बिहार में होने वाले विधान परिषद (MLC) चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) पर खुले तौर पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. पार्टी ने आगामी MLC चुनाव में हिस्सेदारी की मांग करते हुए RJD को इस साल की शुरुआत में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान दिए गए समर्थन की याद दिलाई है.
AIMIM का दावा है कि उसने उस समय महागठबंधन उम्मीदवार का साथ दिया था और बदले में भविष्य में राजनीतिक एडजस्टमेंट की आशा की थी. अब जब विधान परिषद चुनाव नजदीक हैं, तो पार्टी चाहती है कि उस राजनीतिक समझदारी को जमीन पर उतारा जाए. AIMIM का मानना है कि राज्यसभा चुनाव में उसका समर्थन निर्णायक रहा था.
सीट बंटवारे के समय उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. बिहार AIMIM के अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने भी संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहती है. उनका कहना है कि जब विपक्षी गठबंधन को जरूरत थी, तब AIMIM उसके साथ खड़ी थी. ऐसे में परिषद चुनाव के दौरान पार्टी की दावेदारी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
AIMIM का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब विपक्षी गठबंधन के खाते में केवल एक MLC सीट आने की संभावना जताई जा रही है. यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ सीट बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है. एक तरफ गठबंधन सहयोगियों को संतुष्ट करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ RJD के भीतर भी कई नेता इस सीट पर दावा ठोक रहे हैं.
ऐसे में तेजस्वी यादव के सामने राजनीतिक संतुलन बनाने की बड़ी परीक्षा खड़ी हो गई है. दरअसल AIMIM बिहार में अपनी राजनीतिक पहचान को सिर्फ 'वोट काटने वाली पार्टी' तक सीमित नहीं रखना चाहती. पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह विपक्षी राजनीति में एक गंभीर और प्रभावशाली खिलाड़ी है.
खासकर सीमांचल क्षेत्र में पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हुई है. इस इलाके में उसने विधानसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी. साल 2025 के चुनाव में भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था. हालांकि, बाद में AIMIM के कई विधायक RJD में शामिल हो गए, लेकिन पार्टी अब भी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रही है.
MLC सीट की मांग के जरिए AIMIM यह भी संदेश देना चाहती है कि राज्य में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल RJD और कांग्रेस तक सीमित नहीं होना चाहिए. उधर, एकमात्र संभावित MLC सीट को लेकर लालू प्रसाद यादव के परिवार के भीतर भी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है. पटना के राजनीतिक गलियारों में कई अटकलें लगाई जा रही हैं.
इस तरह की चर्चा है कि इस सीट के लिए रोहिणी आचार्य, तेज प्रताप यादव और राजश्री यादव जैसे नामों पर विचार किया जा रहा है. हालांकि रोहिणी आचार्य ने सार्वजनिक रूप से साफ कर दिया है कि फिलहाल उनकी चुनाव लड़ने में कोई रुचि नहीं है. इसके बावजूद राजनीतिक चर्चाएं थमी नहीं हैं. इसकी बड़ी वजह लालू प्रसाद यादव के सिंगापुर में होना है.
यहां रोहिणी आचार्य रहती हैं. ऐसे में यह चर्चा भी चल रही है कि लालू प्रसाद अपनी बेटी को एक बार फिर सक्रिय राजनीति में लाने की कोशिश कर सकते हैं. वहीं तेज प्रताप यादव का नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल बताया जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक वह चुनाव लड़ने में रुचि रखते हैं, लेकिन RJD की बजाय अपनी पार्टी से मैदान में उतरना चाहते हैं.
तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस पूरे समीकरण को किस तरह साधते हैं. यदि AIMIM की मांग मान लेते हैं, तो पार्टी के भीतर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं और अन्य सहयोगी दलों में नाराजगी बढ़ सकती है. दूसरी ओर यदि AIMIM को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाता है, तो सीमांचल क्षेत्र में वोट बंटवारे का खतरा बढ़ सकता है.
इसका असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है. सूत्रों का कहना है कि फिलहाल RJD नेतृत्व अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने के पक्ष में ज्यादा दिखाई दे रहा है. इसके साथ ही पार्टी यह संदेश भी नहीं देना चाहती कि वह किसी सहयोगी दल के दबाव में निर्णय ले रही है. इसलिए अंतिम फैसला बेहद सोच-समझकर लिया जाएगा.
इस बीच NDA भी विपक्षी खेमे में चल रही गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखे हुए है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सीट शेयरिंग को लेकर विपक्ष के भीतर किसी भी तरह की सार्वजनिक असहमति का फायदा सत्तारूढ़ गठबंधन को मिल सकता है. NDA पहले 10 MLC सीटों पर जीत का दावा कर चुका है. इनके लिए 18 जून को मतदान होना है.