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पाक-अफगानिस्तान युद्ध से चीन क्यों बेचैन? भारत-US की क्या भूमिका, किसे होगा तगड़ा नुकसान

अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुला सैन्य संघर्ष बढ़ता है, तो उसका भारत पर भी असर दिखेगा. अफगानिस्तान में अस्थिरता बढ़ने से क्षेत्र में चरमपंथी गतिविधियों का जोखिम बढ़ सकता है.

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पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध से दांव पर क्या-क्या? (Photo: ITG)
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध से दांव पर क्या-क्या? (Photo: ITG)

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव धीरे-धीरे युद्ध में बदलता जा रहा है. दोनों देश एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं, वैसे भी किसी भी मुद्दे का हल युद्ध से नहीं निकल सकता है, युद्ध से जन हानि के अलावा आर्थिक तौर पर भारी नुकसान उठाना पड़ता है. 

खासकर ऐसे देशों को युद्ध में जाने से परहेज करना चाहिए. जिनकी आर्थिक सेहत पहले से ही खराब है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर हैं. इस तनाव के पीछे गहरे आर्थिक हित भी जुड़े हैं. दोनों देशों की अर्थव्यवस्था भले ही अलग स्तर पर हो, लेकिन भौगोलिक स्थिति उन्हें एक-दूसरे पर निर्भर बनाती है.

दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं. पाकिस्तान कर्ज में डूबा है, और महंगाई चरम पर है. जबकि अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सीमित मान्यता के कारण निवेश की कमी का सामना कर रहा है. इस बीच सीमा तनाव से व्यापार, रोजगार और राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

पाकिस्तान के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
पाकिस्तान के लिए अफगानिस्तान मध्य एशिया तक पहुंचने का प्रवेश द्वार है. कराची और ग्वादर जैसे बंदरगाहों के माध्यम से अफगानिस्तान को समुद्री व्यापार की सुविधा मिलती है. खासकर कराची पोर्ट अफगान ट्रांजिट व्यापार का मुख्य मार्ग रहा है. इससे पाकिस्तान को ट्रांजिट फीस, कस्टम ड्यूटी और लॉजिस्टिक्स से राजस्व मिलता है. 

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हालांकि, पाकिस्तान को सीमा पार तस्करी और अनौपचारिक व्यापार से नुकसान भी होता है. जब सीमा बंद होती है, तो खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक गतिविधि प्रभावित होती है. इसके अलावा सुरक्षा हालात बिगड़ने पर रक्षा खर्च बढ़ता है, जिससे पहले से दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है.

अफगानिस्तान के लिए भी आर्थिक संकट
भौगोलिक नजरिये से अफगानिस्तान एक लैंडलॉक देश है, और समुद्री रास्ते के लिए उसे पाकिस्तान के बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है. सीमा बंद होने या राजनीतिक तनाव की स्थिति में उसके आयात-निर्यात पर सीधा असर पड़ता है, जिससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.

अफगानिस्तान में तांबा, लिथियम और अन्य खनिज संसाधनों की बड़ी संभावनाएं हैं. स्थिर क्षेत्रीय माहौल होने पर विदेशी निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं बढ़ सकती हैं. उदाहरण के तौर पर TAPI गैस पाइपलाइन जैसी परियोजना से ऊर्जा आपूर्ति और ट्रांजिट आय दोनों देशों को मिल सकती है. लेकिन अस्थिरता इन योजनाओं को धीमा कर देती है.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध का भारत पर क्या असर?
अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुला सैन्य संघर्ष बढ़ता है, तो उसका भारत पर भी असर दिखेगा. अफगानिस्तान में अस्थिरता बढ़ने से क्षेत्र में चरमपंथी गतिविधियों का जोखिम बढ़ सकता है. भारत को अपनी पश्चिमी सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा पर अधिक सतर्क रहना पड़ेगा. इससे रक्षा तैयारी और खुफिया निगरानी पर खर्च बढ़ सकता है. 

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यही नहीं, भारत का अफगानिस्तान से सीमित लेकिन रणनीतिक व्यापार रहा है, जिसमें चाबहार मार्ग की अहम भूमिका है. अगर क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो मध्य एशिया तक भारत की कनेक्टिविटी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं. जैसे कि TAPI Gas Pipeline और International North-South Transport Corridor की गति धीमी पड़ सकती है.

इस युद्ध का असर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों पर पड़ सकता है. भारत, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर है, उसे आयात बिल में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है. भारत ने मोटा पैसा अफगानिस्तान के तमाम विकास परियोजनाओं में निवेश किया है. संघर्ष की स्थिति में भारत को मानवीय सहायता और कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. अगर पाकिस्तान अपनी पश्चिमी सीमा में उलझा रहता है, तो भारत के लिए सुरक्षा दृष्टि से कुछ रणनीतिक राहत हो सकती है. पाकिस्तान का ध्यान दो मोर्चों पर बंट सकता है. क्षेत्रीय मंचों पर भारत की कूटनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है. 

अफगानिस्तान अस्थिर होने पर ईरान वैकल्पिक व्यापार मार्ग (जैसे चाबहार बंदरगाह) को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकता है. अगर अफगान ट्रांजिट पाकिस्तान से प्रभावित होता है, तो ईरान को लॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में अवसर मिल सकते हैं. 

चीन के लिए कितना बड़ा नुकसान?

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हालांकि इन दोनों देशों में युद्ध से चीन का सबसे ज्यादा स्टेक दांव पर लगा है. इसलिए चीन हर हाल में स्थिरता चाहता है, क्योंकि China-Pakistan Economic Corridor (CPEC) पाकिस्तान से होकर गुजरता है. हालांकि अगर पाकिस्तान आर्थिक तौर पर और कमजोर होता है, तो चीन का प्रभाव देश पर बढ़ सकता है. लेकिन युद्ध से CPEC को भी जोखिम होगा, इसलिए चीन के लिए यह अवसर और खतरा दोनों है. 

अमेरिका सीधे तौर पर लाभ नहीं उठाता, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता में कूटनीतिक या रणनीतिक भूमिका बढ़ा सकता है. हथियारों की बिक्री या सुरक्षा सहयोग जैसे पहलुओं में अवसर बन सकते हैं.

अफगानिस्तान की आर्थिक ताकत...
अफगानिस्तान को खनिज संपदा से समृद्ध माना जाता है. यहां तांबा (Copper), लोहा (Iron ore), लिथियम (Lithium) और रेयर अर्थ का भंडार है. इन संसाधनों की संभावित कीमत हजारों अरब डॉलर तक आंकी गई है. देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है. गेहूं, अनार, अंगूर, बादाम और पिस्ता भी अफगानिस्तान की पहचान है. केसर (Saffron) उत्पादन में अफगानिस्तान की वैश्विक पहचान बढ़ी है. अगर जीडीपी की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक साल 2024–25 के दौरान अफगानिस्तान की नॉमिनल जीडीपी करीब 1.4 लाख करोड़ रुपये के आसपास थी. 

पाकिस्तान की आर्थिक ताकत...
जबकि पाकिस्तान की जीडीपी का आकार करीब 28 लाख करोड़ रुपये तक का है. टेक्सटाइल और परिधान निर्यात आय का एक अहम जरिया है. मध्य एशिया, चीन और अरब सागर के बीच स्थिति इसे ट्रांजिट और लॉजिस्टिक्स के लिए अहम बनाती है. खाड़ी देशों और पश्चिम से आने वाली रेमिटेंस अर्थव्यवस्था को सहारा देती है और चालू खाते के दबाव को कम करती है. वैसे पाकिस्तान में गेहूं, कपास, चावल और गन्ने का भी उत्पादन होता है, जिसका जीडीपी में अहम रोल है.

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