अपना एक घर होना हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है, इसके लिए लोग अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी लगा देते हैं, बैंकों से भारी-भरकम लोन लेते हैं और करोड़ों रुपये का निवेश करते हैं. लेकिन अक्सर देखा जाता है कि लोकेशन, एमिनिटीज और बजट पर हफ्तों रिसर्च करने वाले लोग, सबसे ज्यादा लापरवाही प्रॉपर्टी के कानूनी दस्तावेजों के मामले में बरतते हैं.
आजतक रेडियो के शो प्रॉपर्टी से फायदा में प्रॉपर्टी लॉ एक्सपर्ट धीरज गुप्ता ने होम बायर्स के अधिकारों, बिल्डर-बायर एग्रीमेंट की पेचीदगियों और रजिस्ट्री से जुड़े मिथकों पर विस्तार से चर्चा की. इस बातचीत से यह साफ निकलकर आया कि कई बार घर खरीदना सिर्फ बजट का नहीं, बल्कि एक बेहद संवेदनशील कानूनी फैसला होता है.
धीरज गुप्ता बताते हैं- ' बिल्डर-बायर एग्रीमेंट दरअसल एक तरह का 'एग्रीमेंट टू सेल' ही होता है, जो यह तय करता है कि प्रॉपर्टी कितने समय में बनकर तैयार होगी और उसे किस कीमत पर बेचा जाएगा. आमतौर पर यह दस्तावेज 20 से 30 पन्नों का होता है, लेकिन बड़े डेवलपर्स के मामलों में यह 1,000 पन्नों तक भी जा सकता है. इन दस्तावेजों में कानून की इतनी बारीक और पेचीदा भाषा इस्तेमाल होती है कि एक आम आदमी के लिए चाहकर भी इसे पूरी तरह समझना मुश्किल होता है.'
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क्लॉज को न करें नजरअंदाज
आम खरीदार अक्सर केवल अपनी EMI की रकम, उसकी तारीख और पजेशन मिलने के समय को देखता है, जबकि उसके पीछे छिपे अन्य क्लॉज को नजरअंदाज कर देता है. उदाहरण के लिए, कई बार एग्रीमेंट में लिखा होता है कि कंस्ट्रक्शन बुकिंग से 4 साल बाद शुरू होगी और पजेशन 9 साल बाद मिलेगा, जिसे खरीदार ठीक से समझ नहीं पाते और मीठी बातों में फंस जाते हैं. हालांकि, आज के समय में रियल स्टेट एक्ट (RERA) के कारण ये क्लॉज पूरी तरह बिल्डर की मर्जी से नहीं चलते और एग्रीमेंट को अथॉरिटी से वेरीफाई कराना अनिवार्य होता है.
डिले कंपनसेशन का बदलता गणित
धीरज के मुताबिक पहले के समय में अगर बिल्डर पजेशन में देरी करता था, तो वह मामूली हर्जाना देता था, जबकि बायर की पेमेंट लेट होने पर 18% से 24% तक भारी ब्याज वसूलता था. यह भेदभाव आज भी अदालतों में विवाद का एक बहुत बड़ा विषय है, लेकिन अब रेरा (RERA) के आने के बाद दोनों पक्षों के लिए ब्याज दरें समान तय की गई हैं. इसी तरह, डेवलपर्स अक्सर एग्रीमेंट में लिखे 'फोर्स मेजोर' (Force Majeure) क्लॉज का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करने की कोशिश करते हैं.
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फोर्स मेजोर का मतलब होता है ऐसी परिस्थितियां जो बिल्डर या बायर दोनों के नियंत्रण से बाहर हों, जैसे बाढ़, भूकंप या कोविड-19 महामारी. धीरज गुप्ता स्पष्ट करते हैं कि सीमेंट-सरिया के दाम बढ़ना या लेबर की कमी जैसी व्यावसायिक और कमर्शियल दिक्कतों को बिल्डर 'फोर्स मेजोर' बताकर पजेशन में देरी को सही नहीं ठहरा सकता. इसके लिए कानूनन केवल सरकारी नीतियों या प्राकृतिक आपदाओं को ही शामिल किया जा सकता है, और इसके लिए भी बिल्डर को खरीदारों को पहले से लिखित नोटिस देना होता है.
रजिस्ट्री बनाम पजेशन: मालिकाना हक से जुड़ा सबसे बड़ा मिथक
ज्यादातर घर खरीदारों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि "एक बार रजिस्ट्री हो गई, तो घर हमारा हो गया और सारे खतरे टल गए." कानून की नजर में रजिस्ट्री मालिकाना हक का मुख्य दस्तावेज जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि रजिस्ट्री के बाद कोई कानूनी विवाद नहीं हो सकता. कई बार टाइटल साफ होने के बावजूद प्रॉपर्टी में अचानक मल्टीपल क्लेममेंट्स आ जाते हैं, जैसे यदि किसी प्रॉपर्टी के दो जॉइंट ओनर्स (संयुक्त मालिक) हैं और उनमें से केवल एक ने ही सहमति दी हो, तो दूसरा ओनर उस रजिस्ट्री को कोर्ट में चैलेंज कर सकता है.
इसके अलावा, अगर कोई कमर्शियल प्रॉपर्टी आपको रेजिडेंशियल बोलकर बेच दी गई है, तो रजिस्ट्री होने के बावजूद वह दस्तावेज कानूनन अमान्य हो जाता है. कानून में पजेशन को 90% मालिकाना हक के बराबर माना जाता है, इसलिए सेल डीड के साथ-साथ प्रॉपर्टी का वास्तविक कब्जा लेना बेहद जरूरी है, अन्यथा टाइटल होने के बाद भी कब्जा वापस पाने के लिए आपको लंबे समय तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़ सकते हैं.
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सेल डीड, म्यूटेशन और किराये की प्रॉपर्टी के जरूरी नियम
धीरज का कहना है कि 'प्रॉपर्टी के मामले में सेल डीड, पजेशन और म्यूटेशन के अंतर को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि लोग अक्सर म्यूटेशन को ही मालिकाना हक का सबूत मान लेते हैं. म्यूटेशन दरअसल मालिकाना हक का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में टैक्स वसूलने के उद्देश्य से आपका नाम दर्ज करने की प्रक्रिया है. असली मालिकाना हक केवल सेल डीड या रजिस्टर्ड कन्वेंस डीड से ही मिलता है. वहीं अगर किराये की प्रॉपर्टी की बात करें, तो इसके नियम भी काफी सख्त हैं.
अगर रेंट एग्रीमेंट रजिस्टर्ड है और 12 महीने से ऊपर का है, तो किरायेदार के अधिकार कानूनन ज्यादा सुरक्षित हो जाते हैं. इसके विपरीत, यदि एग्रीमेंट अनरजिस्टर्ड है, तो मकान मालिक के पास यह कानूनी अधिकार होता है कि वह महज 15 से 30 दिनों का नोटिस देकर किरायेदार को प्रॉपर्टी से बेदखल कर सके. इसलिए जॉइंट ओनरशिप वाली प्रॉपर्टी को किराये पर देते समय भी दोनों मालिकों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने होम बायर्स के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक बेहद अहम फैसला दिया है, जिसके अनुसार ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) के बिना किसी भी बायर को फ्लैट का पजेशन लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट का सीधा मतलब यह होता है कि स्थानीय सरकारी अथॉरिटी ने बिल्डिंग का पूरी तरह से मुआयना कर लिया है और वह ढांचागत रूप से सुरक्षित और रहने योग्य है. इसके बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि नोएडा और देश के कई अन्य हिस्सों में बिल्डर्स बिना ओसी के ही सोसायटियों में पजेशन दे रहे हैं और लोग मजबूरी में वहां रह रहे हैं.
गुड़गांव के प्रसिद्ध 'चिंटल्स' मामले का उदाहरण देते हुए एडवोकेट धीरज गुप्ता ने बताया कि वहां ओसी न होने और स्ट्रक्चर कमजोर होने के कारण खरीदारों को अपने घर खाली करने पड़े और वे आज भी मुआवजे के लिए संघर्ष कर रहे हैं. खरीदारों का यह कानूनी अधिकार है कि वे पजेशन की मांग आने पर बिल्डर से ओसी की प्रति मांगें, जिसे अब रेरा (RERA) की वेबसाइट पर भी ऑनलाइन चेक किया जा सकता है.