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SC ने बदली 48 साल पहले तय 'इंडस्ट्री' की परिभाषा, नए श्रम विवाद में लागू होगा 2020 का कानून

सुप्रीम कोर्ट ने श्रम कानून से जुड़े एक अहम मामले में 6:3 के बहुमत से 1978 के ‘इंडस्ट्री’ फैसले की भूमिका स्पष्ट कर दी है. अदालत ने कहा कि 1947 के पुराने कानून के तहत लंबित मामलों में 1978 का ‘ट्रिपल टेस्ट’ लागू रहेगा. लेकिन इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 के तहत आने वाले नए मामलों में इस पुराने फैसले को व्यापक आधार नहीं बनाया जाएगा. नए मामलों का फैसला नए कानून और उनकी परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने श्रम कानून से जुड़े एक अहम मामले में 6:3 के बहुमत से 1978 के ‘इंडस्ट्री’ फैसले की भूमिका स्पष्ट की. (File Photo: PTI)
सुप्रीम कोर्ट ने श्रम कानून से जुड़े एक अहम मामले में 6:3 के बहुमत से 1978 के ‘इंडस्ट्री’ फैसले की भूमिका स्पष्ट की. (File Photo: PTI)

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को श्रम कानून से जुड़े एक अहम मामले में 6:3 के बहुमत से फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ किया कि 1978 में 'इंडस्ट्री' यानी औद्योगिक गतिविधि की जो व्यापक परिभाषा तय की गई थी, उसे अब इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 की व्याख्या का मुख्य आधार नहीं माना जाएगा.

सरल भाषा में समझें तो पुराने श्रम विवादों और नए मामलों के लिए अब अलग-अलग स्थिति होगी. 1947 के पुराने कानून के तहत पहले से चल रहे मामलों में 1978 में तय 'ट्रिपल टेस्ट' लागू रहेगा. वहीं, 2020 के नए कानून के तहत आने वाले मामलों का फैसला उस कानून और मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा.

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद 21 फरवरी 1978 के बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड केस से जुड़ा है. उस समय सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 'इंडस्ट्री' की परिभाषा को काफी व्यापक कर दिया था. इस फैसले के बाद सिर्फ पारंपरिक कारखाने या बिजनेस ही नहीं, बल्कि अस्पताल, शिक्षण संस्थान, क्लब और कुछ सरकारी वेलफेयर विभाग जैसी गतिविधियां भी 'इंडस्ट्री' की श्रेणी में आ सकती थीं. इसका सीधा असर वहां काम करने वाले कर्मचारियों के श्रम अधिकारों पर पड़ा.

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1978 का 'ट्रिपल टेस्ट' क्या है?

सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 1978 के फैसले में यह देखने के लिए तीन आधार तय किए गए थे कि कोई गतिविधि 'इंडस्ट्री' है या नहीं. अगर किसी जगह: नियोक्ता और कर्मचारी मिलकर संगठित तरीके से काम कर रहे हैं, उस काम का मकसद वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण है, और काम एक व्यवस्थित आर्थिक गतिविधि के तौर पर चल रहा है, तो उसे 'इंडस्ट्री' माना जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 1947 के पुराने कानून के तहत लंबित मामलों में यही टेस्ट लागू रहेगा.

नए मामलों में क्या होगा?

यहीं इस फैसले का सबसे अहम हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1978 का फैसला इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 की व्याख्या के लिए कोई व्यापक आधार नहीं होगा. यानी 2020 के नए कानून के तहत अगर कोई नया श्रम विवाद सामने आता है, तो अदालत सिर्फ 1978 के फैसले को देखकर यह तय नहीं करेगी कि कोई संस्था 'इंडस्ट्री' है या नहीं. मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और नए कानून के प्रावधानों को देखकर फैसला किया जाएगा.

1947 के मामलों और नए मामलों में अंतर

इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए किसी कर्मचारी का श्रम विवाद 1947 के इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत पहले से अदालत में चल रहा है. ऐसे मामले में 1978 का ट्रिपल टेस्ट लागू होगा. लेकिन अगर कोई नया विवाद इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 के तहत सामने आता है, तो उसका फैसला नए कानून के हिसाब से होगा. 1978 का फैसला उस मामले पर अपने आप लागू नहीं हो जाएगा.

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9 जजों की संविधान बेंच ने सुनाया फैसला

इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान बेंच ने की, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने की. बहुमत ने माना कि 1978 के फैसले में तय 'इंडस्ट्री' की व्यापक परिभाषा पर दोबारा विचार करने के लिए मामला संविधान बेंच के पास भेजना वैध था. हालांकि, सभी जज इस बात पर सहमत थे कि 1947 का इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट अब खत्म हो चुका है और उसकी जगह नया कानून आ चुका है.

3 जजों ने अपनाया अन्य 6 से अलग रुख

यह फैसला 6:3 के बहुमत से आया. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, आलोक अराधे और विपुल एम. पंचोली ने बहुमत वाला फैसला लिखा. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जॉयमाल्या बागची ने भी रेफरेंस को वैध माना और अलग फैसले लिखे. वहीं, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, दीपांकर दत्ता और उज्जल भुइयां ने मामले को दोबारा विचार के लिए भेजे जाने की वैधता पर असहमति जताई. जस्टिस नागरत्ना का कहना था कि 1978 का फैसला सही था और उसे दोबारा देखने की जरूरत नहीं थी.

कर्मचारियों और एम्प्लॉयर्स के लिए मायने?

अगर आप किसी पुराने श्रम विवाद से जुड़े हैं, तो यह फैसला महत्वपूर्ण है. ऐसे मामलों में 1978 का ट्रिपल टेस्ट लागू रहेगा. लेकिन नए श्रम विवादों में स्थिति अलग होगी. वहां इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 के प्रावधान और मामले के वास्तविक तथ्य ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे. यानी सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के फैसले को पूरी तरह खत्म नहीं किया है. उसने यह साफ किया है कि उसका इस्तेमाल पुराने लंबित मामलों में होगा, लेकिन नए 2020 वाले मामलों की व्याख्या का एकमात्र या व्यापक आधार नहीं बनाया जा सकता. फैसले का विस्तृत असर अब आगे आने वाले श्रम विवादों में दिखाई देगा.

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