यह लाइटर का जमाना है, लेकिन माचिस (Matchbox) की डिमांड और कारोबार भी पहले जैसा ही है. आपके मन सवाल उठ रहा होगा कि अब माचिस का इस्तेमाल कहां होता है, क्योंकि अधिकतर किचन में तो लाइटर का इस्तेमाल होता है.
माचिस से जुड़ी कई रोचक बातें हैं, पहली बात माचिस की कीमत हर साल नहीं बढ़ती है, आमतौर पर भारत में माचिस के दाम में एक दशक के बाद बदलाव होता है. देश में माचिस की कीमत आखिरी बार 1 दिसंबर 2021 को बढ़ी थी. तब इसकी कीमत 1 रुपये से बढ़ाकर 2 रुपये की गई थी. यह बढ़ोतरी पूरे 14 साल के लंबे अंतराल के बाद हुई थी.
इससे पहले साल 2007 में माचिस की कीमत 50 पैसे से बढ़ाकर 1 रुपये की गई थी. हमेशा माचिस की कीमतों में एक साथ (Matchbox Price Hike) 100 फीसदी बढ़ोतरी होती है. दाम बढ़ाने का फैसला शिवकाशी में ऑल इंडिया चैंबर ऑफ मैचेस द्वारा लिया जाता है. ऑल इंडिया चैंबर ऑफ माचिस (AICMI) के अनुसार यह करीब 3,000 करोड़ रुपये का उद्योग है. (Photo: Getty)
भारत में साल 1950 में माचिस की एक डिब्बी की कीमत महज 5 पैसे थी, जो 1995 में बढ़कर 50 पैसे की हो गई.माचिस के प्रत्येक बॉक्स में 50 तीलियां होती हैं. 600 माचिस डिब्बे का एक बंडल होता है. माचिस बनाने में 14 तरह की चीजें लगती हैं. जिसमें लाल फास्फोरस, मोम, कागज, स्प्लिंट्स, पोटेशियम क्लोरेट और सल्फर मुख्य रूप से है. इसके अलावा माचिस की डिब्बी दो तरह के बोर्ड से बनते हैं. बाहरी बॉक्स बोर्ड और भीतरी बॉक्स बोर्ड.
भारत में सबसे बड़ा माचिस उद्योग तमिलनाडु में है. तमिलानाडु के शिवकाशी, विरुधुनगर, गुडियाथम और तिरुनेलवेली मैन्युफैक्चरिंग हब है. भारत में फिलहाल माचिस की कई कंपनिया हैं, अधिकतर फैक्टरीज में अब भी हाथों से काम होता है. जबकि कुछ फैक्ट्रियों में मशीनों की मदद से माचिस का निर्माण होता है.
तमिलनाडु में इस उद्योग में लगभग चार लाख लोग काम करते हैं और इन कर्मचारियों में 90 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं. माचिस बनाने वालों को बॉक्स बनाने की उनकी क्षमता के आधार पर भुगतान किया जाता है. माचिस की तीलियों को फ्रेम में लगाना, बक्से (डिब्बियां) तैयार करना और पैकेजिंग जैसे बारीक काम मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाएं ही करती हैं. (Photo: Getty)
भारत में माचिस बनाने की शुरुआत साल 1895 में हुई थी. इसकी पहली फैक्ट्री अहमदाबाद में और फिर कलकत्ता में खुली थी. भारत में सबसे पहले स्वीडन की एक मैच मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ने माचिस बनाने की कंपनी खोली थी. दुनिया में सबसे पहले ब्रिटेन में 31 दिसंबर 1827 को माचिस का आविष्कार हुआ था. आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक जॉन वॉकर ने एक ऐसी माचिस की तीली बनाई थी, जिसे किसी भी खुरदरी जगह पर रगड़ने से जल जाती थी.
माचिस की तीली पर फॉस्फोरस का मसाला लगाया जाता है. फॉस्फोरस अत्यंत ही ज्वलनशील रासायनिक तत्व है. तमिलनाडु में सबसे पहले माचिस की फैक्ट्री 1922 में शिवकाशी शहर में लगाया गया था. पहले सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे गंध की समस्या का तो समाधान हो गया था. लेकिन जलते वक्त निकले वाला धुआं भी काफी विषैला होता था. इससे बाद में सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल पर बैन लगा दिया था. (Photo: Getty)
पिछले कुछ वर्षों में पारंपरिक लकड़ी वाली माचिस (Matchbox) की घरेलू मांग (Domestic Demand) में भारी गिरावट आई है. हालांकि, माचिस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन इसका बाजार और इस्तेमाल करने का तरीका पूरी तरह बदल चुका है. आज लगभग हर भारतीय रसोई में गैस स्टोव को जलाने के लिए 'स्पार्क लाइटर' या 'इलेक्ट्रॉनिक लाइटर' का इस्तेमाल होता है. यह माचिस के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित, टिकाऊ और सस्ता पड़ता है.
सिगरेट या बीड़ी पीने वाले लोग अब माचिस की जगह पॉकेट लाइटर (Disposable Lighters) रखना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि ये हवा में भी आसानी से जल जाते हैं और इन्हें कैरी करना फैशनेबल माना जाता है. पहले घरों में सुबह-शाम दीया-बत्ती या अगरबत्ती जलाने के लिए माचिस का भारी इस्तेमाल होता था. अब कई घरों में इसकी जगह भी फैंसी इलेक्ट्रिक दीयों या रिचार्जेबल कैंडल लाइटर्स ने ले ली है.
घरेलू बाजार में मांग घटने के बावजूद भारत का माचिस उद्योग बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ है. भारतीय माचिसों की मांग आज भी अफ्रीकी देशों, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका में बहुत ज्यादा है. घरेलू गिरावट की भरपाई भारतीय कंपनियां विदेशों में एक्सपोर्ट करके कर रही हैं. ग्रामीण इलाकों में, जहां बिजली की कटौती ज्यादा होती है या आज भी पारंपरिक चूल्हों का इस्तेमाल होता है, वहां माचिस की मांग बनी हुई है. इसके अलावा ढाबों, चाय की दुकानों और होटलों में भी इसका उपयोग होता है.