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बिहार में बीजेपी को छोटा भाई से बड़ा भाई बनने में 30 साल लग गए... कैसे बदल गई सियासत?

बीजेपी और जेडीयू की दोस्ती तीस साल पुरानी है. बीजेपी भले ही राष्ट्रीय पार्टी हो, लेकिन बिहार में छोटे भाई के रोल में रही है, लेकिन अब गेम बदल गया है. बीजेपी अब छोटा भाई से बड़ा भाई बनने जा रही है और पहली बार बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाएगी.

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बिहार में बीजेपी और जेडीयू का रोल कैसे बदल गया (Photo-PTI)
बिहार में बीजेपी और जेडीयू का रोल कैसे बदल गया (Photo-PTI)

बिहार की सियासत में बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बनने के लिए लंबे इंतजार करना पड़ा है. जेडीयू की सियासी बैसाखी के सहारे बीजेपी बिहार में राजनीति करती रही है, लेकिन कभी भी अपना सीएम नहीं बन सकी. बीजेपी और जेडीयू में दोस्ती की इबारत 1996 में लिखी गई थी. इसके बाद से बिहार की राजनीति में बीजेपी हमेंशा से छोटे भाई की भूमिका में रही तो जेडीयू बड़े भाई के रोल में रही, लेकिन 30 साल बाद सियासत ने ऐसी करवट ली कि बिहार का सीन बदल गया है. 

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले से बिहार में सत्ता परिवर्तन तय माना जा रहा है. बीजेपी अब सत्ता की स्टैरिंग अपने हाथ में लेने जा रही है. बिहार में पहली बार बीजेपी का सीएम होगा और जेडीयू को डिप्टीसीएम की कुर्सी मिलेगी. इस तरह से बीजेपी छोटे भाई से अब बड़े भाई के रोल में होगी, लेकिन इसके लिए बीजेपी को तीन दशक तक इंतजार करना पड़ा है? 

बिहार में बीजेपी को आत्म निर्भर बनने के लिए लंबा समय लगा है. देश की सत्ता पर 11 साल से भले ही नरेंद्र मोदी काबिज हो और उत्तर भारत के तमाम राज्यों में बीजेपी सरकार हो, लेकिन बिहार में नीतीश की बैसाखी के सहारे ही चलती रही. बीजेपी अपने दम पर कभी भी सत्ता में नहीं बना सकी. नीतीश कुमार के दो बार पलटी मारने के बाद भी बीजेपी ने 2025 में उन्हें 10वीं बार सीएम की कुर्सी सौंप दी थी, लेकिन चार महीने के बाद अब सही मुहूर्त देखकर बड़े भाई के रोल में आने का फैसला किया है. 

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बिहार में बीजेपी और जेडीयू की दोस्ती
बिहार की सत्ता की धुरी नीतीश कुमार दो दशक से बने हुए हैं. नीतीश के के इर्द-गिर्द पूरी सियासत सिमटी हुई है. बीजेपी और जेडीयू में दोस्ती की इबारत 1996 में लिखी गई, जब नीतीश कुमार ने 1994 में जनता दल से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडिस से साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया. 1996 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की समता पार्टी ने पहली बार बीजेपी के साथ चुनावी गठबंधन किया. इसके बाद से लोकसभा के 2014 का चुनाव छोड़कर नीतीश ने सभी चुनाव बीजेपी के साथ लड़े. 

2000 में नीतीश कुमार ने शरद यादव से हाथ मिलाते हुए अपनी समता पार्टी को जनता दल युनाटेड में तब्दील कर दिया. 2000 से लेकर 2020 तक बिहार में जितने भी चुनाव हुए हैं, उसमें नीतीश कुमार के चेहरे को आगे कर लड़ा गया. इतना ही नहीं जेडीयू ने बीजेपी से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा है, लेकिन 2025 में मामला बराबरी पर आ गया है. 

नीतीश कुमार

2025 के चुनाव में बिहार की कुल 243 सीटों में से बीजेपी और जेडीयू 101-101 सीट पर चुनाव लड़ने पर सहमति बनी. चिराग पासवान की एलजेपी  (आर) 29 सीट पर तो उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की पार्टी 6-6 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए मिला. हालांकि, इससे भी पहले बीजेपी खुद को आत्म निर्भर बनाने के लिए 2024 के चुनाव में जेडीयू से एक सीट ज्यादा पर लड़ी थी. 

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जेडीयू से छिना 'बड़े भाई' का रोल 
बिहार विधानसभा चुनाव में सीट शेयरिंग से ही जेडीयू से बड़े भाई का रोल छिन गया था. बीजेपी और जेडीयू ने 101-101 विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ी थी और नतीजे भी आए तो बीजेपी का पलड़ा भारी रहा. बीजेपी 101 में से 89 सीटें जीतने में कामयाब रही तो जेडीयू 101 में 85 सीट जीती. 

बिहार में अभी तक बीजेपी से ज्यादा सीट पर जेडीयू चुनाव लड़कर एनडीए में बड़े भाई का कद अपने पास बनाए रखा. इस बार दोनों दलों के बीच बराबर-बराबर सीट पर चुनाव लड़ी, लेकिन नतीजे में बीजेपी का पलड़ा भारी रहा. 2005 में आरजेडी के नेतृत्व वाली सरकार के 15 साल के शासन को समाप्त करने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव था, जिसमें सीएम नीतीश कुमार की जेडीयू को एनडीए में बीजेपी सीट मिली थी. 

बीजेपी कैसे बनी छोटे भाई से बड़ा भाई
बिहार में एनडीए गठबंधन में 30 साल बाद जेडीयू और बीजेपी का सीन बदल गया है. हालांकि, इसका आगाज 2024 के चुनाव में हो गया था, जब जेडीयू से एक सीट ज्यादा पर बीजेपी चुनाव लड़ी थी. अब विधानसभा चुनाव में दोनों दल बराबर-बराबर यानि 101-101 सीट पर चुनाव लड़ने की सहमति बनाई है. इसका जवाब 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में छिपा है, जहां बीजेपी की तुलना में जेडीयू पिछड़ गई थी. 

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2020 में जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़कर 43 सीट पर जीत दर्ज की थी, जबकि बीजेपी 110 सीट पर लड़कर 74 सीटें जीती थी. इस तरह जेडीयू से ज्यादा सीटें बीजेपी जीतने में सफल रही. हालांकि, उस समय की जेडीयू की हार का ठीकरा चिराग पासवान की बगावत पर फोड़ा गया था. 2025 में बिहार चुनाव में जेडीयू और बीजेपी बराबर सीट पर चुनाव लड़ी, लेकिन बीजेपी का पलड़ा भारी रहा. इस तरह बीजेपी की भूमिका बड़े भाई की हो गई. 

बीजेपी ने कैसे पलटा बिहार में सियासी गेम
बिहार में चार महीने पहले ही नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को प्रचंड जीत विधानसभा चुनाव में मिली थी. कहा जा रहा है कि बिहार में सियासी सरगर्मी के बीच वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त ही सबकुछ तय हो चुका था, लेकिन चुनाव में नीतीश कुमार के नाम पर ही एनडीए को बड़ी सफलता मिली थी, इसलिए उन्हें 10वीं बार सीएम के रूप में शपथ दिलाई गई थी और बीजेपी से सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा उपमुख्यमंत्री बनाए गए थे. 

बिहार में एनडीए सरकार के अभी छह महीने भी पूरे नहीं हुए कि नीतीश कुमार ने दिल्ली जाने का फैसला कर लिया.नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन कर दिया है. ऐसे में 16 मार्च तक नीतीश कुमार सीएम पद छोड़ देंगे. ऐसे में अब बिहार में बीजेपी और जेडीयू की भूमिका पूरी तरह से बदल जाएगी. 

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अभी मौजूदा बिहार की एनडीए सरकार में सत्ता की कमान जेडीयू के पास है, नीतीश कुमार सीएम हैं और बीजेपी कोटे से दो उपमुख्यमंत्री हैं. नीतीश कुमार अगर दिल्ली जाते हैं तो फिर समझ लीजिए कि सत्ता का हस्तांतरण तय है. बिहार में सीएम की कुर्सी जेडीयू के बजाय बीजेपी के किसी नेता के हाथ में होगी और जेडीयू कोटे से एक उपमुख्यमंत्री होगा. 

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका स्थिर वोट बैंक है.भाजपा का कोर वोट लगातार बना रहा, जबकि जेडीयू का वोट शेयर कई बार गठबंधन बदलने और एंटी-इंकंबेंसी के कारण प्रभावित हुआ. 2014 के बाद से भाजपा ने बिहार के ग्रामीण इलाकों और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में अपनी पकड़ मजबूत की. 

बिहार की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी दिख रही है. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि भविष्य में एनडीए की अगुवाई बीजेपी के हाथ में होगी. एक समय था जब बिहार की राजनीति में जेडीयू निर्णायक भूमिका निभाती थी, लेकिन अब भाजपा लगातार अपने संगठन और वोट बैंक के दम पर बड़े भाई की भूमिका में खड़ी नजर आ रही है. 

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बदला सीन
2014 के बाद से बीजेपी ने बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं (जैसे उज्ज्वला, मुफ्त राशन, पीएम आवास) के दम पर अपना एक स्वतंत्र वोट बैंक तैयार किया। इसने बीजेपी की निर्भरता नीतीश कुमार के 'सुशासन' वाले वोट बैंक पर कम कर दी.

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बीजेपी ने बिहार के जमीनी स्तर (बूथ स्तर) पर अपने संगठन को बहुत मजबूत किया. जबकि जेडीयू काफी हद तक नीतीश कुमार के चेहरे और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) पर निर्भर रही, बीजेपी ने सवर्णों के साथ-साथ पिछड़ों और दलितों के एक बड़े वर्ग में अपनी सेंधमारी कर खुद को मजबूत किया. 

नीतीश कुमार का बार-बार गठबंधन बदलना (पल्टी मारना) उनके 'सुशासन बाबू' वाले ब्रांड को कमजोर कर गया. इससे उनकी मोलभाव करने की शक्ति कम हुई, जबकि बीजेपी एक स्थिर और आक्रामक शक्ति के रूप में उभरी. इसी का नतीजा है कि नीतीश कुमार ने अपनी ही मर्जी से सीएम पद छोड़कर राज्यसभा जाने का ऐलान कर दिया और बीजेपी खुद बड़े भाई के रोल में आ गई.

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