर तक के थे. इस तरह दौड़ने के लिए लोगों को जोड़ने वाला क्लब धीरे-धीरे कमाई का मॉडल भी बन गया.

CNBC मेक इट की रिपोर्ट के मुताबिक, क्लब ने 2025 में 6.4 लाख डॉलर यानी करीब 6 करोड़ रुपये का रेवेन्यू कमाया. इसका कुल प्रॉफिट मार्जिन लगभग 15 फीसदी था. हालांकि, यह पूरी रकम हेरेरा की निजी कमाई नहीं थी. उन्होंने लिंक्डइन पर बताया कि उन्होंने क्लब से अपने लिए कोई पैसा नहीं निकाला, बल्कि उसे आगे बढ़ाने में ही लगा दिया. गवर्नर्स आइलैंड पर 5 किलोमीटर की दौड़ और उत्सव आयोजित करने में ही करीब 1.5 लाख डॉलर खर्च हुए.
इस क्लब को खड़ा करना हेरेरा के लिए आसान नहीं था. वह जेपी मॉर्गन में अपनी नौकरी भी कर रहे थे और साथ ही क्लब को आगे बढ़ाने में जुटे थे. रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने करीब एक साल तक रोजाना 18 घंटे काम किया. उनकी कहानी दिखाती है कि कभी-कभी नए लोगों से मिलने और दोस्त बनाने की एक छोटी-सी कोशिश भी बड़ा रूप ले सकती है. हेरेरा के लिए रनिंग क्लब सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि ऐसा समुदाय बनाने का जरिया बना, जहां लोग फिटनेस के साथ दोस्ती और नए अनुभव भी हासिल कर सकें.
भारत में भी बढ़ रहा है रनिंग क्लबों का चलन
भारत में भी अब दौड़ना सिर्फ फिट रहने का तरीका नहीं रह गया है. खासकर युवाओं के बीच रनिंग क्लब नए लोगों से मिलने, दोस्त बनाने और साथ में अच्छा समय बिताने का जरिया बन रहे हैं. बेंगलुरु जैसे शहरों में लोग वीकेंड पर साथ दौड़ने निकलते हैं और फिर कॉफी या नाश्ते पर बातचीत करते हैं. कब्बन पार्क, सैंकी रोड और काइकोंद्राहल्ली झील जैसी जगहों पर लोग दौड़ने के साथ नए लोगों से जुड़ने का मौका भी तलाशते हैं.
कई रनिंग ग्रुप ऐसे लोगों को भी अपने साथ जोड़ रहे हैं, जिन्होंने पहले कभी नियमित रूप से दौड़ नहीं लगाई. वीकेंड पर होने वाली इन ग्रुप रन के बाद नाश्ते या छोटी-सी मुलाकात का कार्यक्रम भी रखा जाता है. इससे लोगों के लिए फिटनेस की शुरुआत करना थोड़ा आसान और मजेदार हो जाता है.
वहीं, भारत में हाफ मैराथन और दूसरी रनिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन भी बड़े स्तर पर हो रहा है. इन आयोजनों में बड़ी संख्या में युवा के साथ-साथ बुजुर्ग भी हिस्सा लेते हैं. सोशल मीडिया ने भी इस ट्रेंड को बढ़ावा दिया है. सुबह की दौड़ से लेकर रनिंग के बाद दोस्तों के साथ नाश्ते तक की तस्वीरें और वीडियो देखकर कई दूसरे लोग भी ऐसे ग्रुप का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित होते हैं.
क्या भारत में रनिंग क्लब से कमाई भी हो सकती है?
पीक एंड पेस की कहानी बताती है कि लोगों को जोड़ने वाली एक मुफ्त गतिविधि के आसपास कमाई का मॉडल भी तैयार किया जा सकता है. क्लब में दौड़ने के लिए पैसे नहीं लिए जाते, लेकिन पार्टियों, वीकेंड ट्रिप और दूसरे खास कार्यक्रमों के जरिए कमाई होती है.
भारत में भी रनिंग क्लब इसी तरह के तरीके अपना सकते हैं. मसलन, टिकट वाले इवेंट, वीकेंड ट्रिप, टी-शर्ट और दूसरी मर्चेंडाइज की बिक्री के साथ कैफे, स्पोर्ट्स ब्रांड और फिटनेस कंपनियों के साथ साझेदारी से कमाई के रास्ते खुल सकते हैं. ब्रांड की मदद से सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित करना भी एक विकल्प हो सकता है.
हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है. क्लब की कुल कमाई ही उसका मुनाफा नहीं होती. आयोजन स्थल, कर्मचारियों, परिवहन, उपकरण और कार्यक्रम की व्यवस्था पर भी पैसा खर्च होता है. बड़े रनिंग इवेंट में प्रायोजकों की भूमिका भी अहम हो सकती है. इसलिए किसी क्लब को लंबे समय तक चलाने के लिए कमाई के साथ खर्चों का हिसाब रखना और सदस्यों को अच्छी सुविधाएं देना भी जरूरी है.
हेरेरा की कहानी का दिलचस्प पहलू यही है कि शुरुआत में उनका मकसद कोई बड़ा बिजनेस खड़ा करना नहीं था. वह न्यूयॉर्क में नए दोस्त बनाना चाहते थे. इसी कोशिश ने धीरे-धीरे एक बड़े समुदाय का रूप ले लिया. भारत में भी ऐसे क्लब उन लोगों के लिए एक नई शुरुआत बन सकते हैं, जो फिट रहना चाहते हैं, लेकिन अकेले दौड़ने के बजाय दूसरों के साथ जुड़कर इस आदत को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना चाहते हैं.