प्रयागराज के एक घर के अंदर तीन लोगों का कत्ल होता है. शक घर के छोटे बेटे पर जाता है. लेकिन बाद में छोटे बेटे की लाश भी मिल जाती है. अब पुलिस की उलझन बढ़ जाती है. घर की दिवार और गत्ते पर दो लाइन लिखी मिलती हैं. पुलिस की उलझन और बढ़ जाती है. लेकिन किसी तरह से पुलिस कातिल तक पहुंच जाती है और उसे गिरफ्तार कर लेती है. लेकिन जैसे ही कातिल मुंह खोलता है, पुलिस हैरान रह जाती है. उसकी उलझन में इजाफा हो जाता है. जानिए चार लोगों के कत्ल की सिर चकरा देने वाली पूरी कहानी.
जब नोएडा की आरुषि का कत्ल हुआ था, तब पुलिस समेत हरेक को यही लगा कि घरेलू नौकर हेमराज आरुषि का क़त्ल कर भाग गया है. क्योंकि आरुषि के कत्ल के बाद खुद हेमराज गायब था. नोएडा पुलिस की एक टीम हेमराज को पकड़ने के लिए नेपाल भी रवाना कर दी गई थी. पर तभी अगले दिन पुलिस को ख़्याल आया कि घर की अच्छे से तलाशी ली जाए और उसी तलाशी के दौरान आरुषि के क़त्ल के एक दिन बाद उसी घर की छत से हेमराज की लाश मिली थी. यानि जिसे नोएडा पुलिस कातिल मान रही थी, खुद उसका कत्ल हो चुका था. मतलब साफ था कि आरुषि और हेमराज का असली कातिल कोई और था. कौन था ये खैर आज 18 साल बाद भी किसी को नहीं पता.
अब यूपी के प्रयागराज में लगभग लगभग आरुषि की यही कहानी दोहराई जाने वाली थी. एक घर से तीन लोगों की लाश मिली. और उस घर का चौथा मेंबर यानि बेटा गायब था. पुलिस समेत लोगों को यही लगा कि बेटे ने ही अपने मां-बाप और बहन का कत्ल किया और भाग गया. पर शायद आरुषि की कहानी प्रयागराज पुलिस के जेहन से गई नहीं थी. लिहाजा, पुलिस ने उस गलती को दोहराने की बजाय ये तय किया कि पूरे घर और घरवालों के दुकान की अच्छे से तलाशी ली जाए. फैसला काम कर गया. जिसे बेटे पर घर के तीन लोगों के कत्ल का शक था, दुकान से उसी बेटे की लाश मिल गई. यानि अब मरने वालों की तादाद 4 हो चुकी थी. जिस पर कातिल होने का शक था खुद उसका भी कत्ल हो चुका था.
असल में चार कत्ल की ये वो कहानी है, जो आपको हर कदम पर चौंकाएगी. इस कहानी में ऐसे ऐसे ट्विस्ट है क्रिमिनल दिमाग की ऐसी ऐसी सोच कि क्या कहिए. सबसे अजीब तो इस कहानी का क्लाइमेक्स है, जो पूरी कहानी का रुख मोड़ देता है. तो चलिए कहानी शुरु करते हैं.
बात 2 जून की है. प्रयागराज के एक घर से पड़ोसियों को कुछ बदबू आती है. वो घर 70 साल के वीरेंद्र वैश्य का है. घर के नीचे कुल 18 दुकाने हैं. ये सभी दुकानें वीरेंद्र वैश्य की ही हैं. घर में वीरेंद्र वैश्य के अलावा उनकी पत्नी 65 साल की अनीता और 45 साल की बेटी मीनाक्षी रहती थी. इन तीनों के अलावा वीरेंद्र का 40 साल का बेटा अभिषेक भी इसी घर में रहता था. घर से आती बदबू की शिकायत मिलने पर पुलिस जब मौके पर पहुंची तो घर के अंदर का मंजर डरावना था. सीढ़ी पर मीनाक्षी की लाश पड़ी थी. जबकि कमरे में वीरेंद्र और उनकी पत्नी अनीता की.
सभी के सिर पर किसी वजनी चीज से हमला किया गया था. लेकिन अभिषेक घर पर नहीं था. कुछ वक्त पहले ही वीरेंद्र ने अपने बेटे अभिषेक को अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया था. पड़ोसियों और रिश्तेदारों से ये पता चलते ही पुलिस को लगा केस आसान है. अभिषेक ने ही तीनों कत्ल किए हैं. लेकिन तभी घर के अंदर से पुलिस को दो ऐसी चीज मिली जिसके बाद पुलिस को लगा कि वो खामखां अभिषेक पर शक कर रही है. असल में एक जगह दीवार पर लिखा था बेटा- बहू. और उसी घर में एक गत्ते पर लिखा मिला बंटी-बबली और बहू ने मारा.
पुलिस का दिमाग चकरा गया. कहानी में अचानक बंटी और बबली की एंट्री हो चुकी थी. असल में बंटी कोई और नहीं वीरेंद्र का बड़ा बेटा अश्वनी वैश्य है. और अश्वनी की पत्नी ऋतु वैश्य. इन दोनों का नाम बंटी बबली इसलिए पड़ा क्योंकि दोनों ही एक नंबर के ठग हैं. फ्रॉ़ड के कई केस इनके सिर पर है. यहां तक की पुलिस ने इनपर 25-25 हजार रुपय़े का इनाम भी घोषित कर रखा था. अश्वनी इस वक्त जेल में है. जबकि उसकी पत्नी यानि बबली जेल के बाहर. वीरेंद्र वैश्य ने दोनों की इसी करतूत के चलते अपने दूसरे बेटे को भी बेदखल कर रखा है. अब पुलिस कन्फ्यूज थी कि तीनों कत्ल अगर बंटी बबली ने किए हैं, तो अभिषेक कहां गायब है.
आरुषि केस वाली गलती ना दोहराई जाए इसलिए अब पुलिस ने वीरेंद्र और अभिषेक की दुकानों की तलाशी लेने की सोची. अभिषेक की दुकान बंद थी. ताला खोलकर पुलिस अंदर गई. अंदर जाते ही पुलिस एक बार फिर हैरान थी. जिस अभिषेक को शुरुआत में पुलिसे कातिल मान रही थी वो खुद अंदर मुर्दा पड़ा था. इस तरह अब लाशों की गिनती चार तक जा पहुंची थी. अभिषेक की लाश मिलने के बाद जब पुलिस को पता चला कि वीरेंद्र का दूसरा बेटा यानि अश्वनी उर्फ बंटी पहले से ही जेल के अंदर है, तो फिर वो कत्ल कैसे कर सकता है.
लिहाजा पुलिस ने नए एंगल के साथ अपनी जांच शुरु की. पुलिस ने सबसे पहले आसपास के तमाम सीसीटीवी कैमरों को तसल्ली से खंगालने का फैसला किया. आनन फानन में 20 टीमें बनाई गईं. अभिषेक समेत घरवालों के कॉल डीटेल निकाले गए. इन्हीं सारी कवायद के दौरान दो चीजे हुईं. पहली एक सीसीटीवी कैमरे में एक जून की सुबह 5 बजे एक शख्स वीरेंद्र के घर से बाहर निकलता दिखाई दिया. जब उसकी शिनाख्त कराई गई तो पता चला तो उसका नाम सनी गुप्ता है. सनी की अभिषेक की दुकान के पास ही समोसे की दुकान है. इसके बाद जब अभिषेक के मोबाइल के कॉल डीटेल निकाले गए तो पता चला कि 31 मई कि शाम तक अभिषेक और सनी ने कई बार फ़ोन पर बातचीत की थी. पुलिस की एक टीम सनी के घर पहुंची और उसे गिरफ्तार कर लिया.
गिरफ्तारी के बाद अब जैसे ही सनी ने मुंह खोला, पूरी कहानी पलट गई. कहानी का पूरा क्लाइमेक्स ही बदल गया. असल में वो वीरेंद्र का बेटा अभिषेक ही था जिसने सनी के साथ मिलकर अपने मां-बाप और बहन का कत्ल किया था. तो फिर अभिषेक का कत्ल किसने किया?
चलिए अब सिलसिलेवार अब हर साजिश से पर्दा उठाते हैं. असल में जब अभिषेक को उसके पिता ने बेदखल किया, तभी से वो नाराज था. कर्ज में भी डूबा था. इसी के बाद उसने सनी को साथ मिलाकर अपने मां-बाप और बहन के कत्ल की साजिश रची. अभिषेक ने तय किया कि 31 मई की शाम वो इस कत्ल को अंजाम देगा. 31 मई की दोपहर से ही अभिषेक और सनी पहले बीयर पीते हैं. कचौड़ी खाते हैं और फिर घर में दाखिल होते हैं. घर में घुसते ही सबसे पहले अभिषेक को अपनी बहन मीनाक्षी सीढ़ियों पर नजर आई. इससे पहले की मीनाक्षी कुछ समझ पाती अभिषेक और सनी ने साथ लाई गई लोहे की रॉड और बीयर की बॉटल से उस पर हमला कर दिया.
इसके बाद दोनों उस कमरे में गए जहां वीरेंद्र और उनकी पत्नी मौजूद थे. दोनों ने उन दोनों के सिर पर भी लोहे की रॉड से हमला किया और दोनों को मार डाला. तीन कत्ल करने के बाद दोनों घर में रखे करीब एक किलो जेवरात जिनकी कीमत डेढ़ करोड़ से ज्यादा है, एक बैग में भरते हैं फिर लोहे की रॉड, बीयर की बोतल, मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, हथौड़ा सब कुछ उसी घर में पानी की टंकी में डाल देते हैं.
अब लूट के सामान के साथ दोनों नीचे आते हैं. अभिषेक और सनी अब अभिषेक की दुकान में बैठे थे. अब बारी लूटे गए जेवरात का हिस्सा करना था. अभिषेक ने सनी को लूटे गए जेवर में से सिर्फ 5 कंगन दिए. सनी को ये बुरा लगा. फिर उसे अचानक ख्याल आया कि जो शख्स अपने मां-बाप का नहीं हुआ वो उसका क्या होगा. सनी को ये भी ख्याल आया कि अगर वो अभिषेक को ही मार दे तो सारे जेवर उसके हो जाएंगे. बस इसी के बाद अभिषेक की दुकान में ही सनी ने अब अभिषेक को मार डाला.
अभिषेक का कत्ल करने के बाद सनी उसी दुकान में बैठा रहा. उसने खून साफ किया. लाश पर तेजाब जैसी चीज डाली. फिर वापस वीरेंद्र के घर गया. पूरी रात वहीं रहा. चूंकि कपड़े खून से सने थे, लिहाजा उसी घर में नहाया. फिर वीरेंद्र के ही कपड़े निकाल कर पहने. वीरेंद्र के जूते भी पहने. इसके बाद सुबह होने से पहले वो उस घर से निकल गया. पर कुछ सोचकर वो फिर से वापस आया.
आरोपी ने पुलिस को बताया कि वो सनी ही था जिसने कत्ल के बाद घर की दीवार और गत्ते पर बंटी-बबली और बहू की कहानी लिखी थी. असल में अभिषेक को पता था कि उसका बड़ा भाई घोषित क्रिमिनल है. लिहाजा, कत्ल का सारा शक उसी पर जाएगा और फिर वो अपने पिता की सारी मिल्कियत का इकलौता वारिस होगा.
जब इस चार कत्ल के खुलासे के लिए प्रयागराज पुलिस ने प्रेस कॉंफ्रेंस की तो सनी लगातार पीछे खड़ा था. प्रेस कॉंफ्रेंस खत्म होने के बाद जब उसे ले जाया जा रहा था, तब सनी ने कहा कि असल में तीन क़त्ल करने के लिए अभिषेक ने उसे उकसाया था. और अभिषेक का कत्ल उसने इसलिए किया क्योंकि उसने उसका हिस्सा नहीं दिया. मां-बाप और बहन का कातिल भी बन गया. खुद भी मारा गया.
ना दौलत मिली ना जायदाद और क्या पता अब सब कुछ उसी बंटी बबली के हिस्से आ जाए, जिसका नाम दीवार और गत्ते पर लिखकर अभिषेक ने पुलिस को उलझाने की कोशिश की थी. वो एक लाइन है ना ना खुदा ही मिला, ना विसाल-ए-सनम. ये बात अभिषेक पर पूरी तरह फिट बैठ रही है.
(प्रयागराज से पंकज श्रीवास्तव के साथ समर्थ श्रीवास्तव का इनपुट)