बजट सिर्फ इस बात से अपनी प्राथमिकताएं नहीं दिखाते कि उनमें किसे पैसा मिला, बल्कि इससे भी कि किसे बार-बार नजरअंदाज किया गया. इस बार के केंद्रीय बजट में कैंसर इलाज, बायोफार्मा इनोवेशन, आयुष विस्तार और मेंटल हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काफी चर्चा हुई. ये सभी जरूरी विषय हैं और इन पर ध्यान देना अच्छी बात है.
लेकिन इसी शोर-शराबे के बीच एक बेहद अहम अंग लगभग गायब रहा. ऐसा अंग जिसे भारतीय सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं, सबसे ज्यादा उसी पर निर्भर रहते हैं और सबसे लंबे समय तक नजरअंदाज भी करते हैं. फेफड़े. बजट में फेफड़ों की सेहत पर न के बराबर बात हुई. एक शब्द तक नहीं.
फेफड़ों की बीमारी पर गंभीरता की कमी
यह चूक कोई गलती नहीं है. यह उस असहजता को दिखाती है जो रोजमर्रा की, धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारियों को लेकर नीति निर्माताओं में दिखती है. फेफड़ों की बीमारियां न तो बड़ी घोषणाओं के लायक मानी जाती हैं और न ही सुर्खियां बनाती हैं. कैंसर की तरह इन्हें तुरंत जानलेवा संकट के रूप में नहीं देखा जाता और न ही आयुष की तरह इन्हें ‘वेलनेस’ की भाषा में पेश किया जा सकता है.
जबकि हकीकत यह है कि फेफड़ों की बीमारियां चुपचाप देश की कार्यशक्ति को कमजोर कर रही हैं, परिवारों को आर्थिक बोझ में डाल रही हैं और अस्पतालों पर दबाव बढ़ा रही हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक अगर बजट में फेफड़ों की सेहत को गंभीरता से लिया जाता, तो इसमें ये बातें शामिल होतीं:
-एक नेशनल लंग हेल्थ मिशन, जिसके साफ लक्ष्य तय हों.
-प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सभी के लिए सांस की जांच की सुविधा.
-फेफड़ों की पुनर्वास सेवाओं का विस्तार.
-घर पर ऑक्सीजन थेरेपी और देखभाल को सस्ता बनाना.
-रेस्पिरेटरी थैरेपिस्ट को प्रशिक्षित कर उनकी तैनाती.
-वायु प्रदूषण से निपटने की योजना को स्वास्थ्य नीति से जोड़ना.
वह बोझ जिसे सब जानते हैं, पर बजट नहीं मानता
भारत में फेफड़ों की पुरानी बीमारियों के मरीजों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है. दमा, सीओपीडी, इंटरस्टिशियल लंग डिजीज, टीबी के बाद खराब हुए फेफड़े और कोविड के बाद लंबे समय तक चलने वाली सांस की समस्याएं. ये सब मिलकर करोड़ों लोगों को प्रभावित कर रही हैं. इसके ऊपर से शहरों, उद्योगों और घरों के भीतर का प्रदूषण. ऐसे में फेफड़े भारत का सबसे कमजोर अंग बन चुके हैं.
फिर सवाल उठता है. क्या हमारे पास कोई नेशनल लंग हेल्थ मिशन है? नहीं. क्या प्राथमिक स्तर पर सांस की जांच के लिए कोई बड़ा बजट है? नहीं. क्या ऑक्सीजन थेरेपी, फेफड़ों के पुनर्वास या घर पर देखभाल की कोई ठोस योजना है? साफ जवाब है, नहीं.
फेफड़ों की सेहत अलग-अलग विभागों में बंटी हुई है. कहीं पर्यावरण नीति में, कहीं टीबी कार्यक्रम में, कहीं आपात इलाज में. लेकिन इसकी कोई स्पष्ट जिम्मेदारी नहीं है. न कोई तात्कालिकता और न ही राजनीतिक दबाव.
कैंसर को जगह, फेफड़ों को नहीं
कैंसर को इसलिए प्राथमिकता मिलती है क्योंकि वह तुरंत डर पैदा करता है. वह भावनात्मक है और जल्दी जानलेवा माना जाता है. फेफड़ों की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है. मरीज घर में चुपचाप हांफते रहते हैं, इनहेलर बचा-बचाकर इस्तेमाल करते हैं और सांस फूलने को उम्र या कमजोरी मान लेते हैं. यही आदत जानलेवा है.
फेफड़ों की बीमारी को अक्सर नैतिक नजर से देखा जाता है. धूम्रपान किया होगा, प्रदूषण में रहे होंगे, काम की वजह से हुआ होगा. जैसे मरीज खुद ही दोषी हो. इसी सोच की वजह से नीति स्तर पर उदासीनता दिखती है, जिसे मजबूरी का नाम दे दिया जाता है.