भारत अपने आयात-निर्यात पोर्टफोलियो में तेजी से बदलाव कर रहा है. भारत अब किसी देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता है, जिस कारण वह अब कई देशों से डील कर रहा है. खासकर चीन पर से निर्भरता खत्म करने के लिए भारत ने कई देशों के साथ डील की है. अब रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर भारत ने एक डील की है.
दरअसल, 26 मई 2026 को भारत और अमेरिका ने रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई को सुरक्षित करने के लिए एक समझौता किया और उसी दिन भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया (क्वाड देशों) ने खनन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग में 20 अरब डॉलर तक निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा. भारत और क्वाड देशों के इस प्रयास से चीन पर रेयर अर्थ को लेकर निर्भरता खत्म हो सकती है.
डील को लेकर क्या बोले एस जयशंकर?
इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 26 मई को हस्ताक्षर के दौरान कहा कि इस डील का उद्देश्य खनन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग संबंधित निवेश समेत महत्वपूर्ण खनिज और रेयर अर्थ सप्लाई चेन में सहयोग को गहरा करना है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस मुद्दे की गंभीरता को स्पष्ट करते हुए कहा कि हम अपने उद्योगों में यूज होने वाले इन चीजों को चीन के हाथों नहीं सौंप सकते, जो संकट के समय हमारे लिया समस्या खड़ी करता है.
क्या है रेयर अर्थ मिनरल्स?
क्रिटिकल मिनरल्स में मुख्य तौर पर लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स शामिल होते हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक कारों की बैटरियों, सेमीकंडक्टर चीप्स, मिसाइल और डिफेंस सिस्टम, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्टस बनाने में यूज किया जाता है.
चीन क्यों है पूरी दुनिया के लिए टेंशन?
सच ये है कि चीन कुल रेयर अर्थ का 80 फीसदी हिस्सा रिफाइन करता है और उसकी प्रोसेसिंग करता है. जबकि वह इससे भी ज्यादा कंट्रोल करता है. किस देश को कितना रेयर अर्थ मिनरल्स सप्लाई किया जाएगा, यह चीन तय करता है. करीब 94 फीसदी रेयर अर्थ मिनरल्स का एक्सपोर्ट पर कंट्रोल चीन का ही है.
ऐसे में जब भी चीन को अपनी बात मनवानी होती है या फिर कोई देश चीन से ट्रेड डेफिसिट कम करने के लिए व्यापार पर टैरिफ लगाता है या व्यापार पर रोक लगाता है तो वह उस देश के लिए रेयर अर्थ की सप्लाई रोक देता है. यही कारण है कि रेयर अर्थ को लेकर चीन पूरी दुनिया के लिए टेंशन बना हुआ है.
रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर भारत ने अबतक क्या किया है?
भारत के सामने क्या होगी चुनौती?
भारत के पास रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर भंडार तो है, लेकिन प्रोसेसिंग करने के लिए क्षमता की कमी है. भारत की रेयर अर्थ रिफाइनिंग क्षमता घरेलू मांग के 25% से भी कम है. बड़े पैमाने पर मैग्नेट निर्माण की क्षमता डेवलप नहीं हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि खदान खोलने की तुलना में प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करना ज्यादा कठिन और समय लेने वाला काम है. भारत के पास लगभग 70 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड भंडार हैं, जो दुनिया में पांचवें सबसे बड़े भंडारों में शामिल हैं.