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पलायन से वापसी की कहानी: पटना के स्टार्टअप में 30 प्रवासी श्रमिकों को मिला रोजगार

पटना के बैरिया स्थित जावा स्पोर्ट्स स्टार्टअप ने बिहार में रिवर्स माइग्रेशन की नई मिसाल पेश की है. खेल सामग्री बनाने वाली इस फैक्ट्री में 35 कर्मचारियों में से लगभग 30 ऐसे हैं जो पहले पंजाब और अन्य राज्यों में काम करते थे. लॉकडाउन के बाद उन्हें बिहार में ही रोजगार मिला. संस्थापक निशांत रंजन का कहना है कि स्थानीय उद्योग प्रवासी श्रमिकों को घर के पास काम देने और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

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यहां क्रिकेट बैट, गेंद, हेलमेट, ग्लव्स और स्पोर्ट्स शूज बनते हैं. Photo ITG
यहां क्रिकेट बैट, गेंद, हेलमेट, ग्लव्स और स्पोर्ट्स शूज बनते हैं. Photo ITG

वर्षों से बिहार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पलायन रहा है. रोजगार की तलाश में हर दिन बड़ी संख्या में लोग पंजाब, दिल्ली और देश के अन्य राज्यों की ओर रुख करते हैं. हालांकि, अब पटना से एक ऐसी सकारात्मक कहानी सामने आई है, जो रिवर्स माइग्रेशन यानी प्रवासी मजदूरों की घर वापसी और स्थानीय रोजगार की नई मिसाल बन रही है.

पटना के बैरिया क्षेत्र में करीब पांच वर्ष पहले उद्यमी निशांत रंजन ने स्पोर्ट्स सामान निर्माण से जुड़ा स्टार्टअप 'जावा स्पोर्ट्स' शुरू किया. यह बिहार की शुरुआती फैक्ट्रियों में शामिल है, जहां क्रिकेट बैट, गेंद, हेलमेट, ग्लव्स और स्पोर्ट्स शूज जैसे खेल उपकरणों का निर्माण किया जाता है.

इस स्टार्टअप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां काम करने वाले अधिकांश कर्मचारी पहले पंजाब और अन्य राज्यों की खेल सामग्री निर्माण इकाइयों में काम करते थे. कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन में बिहार लौटे इन श्रमिकों को जावा स्पोर्ट्स में रोजगार मिला और उन्हें दोबारा पलायन नहीं करना पड़ा.

लॉकडाउन के बाद नहीं लौटे
मुजफ्फरपुर निवासी अजीत कुमार इसका प्रमुख उदाहरण हैं. वह पंजाब की एक स्पोर्ट्स कंपनी में 22 वर्षों तक काम कर चुके हैं. लॉकडाउन के दौरान बिहार लौटने के बाद उन्हें पटना स्थित इस फैक्ट्री में नौकरी मिली. अजीत कुमार का कहना है कि परिवार के साथ रहकर काम करने की खुशी सबसे बड़ी है. उनके अनुसार, लोग मजबूरी में पलायन करते हैं और उन्हें सौभाग्य मिला कि अपने राज्य में ही रोजगार मिल गया.

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इसी तरह जय किशोर लगभग 10 वर्षों तक जालंधर में काम करने के बाद बिहार लौटे. उन्हें भी इसी फैक्ट्री में रोजगार मिला. उनका मानना है कि यदि बिहार में ऐसे और उद्योग स्थापित हों तो बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक वापस लौट सकते हैं.

30 कर्मचारी वापस नहीं गए
वर्तमान में फैक्ट्री में करीब 35 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें से लगभग 30 ऐसे हैं जो पहले पंजाब और अन्य राज्यों में काम करते थे. ये कर्मचारी मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर, वैशाली और गया जिलों से आते हैं.

स्टार्टअप के संस्थापक निशांत रंजन ने बताया कि खेल हमेशा से उनका जुनून रहा है. उन्होंने इस उद्यम को शुरू करने से पहले जालंधर और मेरठ का दौरा कर वहां के कारीगरों और श्रमिकों से बातचीत की थी. वर्ष 2022 में उन्होंने इस परियोजना को पूरी तरह शुरू किया.

निशांत रंजन का कहना है कि उन्होंने पंजाब में प्रवासी मजदूरों के संघर्ष को करीब से देखा है. उनका मानना है कि परिवार के साथ रहकर काम करना और त्योहारों को अपने लोगों के बीच मनाना किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी खुशी होती है. आज यही श्रमिक पटना में विश्वस्तरीय खेल सामग्री तैयार कर रहे हैं.

ऐसे समय में जब बिहार में पलायन अब भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, जावा स्पोर्ट्स ने रिवर्स माइग्रेशन का एक सफल मॉडल प्रस्तुत किया है. यह पहल दिखाती है कि स्थानीय उद्योगों के विकास से न केवल रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं, बल्कि कुशल श्रमिकों को अपने राज्य में वापस लाकर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाया जा सकता है.

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