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दिल्ली-मुंबई को टक्कर देंगे ये छोटे शहर, बनेंगे रियल एस्टेट का नया 'पावरहाउस'

मेट्रो शहरों की भीड़भाड़ से दूर अब इंदौर, लखनऊ और सूरत जैसे छोटे शहर रियल एस्टेट के नए 'पावरहाउस' बनकर उभर रहे हैं. बजट 2026-27 में रिस्क फंड और बेहतर कनेक्टिविटी पर दिए गए जोर ने इन टियर-2 और टियर-3 शहरों को विकास की दौड़ में दिल्ली-मुंबई के बराबर खड़ा कर दिया है.

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कैसे बदल रही है छोटे शहरों की तस्वीर (Photo-ITG)
कैसे बदल रही है छोटे शहरों की तस्वीर (Photo-ITG)

भारत का विकास अब सिर्फ दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रहा है. बजट 2026-27 के संकेतों और रियल एस्टेट विशेषज्ञों की राय को देखें तो स्पष्ट है कि अगला बड़ा उछाल टियर-II और टियर-III शहरों में आने वाला है. वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तावित सरकारी संपत्तियों के मुद्रीकरण बुनियादी ढांचे पर निवेश ने इंदौर, लखनऊ और सूरत जैसे शहरों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं.

बजट में टियर-II और टियर-III शहरों के 'ग्रोथ कॉरिडोर' और शहरी आर्थिक क्षेत्रों में कनेक्टिविटी पर विशेष जोर दिया गया है. इसका सीधा मतलब है कि अब बड़ी कंपनियों के ऑफिस, लॉजिस्टिक्स हब और बड़े रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स इन शहरों की ओर रुख करेंगे.

एक्सप्रेसवे और क्षेत्रीय हवाई अड्डों के विस्तार ने इन शहरों को महानगरों के बराबर खड़ा कर दिया है. बड़े शहरों की तुलना में यहां जमीन और लेबर की लागत कम है, जिससे बिल्डर्स और निवेशकों को बेहतर 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' (ROI) मिलता है, महामारी के बाद से कुशल वर्कफोर्स अपने होमटाउन की ओर लौटा है, जिससे यहां प्रीमियम हाउसिंग की मांग बढ़ी है.

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यह छोटे शहरों को कैसे बदलेगा?

पहले छोटे शहरों के प्रोजेक्ट्स फंड की कमी से जूझते थे, अब 'रीट्स' के माध्यम से म्यूचुअल फंड और बड़े विदेशी निवेशक इन संपत्तियों में पैसा लगाएंगे. सरकार द्वारा समर्थित रिस्क फंड्स अब उन प्रोजेक्ट्स को सहारा देंगे जो बड़े पैमाने पर हैं, लेकिन जिनमें जोखिम अधिक है, इससे सूरत जैसे औद्योगिक शहरों में बड़े कमर्शियल और वेयरहाउसिंग प्रोजेक्ट्स को गति मिलेगी.

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डेटा सेंटर्स और 'टैक्स हॉलिडे' का जादू

बजट में 2047 तक विदेशी क्लाउड कंपनियों को दी गई टैक्स छूट (Tax Holiday) का सबसे बड़ा फायदा छोटे शहरों को मिल सकता है. नोएडा के बाद अब लखनऊ और इंदौर जैसे शहर 'डेटा सेंटर हब' के रूप में उभर रहे हैं. सीबीआरई (CBRE) के अंशुमन मैगजीन का मानना है कि इस छूट से वैश्विक निवेश (Global Capital Inflow) बढ़ेगा, जिससे इन शहरों में हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होगा.

शालीमार कॉर्प के डायरेक्टर खालिद मसूद का कहना है- 'बजट में टियर-2 और टियर-3 शहरों के विकास पर जो ध्यान दिया गया है, वह न केवल देश के बुनियादी ढांचे को नई मजबूती देगा, बल्कि रियल एस्टेट सेक्टर के लिए भविष्य में विकास के नए और बड़े रास्ते भी खोलेगा."

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क्या चुनौतियां?

हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. जहां एक तरफ बड़े निवेश और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स की धूम है, वहीं किफायती आवास (Affordable Housing) की मांग में गिरावट जारी है. एनारॉक के डेटा बताते हैं कि 2019 में सस्ते घरों की जो हिस्सेदारी 38% थी, वह अब घटकर 18% रह गई है. लखनऊ और इंदौर जैसे शहरों में भी मध्यम वर्ग के लिए घर खरीदना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है क्योंकि जमीन की कीमतें बढ़ रही हैं.

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बजट 2026-27 ने यह साफ कर दिया है कि भारत का शहरीकरण अब टियर-II शहरों के कंधों पर है.  यदि सरकार सस्ते घरों के लिए भी 'इंटरेस्ट सबवेंशन' (ब्याज में छूट) जैसी योजनाएं लाती, तो इन छोटे शहरों का विकास और भी अधिक समावेशीहो सकता था. फिर भी, बड़े प्रोजेक्ट्स और बेहतर कनेक्टिविटी के दम पर इन शहरों की 'सूरत' बदलना अब तय है.

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