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नकली FASTag, फर्जी नंबर प्लेट और टोल-चालान से बचने का खेल... यूपी STF ने दबोचा 28 साल का आरोपी, ऐसे हुआ खुलासा

UP STF ने नकली FASTag और फर्जी वाहन नंबर के जरिए टोल ट्रैकिंग व ऑनलाइन चालान से बचने वाले कथित रैकेट का खुलासा किया है. 28 वर्षीय आरोपी मनीष गिरफ्तार हुआ. पढ़ें इस जालसाज की पूरी कहानी.

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इस मामले में STF की जांच अभी जारी है (फोटो-ITG)
इस मामले में STF की जांच अभी जारी है (फोटो-ITG)

उत्तर प्रदेश में नकली FASTag और फर्जी रजिस्ट्रेशन नंबर के जरिए टोल ट्रैकिंग और ऑनलाइन ट्रैफिक चालान से बचने वाले कथित रैकेट का STF ने पर्दाफाश किया है. जांच में सामने आया है कि इस तरीके का इस्तेमाल खास तौर पर हाईवे पर चलने वाले भारी वाहनों में किया जा रहा था. ये वाहन कथित तौर पर ओवरलोडेड मिनरल मटेरियल, जिसमें मोरंग भी शामिल है, लेकर चलते थे. इस पूरे खेल की वजह से सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है.

उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स यानी UP STF ने इस मामले में सीतापुर जिले के रहने वाले 28 वर्षीय मनीष को गिरफ्तार किया है. STF ने उसे सोमवार को लखनऊ के मड़ियाऊं इलाके में इंजीनियरिंग कॉलेज चौराहे के पास से पकड़ा. अधिकारियों के मुताबिक, यह गिरफ्तारी सरोजिनी नगर थाने में दर्ज एक मुकदमे की जांच के दौरान हुई. मामले में भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है.

जांच के मुताबिक, रैकेट में शामिल लोग असली वाहन के बजाय फर्जी रजिस्ट्रेशन नंबर से लिंक किया गया FASTag इस्तेमाल करते थे. इसका मकसद टोल प्लाजा और ऑनलाइन ट्रैफिक सिस्टम की नजर से बचना था. अगर रास्ते में वाहन का कोई ऑनलाइन चालान बनता था तो वह कथित तौर पर फर्जी नंबर वाले वाहन के नाम पर चला जाता था. इस तरह असली वाहन और उसके ऑपरेटर तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था.

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STF की जांच में एक ऐसे वाहन का भी पता चला है, जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर UP32 ZN 8925 बताया गया है. यह वाहन रियाज के नाम पर है और कथित तौर पर उसका भाई सिराज इसे चलवाता था. जांच एजेंसी के मुताबिक, इस वाहन में MA34 S 9455 नंबर से जुड़ा फर्जी FASTag इस्तेमाल किया जा रहा था. यानी टोल सिस्टम में वाहन की पहचान वास्तविक नंबर के बजाय एक फर्जी रजिस्ट्रेशन नंबर से होती थी.

STF के एडिशनल एसपी सत्यसेन के मुताबिक, सिराज ने सीतापुर के खैराबाद टोल प्लाजा के पास मौजूद एक इंडसइंड बैंक FASTag एजेंट के जरिए यह फर्जी FASTag हासिल किया था. जांचकर्ताओं का कहना है कि FASTag बनवाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस, मोबाइल नंबर और फर्जी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया गया. इस फर्जी RC पर काल्पनिक वाहन नंबर दर्ज था. इसी दस्तावेज के आधार पर FASTag को कथित तौर पर फर्जी नंबर से लिंक कराया गया.

जांच में यह भी सामने आया कि FASTag को वाहन की विंडस्क्रीन पर स्थायी तौर पर नहीं लगाया गया था. इसके बजाय ड्राइवर इसे अपने पास अलग से रखता था और टोल प्लाजा पार करते समय मैनुअली दिखाता था. इस तरह टोल सिस्टम में फर्जी वाहन नंबर की एंट्री हो जाती थी. इसके बाद FASTag से मिलने वाली रसीदों को संभालकर रखा जाता था और जरूरत पड़ने पर रूट चेकिंग के दौरान इन्हें दिखाया जाता था.

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पूछताछ के दौरान मनीष ने STF को कथित तौर पर बताया कि वह सिराज के लिए वाहन चलाता था. इसके बदले उसे हर ट्रिप के लिए **1,500 रुपये** दिए जाते थे. मनीष के अनुसार, उसे फर्जी FASTag के इस्तेमाल का तरीका भी बताया गया था. जांच एजेंसी का कहना है कि इस तरीके का इस्तेमाल ऑनलाइन चालान और दूसरे प्रवर्तन से बचने के लिए किया जाता था.

STF अब इस पूरे नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और फर्जी FASTag तैयार कराने की प्रक्रिया की भी जांच कर रही है. जांच का फोकस इस बात पर है कि ऐसे कितने वाहनों में फर्जी FASTag और काल्पनिक रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल किया गया. साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस तरीके से कितने टोल ट्रांजैक्शन और ऑनलाइन चालान प्रभावित हुए और सरकार को राजस्व का कितना नुकसान हुआ.

मनीष को गिरफ्तारी के बाद अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. फिलहाल मामले में आगे की जांच जारी है. STF यह पता लगाने में जुटी है कि इस कथित रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और फर्जी FASTag तथा दस्तावेज तैयार कराने का पूरा नेटवर्क किस तरह काम करता था.

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