'चीन जाते वक्त फोन छोड़ देता हूं, भारत साथ ले जाता हूं', US सीनेटर ने बताया भरोसे का फर्क

अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स ने कहा कि मैं चीन यात्रा के दौरान सुरक्षा कारणों से अपने साथ फोन नहीं ले जाता. वहीं, उन्होंने कहा कि भारत पर भरोसा है और साझेदारी मजबूत होनी चाहिए.

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भरोसे की कमी पर बोले अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स (Photo: ITG) भरोसे की कमी पर बोले अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:38 PM IST

अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स ने मंगलवार को चीन और भारत की अपनी यात्राओं के तरीकों में अंतर बताया. उन्होंने कहा कि चीन (बीजिंग) जाते वक्त वे भरोसे से जुड़ी चिंताओं की वजह से अपना फोन वॉशिंगटन में ही छोड़ देते हैं, लेकिन दिल्ली या भारत में कहीं और जाते वक्त उसे अपने साथ ले जाते हैं.

वॉशिंगटन में 'यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फॉरम लीडरशिप समिट' में बोलते हुए, मोंटाना के रिपब्लिकन सीनेटर ने इस उदाहरण का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अमेरिका को भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना चाहिए, क्योंकि वह चीन से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है.

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डेन्स ने कहा कि अमेरिका चीन से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता. इसके बजाय, उसे भरोसेमंद देशों के साथ संबंध मजबूत करते हुए रणनीतिक जोखिमों को कम करने पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस नजरिए में भारत की भूमिका अहम है और इंडिया-यूएस संबंध न सिर्फ इन दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी मायने रखते हैं.

'जब मैं दिल्ली या भारत...'

न्यूज एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, डेन्स ने कहा, "जब मैं चीन जाता हूं, तो यह फोन मेरे साथ बीजिंग नहीं जाता. यह वॉशिंगटन डीसी में मेरी डेस्क पर ही रहता है. जब मैं दिल्ली या भारत में कहीं भी जाता हूं, तो यह मेरे साथ होता है."

उन्होंने कहा कि यह उदाहरण भारत और अमेरिका के बीच गहरे भरोसे को दिखाता है. जब हम चीन के साथ चल रहे हालात के बारे में सोचते हैं, तो हमें भरोसेमंद साझीदार की जरूरत होती है."

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असल में, यह अविश्वास अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के दौरान भी साफ दिखा था. तब उन्होंने और उनकी टीम ने वॉशिंगटन डीसी लौटने वाली फ्लाइट में बैठने से पहले चीन से मिले सभी तोहफे और यादगार चीजें वहीं छोड़ दी थीं, जैसा कि पहले भी अमेरिकी डेलिगेशन करते रहे हैं.

सीनेटर ने आगे कहा कि चीन के मामले में वॉशिंगटन को इस बारे में साफ तौर पर सोचना चाहिए कि उसे कैसी साझेदारियां बनानी चाहिए. उन्होंने कहा, "हम चीन से पूरी तरह अलग नहीं हो सकते. हमें जुड़ना होगा और रिस्क कम करना होगा." इसके बाद उन्होंने सवाल किया कि मजबूत रणनीतिक साझेदारियां बनाने के लिए अमेरिका को कौन से सक्रिय कदम उठाने चाहिए. डेन्स के मुताबिक, इसका जवाब भारत में है.

'भारत ही एकमात्र ऐसा देश है...'

डेन्स ने कहा कि अमेरिका के साथ काम करने के मामले में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जो चीन के बराबर स्तर पर मुकाबला कर सकता है. एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा, "दुनिया में सिर्फ एक ही देश है, जो चीन के इनोवेशन इकोसिस्टम के आकार और स्तर की बराबरी कर सकता है और वह है अमेरिका के साथ काम करने वाला भारत."

उन्होंने आगे कहा कि ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करने के लिए जरूरी स्तर हासिल करने का एकमात्र व्यावहारिक तरीका भारत-अमेरिका साझेदारी ही है. डेन्स ने कहा, "ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करने और जरूरी स्तर हासिल करने के लिए हमारे पास सिर्फ एक उम्मीद भारत और अमेरिका की साझेदारी ही है."

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FedEx के प्रेसिडेंट और CEO राज सुब्रमण्यम के साथ बातचीत के दौरान, डेन्स ने यह भी कहा कि वॉशिंगटन अक्सर चीन से मिलने वाली चुनौती के बारे में तो बात करता है, लेकिन इस बात पर पूरी तरह से नहीं सोचता कि संतुलन बनाने के लिए किन रिश्तों को मजबूत करने की जरूरत है.

उन्होंने कहा, "हम यहां वॉशिंगटन में चीन से जुड़ी चुनौतियों के बारे में तो बहुत बात करते हैं, लेकिन हमने असल में इस बात पर कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई है कि आगे क्या करना है. चीन के मुकाबले के लिए हमें किस रिश्ते को और मजबूत करने की जरूरत है?"

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डेन्स ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच का रिश्ता सिर्फ दोनों देशों के आपसी संबंधों से कहीं ज्यादा अहम है. उन्होंने कहा, "अमेरिका और भारत के बीच जो रिश्ता है, वह सिर्फ हमारे दोनों देशों के लिए ही अहम नहीं है. मुझे लगता है कि यह पूरी दुनिया के लिए भी अहम है."

यह बात उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने की अपनी कोशिशों के लिए USISPF पब्लिक सर्विस अवॉर्ड मिलने के दौरान कही. इस सम्मान के लिए चुने गए अमेरिकी सीनेटर मार्क वार्नर इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके.

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