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रियल स्टेट का मायाजाल: 'वर्चुअल स्पेस' में निवेश सुरक्षित या सिर्फ छलावा

रियल एस्टेट सेक्टर में आजकल 'वर्चुअल स्पेस' का चलन तेजी से बढ़ रहा है. ऊंचे रिटर्न की चाहत और कम बजट में प्रॉपर्टी का हिस्सा बनने के आकर्षण ने इसे निवेशकों पहली पसंद बना दिया है. लेकिन, क्या यह भविष्य का स्मार्ट निवेश है या फिर ब्रोकर्स और बिल्डर्स द्वारा बुना गया एक ऐसा मायाजाल, जिसमें फंसने के बाद निकलना मुश्किल है.

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वर्चुअल स्पेस में निवेश से पहले जान लें जरूरी बातें (Photo-ITG)
वर्चुअल स्पेस में निवेश से पहले जान लें जरूरी बातें (Photo-ITG)

भारत में घर या जमीन खरीदना हमेशा से सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है, लेकिन बदलती तकनीक और मार्केटिंग के दौर में रियल स्टेट में निवेश अब सिर्फ ईंट-पत्थर तक सीमित नहीं रह गया है. आजतक रेडियो के खास कार्यक्रम 'प्रॉपर्टी से फायदा' में रियल स्टेट कंसलटेंट अभिषेक गुप्ता ने इस इंडस्ट्री के उन 'ग्रे एरियाज' पर बात की, जहां एक आम निवेशक अनजाने में फंस जाता है.

CA अभिषेक गुप्ता बताते हैं कि रियल स्टेट इंडस्ट्री में 'सपना बेचना' सबसे बड़ा हुनर है. अक्सर निवेशक आलीशान ब्रोशर और चमकते हुए सैंपल फ्लैट्स देखकर प्रभावित हो जाते हैं. इस पूरी इंडस्ट्री में ब्रोकर्स को 'सुप्रीम राइडर्स' कहा जाता है, जो निवेशकों को भविष्य के सुनहरे सपने दिखाकर निवेश करवाते हैं. लेकिन असलियत कुछ और होता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.

क्या है 'वर्चुअल स्पेस' का नया ट्रेंड?

आजकल युवाओं और छोटे निवेशकों के बीच 'वर्चुअल स्पेस' (Virtual Space) का कॉन्सेप्ट काफी लोकप्रिय हो रहा है. अगर नोएडा जैसे शहर में दुकान या ऑफिस की कीमत 60-70 लाख है, तो एक छोटा निवेशक इतना बड़ा रिस्क नहीं ले पाता. ऐसे में बिल्डर उसे 10-20 लाख में 100 स्क्वायर फीट की 'वर्चुअल स्पेस' ऑफर करते हैं. इस स्पेस के बारें में आपको पता ही नहीं होता कि बिल्डिंग के किस कोने में आपकी 100 स्क्वायर फीट की जगह है. आप इसे न तो देख सकते हैं, न ही इसका पजेशन ले सकते हैं.

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'वर्चुअल एसेट' के पीछे का बड़ा जोखिम

सीए अभिषेक गुप्ता के अनुसार, वर्चुअल स्पेस असल में रियल स्टेट नहीं बल्कि एक फाइनेंशियल स्कीम की तरह काम करती है. इसमें निवेश के तीन प्रमुख खतरे हैं.
 
डबल सेल का खतरा: चूंकि यूनिट पहचानी नहीं जा सकती इसलिए कई बार बिल्डर एक ही 5000 स्क्वायर फीट की फ्लोर प्लेट को जरूरत से ज्यादा लोगों को बेच देते हैं. नोएडा जैसे शहरों में ऐसे कई मामले आए हैं जहां एक ही यूनिट को कई बार बेचा गया.

बिल्डर पर निर्भरता: वर्चुअल स्पेस को आप खुद किराए पर नहीं दे सकते. आप पूरी तरह बिल्डर के रहमों-करम पर होते हैं कि वह किसी ब्रांड को लाएगा और आपको रेंट देगा. अगर बिल्डर प्रोजेक्ट पूरा कर दूसरे प्रोजेक्ट में चला गया, तो उसके पास आपकी यूनिट लीज कराने का कोई मोटिवेशन नहीं बचता.

लिक्विडिटी का संकट: अभिषेक गुप्ता कहते हैं, "पैसे लगा तो दिए, पर कैश-आउट कैसे करोगे? चूंकि आपकी कोई फिजिकल दुकान नहीं है, इसलिए इसे दोबारा बेचना लगभग नामुमकिन हो जाता है.

लीगल कॉम्प्लेक्सिटी और धोखाधड़ी से कैसे बचें?

पॉडकास्ट में चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि किसी भी प्रोजेक्ट में देरी होना एक आम बात बन गई है, लेकिन असली समस्या तब शुरू होती है जब 'अश्योर्ड रिटर्न' के वादे खोखले साबित होते हैं. खरीदारों को सावधान करते हुए एक्सपर्ट ने कुछ सुझाव दिए.

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  • हमेशा Lockable Unit में निवेश करें जिसे आप देख सकें और जरूरत पड़ने पर खुद इस्तेमाल कर सकें.
  • अश्योर्ड रिटर्न के कागजों को ध्यान से पढ़ें. अक्सर बिल्डर पजेशन मिलने तक रिटर्न देते हैं और बाद में हाथ खड़े कर लेते हैं.
  • बायर-सेलर एग्रीमेंट में पेनल्टी क्लॉज और एग्जिट ऑप्शन को वकील या एक्सपर्ट से जरूर चेक करवाएं.

रियल स्टेट में निवेश करना फायदे का सौदा हो सकता है, बशर्ते आप कहानियों और सपनों के बजाय जमीन पर मौजूद हकीकत और कानूनी दस्तावेजों पर भरोसा करें. वर्चुअल ऑफिस और डिजिटल लैंड जैसे नए शब्दों के आकर्षण में आने से पहले उनकी फिजिकल वैल्यू और लिक्विडिटी की जांच करना अनिवार्य है.

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