जब विमान ने इजरायल के तेल अवीव शहर में लैंड किया, तो केबिन से अपना बैग निकालते समय मेरी नजर दिल्ली से यात्रा कर रही एक मध्यम आयु वर्ग की भारतीय महिला पर पड़ी, जिसके चेहरे पर एक बेहद प्यारी मुस्कान थी. उसके साथ वैसी ही दिखने वाली एक और महिला भी सफर कर रही थी. विमान से उतरकर जब हम इमिग्रेशन काउंटर की लंबी कतार में खड़े हुए, तो हमारी बातचीत शुरू हुई. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं इजरायल में रहती हूं? मैंने जवाब दिया, नहीं मैं यहां एक आधिकारिक काम से आई हूं. इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं यहां रहकर काम करती हूं.
इमिग्रेशन की लंबी लाइन ने हमें एक-दूसरे को और करीब से जानने का मौका दिया. बातचीत में पता चला कि उनका नाम रीना है. वह भारत के मणिपुर राज्य की रहने वाली हैं. रीना पिछले तीन वर्षों से इजरायल में एक 'केयरगिवर' (देखभाल करने वाली) के रूप में काम कर रही हैं.
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उन्होंने अक्टूबर 2023 में हमास के नरसंहार के बाद इजरायली रक्षा बलों की सैन्य कार्रवाइयों, पिछले साल ईरान के साथ हुए युद्ध और इस साल 2026 में भी जारी तनाव को बेहद करीब से देखा है. रीना जहां तेल अवीव में एक परिवार के साथ काम करती हैं. वहीं उनकी सगी बहन पूनम इजरायल के ही एक अन्य शहर एशडोड में केयरगिवर के तौर पर कार्यरत हैं.

जब ईरान की मिसाइलों से दहल उठा था आसमान
जब मैंने रीना से पूछा कि क्या वह ईरानी मिसाइल हमलों के दौरान इजरायल में ही थीं, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के 'हां' में सिर हिलाया. वह उस खौफनाक मंजर की गवाह रही हैं. जून 2025 में ईरान-इजरायल के बीच चले 12 दिनों के भीषण युद्ध के दौरान, जब हर दिन सैकड़ों सायरन बजते थे. लोगों को दिन में कई-कई बार बंकरों में शरण लेनी पड़ती थी. कई भारतीय वहीं मौजूद थे. विदेशी पत्रकारों के लिए यह युद्ध को कवर करने का एक जरिया था, लेकिन रीना और पूनम जैसी हजारों भारतीय महिलाएं अपनी नौकरी और मजबूरी के कारण इस युद्ध के बीच फंसी हुई थीं.
उस दौरान भारत सरकार और इजरायल में मौजूद भारतीय दूतावास ने 'ऑपरेशन' चलाकर हजारों भारतीयों को सुरक्षित वतन वापस भेजा था, लेकिन इसके बावजूद कई लोगों ने इजरायल में ही रुकने का फैसला किया. रीना और पूनम भी उन्हीं हौसलेमंद लोगों में से थीं. ये दोनों बहनें एक महीने की छुट्टी बिताकर अपने परिवार से मिलने के बाद दोबारा इजरायल लौट रही थीं.
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मणिपुर और इजरायल की एक जैसी त्रासदी
उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित होकर जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वे घर से 3500 मील दूर युद्ध के इस माहौल में रहने को लेकर डरी हुई नहीं हैं? तो उनके जवाब ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया. दोनों बहनों ने कहा कि भारत में हमारा घर मणिपुर में है. हमारा इलाका पिछले कुछ सालों से भारी विवाद और जातीय हिंसा की चपेट में है.
हमने अपने घर में भी तनाव का ऐसा ही माहौल देखा है. जब हम छुट्टी पर मणिपुर गए थे, तो वहां हर तरफ कर्फ्यू लगा हुआ था. हम घर से बाहर तक नहीं निकल पा रहे थे. सुरक्षा की चिंता तो दोनों ही जगहों पर है, चाहे वह मणिपुर हो या इजरायल.

पूनम ने बताया कि जून 2025 में इजरायल के एशडोड शहर में एक पावर स्टेशन पर बहुत बड़ा मिसाइल हमला हुआ था. वह उस स्थान से महज दो किलोमीटर दूर एक घर में काम कर रही थीं. उन्होंने तुरंत अंडरग्राउंड बंकर में शरण ली थी. अब वे दोनों बहनें हवाई हमलों के सायरन और चेतावनी प्रणाली की आदी हो चुकी हैं, क्योंकि इजरायल के नए शहरों की लगभग हर इमारत में एक बंकर बना हुआ है. सबसे बड़ी बात यह है कि ये दोनों बहनें भारत में रह रहे अपने परिवार की मुख्य आर्थिक रीढ़ हैं, इसलिए वे बिना काम किए नहीं बैठ सकतीं.
डर पर भारी पड़ती नौकरी और भारत-इजरायल का भरोसा
मणिपुर में पिछले दो साल से अधिक समय से जारी संघर्ष और अनिश्चितता के कारण, कई भारतीय श्रमिकों ने युद्ध के बावजूद इजरायल में ही टिके रहने का फैसला किया है. इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं- पहला, यहां मिलने वाला वेतन और आर्थिक लाभ बेहद शानदार है. दूसरा, भारत-इजरायल के मजबूत राजनयिक संबंधों के कारण इजरायली लोग भारतीयों पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं. उनका स्वागत करते हैं.
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विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इजरायल में 20,000 से अधिक भारतीय केयरगिवर, निर्माण कार्य, कृषि और आईटी-सॉफ्टवेयर जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. हाल ही में भारत और इजरायल के बीच एक नए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसके तहत 50,000 और भारतीय श्रमिकों को इजरायल में रोजगार दिया जाएगा.
भले ही पश्चिम एशिया के इस लंबे संघर्ष के कारण भारत सहित पूरी दुनिया ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक मोर्चे पर महंगाई का सामना कर रही है, लेकिन इन सब मुश्किलों के बीच इन बहनों की हिम्मत मिसाल है. आज रीना, पूनम और उनके जैसे हजारों भारतीय बस यही दुआ कर रहे हैं कि इजरायल और भारत के मणिपुर, दोनों ही जगहों पर जल्द से जल्द हमेशा के लिए शांति बहाल हो सके.