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भारत के रईस आखिर क्यों चुपचाप खरीद रहे हैं विदेश में दूसरा घर

वे भारत छोड़कर नहीं जा रहे हैं, लेकिन वो चाहते हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनके पास ऐसा करने का विकल्प हो. दुबई से लेकर पुर्तगाल और ग्रीस तक, प्रमोटर और कारोबारी परिवार विदेशों में दूसरी रेज़िडेंसी के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं, यह देश छोड़ने के बारे में नहीं है, यह एक तरह का इंश्योरेंस है.

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अब संकट से बचने के लिए विदेश में 'प्लान-बी' खरीद रहे हैं भारत के रईस (Photo-ITG)
अब संकट से बचने के लिए विदेश में 'प्लान-बी' खरीद रहे हैं भारत के रईस (Photo-ITG)

पहले भारत के अमीर लोग अपना पैसा सिर्फ देश के अंदर ही बिजनेस, जमीन-जायदाद और शेयर बाजार जैसी जगहों पर लगाते थे. लेकिन अब, देश के सबसे अमीर परिवारों और बड़े बिजनेसमैन की पसंद बदल रही है. वे अब चुपचाप एक नई चीज़ में निवेश कर रहे हैं- विदेशों में सेकंड रेजिडेंसी या वहां की नागरिकता लेना.

इसका मकसद लाज़मी तौर पर भारत छोड़ना नहीं है, इसके बजाय, अमीर परिवार तेजी से एक प्लान बी खरीद रहे हैं जो उन्हें ग्लोबल मोबिलिटी, उनके बच्चों के लिए बेहतर शैक्षणिक अवसर, अंतरराष्ट्रीय बिजनेस हब तक पहुंच और एक तेजी से अनिश्चित होती दुनिया के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है. Garant In के संस्थापक और ग्लोबल सीईओ एंड्री बोइको के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में इस बदलाव में काफी तेजी आई है.

यह खबर सुर्खियों में नहीं आती. बिजनेस कॉन्फ्रेंस में भी इस पर चर्चा नहीं होती, लेकिन मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु में वेल्थ मैनेजर्स और फैमिली ऑफिस सलाहकारों के दफ्तरों में बहुत ही खामोशी से, लेकिन लगातार एक बातचीत का दौर चल रहा है.

भारत के सबसे अमीर परिवार 'दूसरा रास्ता' चाहते हैं?

एंड्री बोइको का कहना है, पिछले पांच सालों में भारतीय हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs), प्रमोटरों और फैमिली ऑफिसों के बीच दूसरी रेजिडेंसी की मांग एक नए आइडिया से बदलकर एक बहुत ही आम रणनीति बन चुकी है. बाजार के ज्यादातर संकेत बताते हैं कि इस दौरान इसमें गहरी दिलचस्पी लेने वालों और वास्तव में आवेदन करने वालों की संख्या कम से कम दोगुनी हो गई है."

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एक दशक पहले, लंदन, दुबई या सिंगापुर में किसी विदेशी प्रॉपर्टी का होने का सिर्फ एक ही मतलब था कि आप बेहद कामयाब हो चुके हैं. यह लाइफस्टाइल से जुड़ी एक खरीदारी थी, स्टेटस सिंबल था, लेकिन अब इस सोच में एक बड़ा बदलाव आया है, बोइको कहते हैं, "अमीर भारतीय पहले विदेशों में घर मुख्य रूप से छुट्टियां बिताने या स्टेटस सिंबल के तौर पर खरीदते थे. यह लाइफस्टाइल से जुड़ा एक फैसला था, न कि रिस्क-मैनेजमेंट से जुड़ा कोई कदम."

लेकिन पिछले कुछ सालों ने इस सोच को बदल कर रख दिया. युद्ध, प्रतिबंध, अचानक टैक्स में होने वाले बदलाव और सख्त वीजा नियमों ने वैश्विक गतिशीलता को इतना नाजुक बना दिया, जितना यह पहले कभी महसूस नहीं हुई थी. बोइको ने कहा, "अगर कोई संकट आता है या नीतियां रातों-रात बदल जाती हैं, तो आप विकल्पों के लिए हाथ-पैर मारना नहीं चाहेंगे, आप चाहेंगे कि रेजिडेंसी कार्ड पहले से ही आपके हाथ में हो. भू-राजनीतिक नक्शा आपकी सोच से कहीं ज्यादा तेजी से बदल सकता है।, इसलिए बाद में पछताने से बेहतर है कि समय रहते प्लानिंग कर ली जाए."

यह कॉन्सेप्ट बहुत सीधा है, एक भारतीय नागरिक दोहरी नागरिकता नहीं रख सकता, लेकिन वह विदेशों की कई रेजिडेंसी जरूर रख सकता है. इसका मतलब है कि परिवार अपना भारतीय पासपोर्ट भी अपने पास रखता है और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश में रहने, पढ़ाई करने या बिजनेस करने का कानूनी अधिकार भी हासिल कर लेता है.

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बोइको कहते हैं, "जब तक वे नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं लेते, तब तक वे वैश्विक गतिशीलता, डायवर्सिफाइड बिजनेस विकल्पों और एक मजबूत बैकअप प्लान के साथ भारतीय नागरिक ही बने रहते है."

भारत के अमीर कहां जा रहे हैं और कितना खर्च कर रहे हैं?

भारतीय अमीरों को आकर्षित करने वाले देश अब बदल चुके हैं, जहां पहले की पीढ़ियां अक्सर EB-5 जैसे रास्तों से अमेरिका की तरफ देखती थीं, वहीं आज के अमीर परिवार यूएई (UAE), पुर्तगाल, ग्रीस, इटली, माल्टा और कुछ चुनिंदा कैरेबियाई देशों में अपने निवेश का दायरा बढ़ा रहे हैं.

अपने बेहतरीन बिजनेस इकोसिस्टम, भारत से नजदीकी और अनुकूल टैक्स माहौल के कारण यूएई आज भी सबसे पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है. यूरोप में एंट्री चाहने वाले निवेशकों को पुर्तगाल आकर्षित कर रहा है, जहां कई लोग रेगुलेटेड इन्वेस्टमेंट फंड्स के जरिए 2.5 करोड़ से 5 करोड़ रुपये के बीच निवेश कर रहे हैं. ग्रीस भी एक मजबूत यूरोपीय विकल्प के रूप में उभरा है, जहां निवेश की सीमा 2.5 करोड़ रुपये से लेकर लगभग 8 करोड़ रुपये तक है. वहीं, इटली कम लागत वाले 'स्टार्टअप इन्वेस्टमेंट रूट' के जरिए निवेशकों को आकर्षित कर रहा है.

बोइको ने कहा, "आज के भारतीय HNIs सिर्फ एक रेजिडेंसी नहीं खरीद रहे हैं. वे 'विकल्पों' में निवेश कर रहे हैं. इन प्रोग्राम्स को जियोपॉलिटिकल और आर्थिक अनिश्चितता के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है, जो साथ ही उनके परिवारों को वैश्विक गतिशीलता, शिक्षा के अवसर और दीर्घकालिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं."

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अब बात सिर्फ विदेश में एक फ्लैट खरीदने तक सीमित नहीं रही

पुराना मॉडल बहुत सीधा था, विदेश में एक अपार्टमेंट खरीदो, रेजिडेंसी परमिट पाओ और काम खत्म, लेकिन अब वह मॉडल पूरी तरह खत्म हो चुका है, कई देशों ने रियल एस्टेट पर आधारित अपने 'गोल्डन वीजा' रास्तों को कड़ा कर दिया है या बंद कर दिया है. इसने निवेशकों को रेगुलेटेड फंड्स, सरकारी बॉन्ड, स्टार्टअप निवेश और बिजनेस से जुड़े रास्तों की तरफ बढ़ने पर मजबूर किया है. अमीर भारतीय परिवार अब दूसरी रेजिडेंसी को अपने बड़े 'फैमिली ऑफिस' की रणनीति के एक हिस्से के रूप में देख रहे हैं.

आजकल एक आम तरीका यह अपनाया जा रहा है कि बैंकिंग और बिजनेस की जरूरतों के लिए यूएई (UAE) जैसी जगह पर एक मुख्य रेजिडेंसी सुरक्षित कर ली जाती है, और साथ ही अगली पीढ़ी की पढ़ाई और ग्लोबल मोबिलिटी के लिए लॉन्ग-टर्म बैकअप के तौर पर किसी फंड निवेश के जरिए यूरोप की रेजिडेंसी भी जोड़ ली जाती है.

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