एशियन गेम्स 2026 में भारतीय टीम ने कुल 85 पदक जीते जिनमें 21 स्वर्ण शामिल थे. इनमें से भारतीय सेना के खिलाड़ियों ने अकेले 20 पदक हासिल किए. इनमें छह स्वर्ण, आठ रजत और छह कांस्य पदक शामिल हैं. यह योगदान देश के कुल पदकों का लगभग एक-चौथाई और स्वर्ण पदकों का करीब 29 प्रतिशत बैठता है. Photo: ITG
पिछले एशियन गेम्स की तुलना में सेना के स्वर्ण पदकों की संख्या दोगुनी हो गई है. यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि सेना के खिलाड़ी अब सिर्फ भागीदारी नहीं बल्कि पदक जीतने वाले मुख्य स्तंभ बन गए हैं. नाईब सूबेदार गुलवीर सिंह ने एथलेटिक्स में तीन व्यक्तिगत पदक जीते. उन्होंने 1500 मीटर और 10,000 मीटर में रजत तथा 5000 मीटर में कांस्य हासिल किया. Photo: ITG
नाईब सूबेदार नीरू ढांडा ने दो स्वर्ण और एक रजत जीता. उन्होंने महिलाओं की ट्रैप स्पर्धा में 28 के एशियन रिकॉर्ड स्कोर के साथ व्यक्तिगत स्वर्ण जीता और भारतीय महिला के रूप में इस इवेंट में पहली बार एशियन गेम्स स्वर्ण का रिकॉर्ड बनाया. हवलदार सावन बरवाल ने मैराथन में राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ रजत पदक जीतकर भारत की 44 साल पुरानी प्रतीक्षा समाप्त की. Photo: ITG
नाईब सूबेदार सर्वेश कुशारे ने हाई जंप में 56 साल बाद रजत पदक दिलाया. नाईब सूबेदार सलमान खान ने सतनाम सिंह के साथ पुरुष डबल स्कल्स में भारत का पहला एशियन गेम्स पदक सुनिश्चित किया. सूबेदार धीरज बोम्मादेवरा ने पुरुष रिकर्व आर्चरी में राष्ट्रीय और एशियन गेम्स क्वालीफिकेशन रिकॉर्ड बनाए. Photo: ITG
हवलदार कमलजीत सिंह ने सुरूची सिंह के साथ मिक्स्ड 10 मीटर एयर पिस्टल में 484.6 के एशियन गेम्स रिकॉर्ड स्कोर के साथ स्वर्ण पदक जीता. ये उपलब्धियां व्यक्तिगत मेहनत के साथ-साथ एक सुव्यवस्थित प्रणाली का परिणाम हैं. Photo: ITG
भारतीय सेना का मिशन ओलंपिक विंग डायरेक्टर जनरल इंटीग्रेटेड ट्रेनिंग के व्यापक ढांचे के अंदर काम करता है. साल 2001 में मिशन ओलंपिक की शुरुआत हुई थी. इसका मुख्य मकसद खेल प्रतिभाओं को जल्दी पहचानना, उन्हें व्यवस्थित प्रशिक्षण देना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने लायक बनाना है. Photo: ITG
पहले सेना में खेल सिर्फ फिटनेस और मनोरंजन का हिस्सा माना जाता था लेकिन इस मिशन ने इसे पेशेवर और लक्ष्य आधारित प्रणाली में बदल दिया. अब खिलाड़ियों को सिर्फ शारीरिक प्रशिक्षण नहीं बल्कि खेल विज्ञान, पोषण, मानसिक मजबूती, रिकवरी और अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी मिलता है. Photo: ITG
इस पूरे सिस्टम का लक्ष्य एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स, ओलंपिक और अन्य बड़े टूर्नामेंट में भारत के लिए पदक सुनिश्चित करना है. प्रतिभा पहचान से लेकर पदक तक का पूरा रास्ता बनाने की कोशिश की गई है ताकि एक बार सफलता मिलने के बाद भी निरंतरता बनी रहे. Photo: ITG
मिशन ओलंपिक के तहत 1 जुलाई 2001 को पुणे में आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई. यह संस्थान सेना के खेल पारिस्थितिकी तंत्र का केंद्र बिंदु बन गया है. यहां आर्चरी, एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, डाइविंग, फेंसिंग, भारोत्तोलन और कुश्ती जैसे कई विषयों में व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाता है. Photo: ITG
पेशेवर कोच, आधुनिक उपकरण, खेल विज्ञान की सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक्सपोजर सुविधाएं उपलब्ध हैं. खिलाड़ियों को सिर्फ तकनीक नहीं सिखाई जाती बल्कि उनकी ताकत, कमजोरी, चोट से बचाव और मानसिक तैयारी पर भी गहराई से काम होता है. Photo: ITG
इस संस्थान ने कई खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. यहां का माहौल सैन्य अनुशासन और खेल उत्कृष्टता का मिश्रण है जिससे खिलाड़ी दबाव में भी बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं. Photo: ITG
सेना का खेल नेटवर्क अब काफी व्यापक हो चुका है. करीब 9000 खिलाड़ियों को 28 आर्मी स्पोर्ट्स नोड्स में प्रशिक्षित किया गया है. इसके अलावा 18 बॉयज स्पोर्ट्स कंपनी और दो गर्ल्स स्पोर्ट्स कंपनी काम कर रही हैं. एक समर्पित पैरालंपिक नोड भी है जो दिव्यांग खिलाड़ियों को तैयार करता है. Photo: ITG
ये फीडर संरचनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें कम उम्र में ही प्रतिभाशाली बच्चों को चुना जाता है और उन्हें धीरे-धीरे ऊंचे स्तर तक ले जाया जाता है. जल्दी पहचान होने से खिलाड़ी को लंबे समय तक सही दिशा में विकास का मौका मिलता है. पोषण, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, रिकवरी प्रोटोकॉल और मानसिक कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं इन नोड्स में भी उपलब्ध कराई जाती हैं. Photo: ITG