चूक या टार्गेट... ईरान के मीनाब में गर्ल्स स्कूल पर हमले के पीछे क्या?

ईरान के मीनाब में एक गर्ल्स स्कूल पर हुए अमेरिकी हमले को लेकर सवाल उठ रहे हैं. अमेरिका का कहना है कि अभी इसकी जांच चल रही है. वहीं, सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक यह परिसर एक सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर था.

Advertisement
मीनाब के गर्ल्स स्कूल पर हमले को लेकर उठ रहे सवाल (Photo: West Asia News Agency/Handout via Reuters) मीनाब के गर्ल्स स्कूल पर हमले को लेकर उठ रहे सवाल (Photo: West Asia News Agency/Handout via Reuters)

बिदिशा साहा

  • नई दिल्ली,
  • 06 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:12 PM IST

अमेरिका और इजरायल ने ईरान के मीनाब शहर में गर्ल्स स्कूल पर हमला किया था. स्कूल पर हुए इस हमले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि जिस स्कूल को निशाना बनाया गया, वह पास स्थित ईरानी सेना के कंपाउंड से हटकर था. इसे लेकर सोशल मीडिया पर कई थ्योरीज चल रही हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में  ऑनलाइन चल रही कई थ्योरी को खारिज किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक मीनाब के स्कूल परिसर पर जो मिसाइल गिरी, वह एक सटीक निशाना लगाने वाली स्ट्राइक थी. अमेरिका ने जारी युद्ध के दौरान कई जगह ऐसा किया है. अमेरिकी वायुसेना में रह चुके राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक वेस जे ब्रयांट (Wes J Bryant) के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि सैटेलाइट तस्वीरों में दिख रही सटीक तबाही किसी ऐसी मिसाइल से नहीं हो सकती, जो निशाना चूक गई हो.

Advertisement

इंडिया टुडे की ओपन सोर्स इंटेलिजेंस टीम ने पुराने सैटेलाइट चित्रों की जांच की. इसमें सामने आया कि यह गर्ल्स स्कूल पहले 2013 तक एक सैन्य परिसर के भीतर था. बाद में इसे नागरिक उपयोग के लिए सैन्य परिसर से अलग कर दिया गया. साल 2013 के बाद की सैटेलाइट तस्वीरों में स्कूल के चारों ओर दीवारें, सड़कें और अलग प्रवेश द्वार बनाए जाने के सबूत दिखाई देते हैं.

इजरायल का कहना है कि उसे ईरान के उस इलाके में किसी इजरायली ऑपरेशन की जानकारी नहीं है. वहीं अमेरिका ने कहा है कि इस मामले की जांच चल रही है. पिछले 24 घंटों में तेहरान के पास दो और स्कूलों पर इसी तरह के सटीक हमले हुए. सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो को इंडिया टुडे ने जियोलोकेट कर इसकी पुष्टि की.

Advertisement

गूगल अर्थ और मैक्सर की पुरानी सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार शाजरेह तय्येबेह गर्ल्स एलिमेंटरी स्कूल साल 2013 तक एक सैन्य परिसर के भीतर था. उस समय स्कूल की इमारत और आसपास का इलाका सैन्य परिसर का ही हिस्सा था. पूरे परिसर में एक ही मुख्य प्रवेश द्वार था और अंदर की सड़कें सभी इमारतों को जोड़ती थीं.

सैन्य ठिकानों के भीतर या आसपास स्कूल होना कोई नई बात नहीं है. कई देशों में सैनिक परिवारों की सुविधा के लिए ऐसे स्कूल बनाए जाते हैं. भारत सहित कई देशों में भी सैन्य परिसर के भीतर या पास स्कूल मौजूद हैं, जहां सशस्त्र बलों के जवानों और अधिकारियों के बच्चों की पढ़ाई होती है.

पूरे परिसर में छह मुख्य इमारतें थीं, जिनमें से पांच पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं. केवल एक फार्मेसी बची है, जो एक साल पहले बनाई गई थी. सितंबर 2016 की सैटेलाइट तस्वीरों में पहली बार अंदर की ओर नई दीवारें बनती दिखती हैं. फरवरी 2018 की तस्वीरों में स्कूल को सैन्य परिसर से अलग करने वाली दीवारें पूरी तरह बनी हुई दिखाई देती हैं.

साल 2018 की तस्वीरों में स्कूल के लिए अलग प्रवेश द्वार भी दिखाई देते है. वहां से वाहन आते-जाते भी देखे गए. स्कूल की दीवारों को चमकीले नीले रंग से रंगा गया था. बाद में सोशल मीडिया पर आए वीडियो में भी रंग-बिरंगी दीवारें और बच्चों के लिए बनाए गए चित्र दिखाई देते हैं.

Advertisement

सोशल मीडिया पर सामने आए भरोसेमंद वीडियो में माता-पिता और परिजन मलबे में घायलों और मृतकों को खोजते दिखाई देते हैं. स्कूल की इमारत पूरी तरह मलबे में बदल चुकी है.

इन सभी सबूतों से यह साफ होता है कि यह इमारत सैन्य परिसर से अलग एक प्राथमिक स्कूल के रूप में चल रही थी और यह सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा थी.

हमले के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की थ्योरी सामने आईं. कुछ लोगों ने इसे टार्गेट से चूक गई मिसाइल बताया और कुछ ने कहा कि यह ईरान की अपनी मिसाइल का असर हो सकता है. लेकिन सैटेलाइट तस्वीरें और पश्चिमी मीडिया की जांच रिपोर्ट्स इन दावों से अलग तस्वीर दिखाते हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार यह एक सटीक हमला था. उसी समय अमेरिका क्षेत्र में कई सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा था, जिनमें स्कूल के पास स्थित इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) का नौसैनिक बेस भी शामिल था. ये हमले रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (जलडमरू मध्य) से करीब 10 किलोमीटर दूर हुए.

विश्लेषक वेस जे ब्रयांट ने कहा है कि यह गलत पहचान का मामला भी हो सकता है. यानी हमला करने वाली सेना को यह पता नहीं रहा हो कि वहां बड़ी संख्या में नागरिक मौजूद हैं. अमेरिका ने अभी तक इस मामले पर चुप्पी बनाए रखी है और कहा है कि जांच जारी है. इजरायल ने भी इस घटना में किसी भी तरह की जानकारी या भूमिका से इनकार किया है.

Advertisement

हालांकि, बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या गलत खुफिया जानकारी के आधार पर मिसाइल दागी गई और सैन्य लक्ष्य समझकर नागरिक ढांचे को निशाना बना दिया गया.

मीनाब हमले के बाद तेहरान के पास दो और स्कूलों पर भी हमले हुए. 28 फरवरी को हुए हमले के बाद अमेरिका-इजरायल के हमलों में तेहरान के पास स्थित शाहिद बहोनार मिडिल स्कूल और एरियन पौया स्कूल, परंद भी निशाने पर आए.

इंडिया टुडे की ओर से जियोलोकेट की गई सैटेलाइट तस्वीरों में ये स्कूल एक संचार टावर और आसपास के शहरी इलाकों के पास स्थित दिखते हैं. हालांकि इन हमलों में किसी के मारे जाने या घायल होने की पुष्टि नहीं हुई है. सोशल मीडिया पर साझा वीडियो में पास के कैफे इलाके से धुआं उठता दिखाई देता है.

तीनों हमलों में एक समान बात सामने आई है कि सभी स्कूल सैन्य परिसरों के नजदीक स्थित थे. हालांकि अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि इन्हें किस आधार पर निशाना बनाया गया. हमलों की वजह और उनके नतीजे दोनों ही अभी स्पष्ट नहीं हैं.

अगर वास्तव में स्कूल पर हमला अमेरिका ने किया था, तो क्या यह पुरानी खुफिया जानकारी के कारण हुआ या फिर यह एक बड़ी गलती थी, यह सवाल अब भी बना हुआ है.

Advertisement

(विजयेश तिवारी के इनपुट के साथ)

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »