पाकिस्तान आर्थिक तौर पर पूरी तरह से कंगाल हो चुका है. लेकिन आर्थिक मदद के लिए वो जो खेल खेल रहा है, उसमें अब वो खुद उलझता जा रहा है. पाकिस्तान को मदद हर देश से चाहिए, इसलिए हर देश के हां में हां मिलाता भी रहा है. युद्ध के बीच ईरान के साथ भी पाकिस्तान अच्छा रिश्ता चाहता है, सऊदी अरब से भी मदद चाहिए, इसलिए सऊदी अरब की हर बात को मानता है, अमेरिका को भी खुश करने में लगा रहता है.
दरअसल, पाकिस्तान समंदर में फंसा एक ऐसा नाव है, जिसपर कोई भी देश कुछ डॉलर रखकर और उसे अपनी दिशा में चला देता है. कभी चीन, कभी अमेरिका, तो मिडिल ईस्ट के तमाम देश. लेकिन अफगानिस्तान के साथ जंग के बीच ईरान ने पाकिस्तान की मुसीबत बढ़ा दी है.
ईरान ने पाकिस्तान को सीधे युद्ध की धमकी नहीं दी है. लेकिन एक कड़ी चेतावनी जरूर दी है. तमाम रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन (Masoud Pezeshkian) और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच फोन पर बात हुई. इस बातचीत में ईरान ने कहा कि अगर मौजूदा युद्ध में दोषियों को सजा नहीं मिली और कुछ देश गलत पक्ष का साथ दे रहे हैं, जिससे वैश्विक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. ईरान ने एक तरह से पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल खड़ा कर दिया है.
पाकिस्तान पर चिढ़ गया ईरान
अब पाकिस्तान को कुछ समझ में नहीं आ रहा है. क्योंकि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है. अगर ईरान-सऊदी अरब में टकराव बढ़ता है तो पाकिस्तान को सऊदी का साथ देना पड़ सकता है. इसी वजह से ईरान ने संकेत दिया है कि क्षेत्रीय देशों को युद्ध में पक्ष लेने से बचना चाहिए.
अब अगर यहां से पाकिस्तान और ईरान के बीच रिश्ते बिगड़ते हैं, तो उसका भारी नुकसान पाकिस्तान को ही होने वाला है, क्योंकि पाकिस्तान अमेरिका के खिलाफ मुंह नहीं खोल सकता. इजरायल को लेकर चुप रहने में ही पाकिस्तान का फायदा है. पाकिस्तान फिलहाल तटस्थ (neutral) रहने की कोशिश कर रहा है. लेकिन सऊदी अरब से रक्षा समझौते के कारण वह दबाव में है. इसी कारण मध्य-पूर्व की इस लड़ाई में पाकिस्तान के फंसने की चर्चा बढ़ रही है.
पाकिस्तान और ईरान के बीच हाल के वर्षों में करीब 3.1 अरब डॉलर (लगभग 26 हजार करोड़ रुपये) का सालाना व्यापार रहा है. इसमें ईरान का निर्यात ज्यादा है. पाकिस्तान को ईरान पेट्रोलियम, एनर्जी प्रोडक्ट्स, खजूर और खासकर डेयरी प्रोडक्ट उपलब्ध कराता है. जबकि पाकिस्तान ईरान को चावल, तेल, बीज, मांस और कृषि उत्पाद बेचता है. दोनों देशों ने व्यापार को 10 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है.
पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब क्यों जरूरी?
जबकि सऊदी अरब पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक और तेल सहयोगी है. यानी यहां से पाकिस्तान को सबसे ज्यादा तेल मिलता है. तेल उधारी भी देता है और साथ में अरबों डॉलर का कर्ज भी मुहैया कराता है. आर्थिक सहायता के साथ-साथ सऊदी अरब का पाकिस्तान में बड़ा निवेश भी है. जबकि लाखों पाकिस्तान सऊदी अरब में काम करते हैं. सऊदी अरब पाकिस्तान को हर साल करीब 1.2 अरब डॉलर तक तेल खरीद की सुविधा देता है. लेकिन दोनों के बीच एक रक्षा समझौता भी है, जिसमें एक पर हमला होने पर दूसरे का सहयोग शामिल हो सकता है.
ऐसे में अगर ईरान सऊदी अरब पर हमला करता है, फिर समझौते के मुताबिक पाकिस्तान को सऊदी अरब का साथ देना होगा, जिससे चिढ़कर ईरान पाकिस्तान पर भी हमला कर सकता है. इसलिए पाकिस्तान के लिए संकट गहराता जा रहा है.
हालांकि मौजूदा समय में जो युद्ध चल रहा है, उसके केंद्र में अमेरिका है. अमेरिका को पाकिस्तान कभी भी नाराज नहीं कर सकता. क्योंकि कंगाल पाकिस्तान के लिए ये देश सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है. साल 2024 में अमेरिका-पाकिस्तान व्यापार लगभग 7.3 अरब डॉलर का रहा था. इसके अलावा हथियार भी देता है. पाकिस्तान को IMF और वर्ल्ड बैंक से कर्ज दिलाने में भी अमेरिका की बड़ी भूमिका रहती है.
अब पाकिस्तान की भूमिका को देखकर ईरान चिढ़ गया है. जबकि पाकिस्तान मझधार में फंसा हुआ है, क्योंकि एक तरह अमेरिका और सऊदी अरब है, जो निवाला दे रहा है. जबकि दूसरी ओर ईरान है, ये देश भी आर्थिक मदद देता है. लेकिन अब पाकिस्तान को समझ में नहीं आ रहा है, कि किसको खुलकर साथ दिया जाए.