फ्रांस की राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में शुरू हुआ छात्रों का विरोध प्रदर्शन अब पूरे देश में फैल गया है. खराब स्कूल व्यवस्था, शिक्षकों की कमी, बड़ी कक्षाओं और सरकार की बजट कटौती की योजनाओं को लेकर छात्र सड़कों पर हैं. प्रदर्शन के दौरान कई जगह पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हुई है. अब सरकार के सामने कानून-व्यवस्था संभालने के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने की चुनौती भी है.
ताजा जानकारी के मुताबिक, फ्रांस में सोमवार को करीब 400 से 500 हाई स्कूलों को पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद रखने की तैयारी है. शिक्षा मंत्री एडुआर जॉफ्रे ने कहा कि कई स्कूलों में सुरक्षा की स्थिति अभी सामान्य नहीं हुई है. उनका कहना है कि स्कूलों को बंद करने का फैसला छात्रों और कर्मचारियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.
पेरिस के गरीब इलाकों से शुरू हुआ आंदोलन
यह आंदोलन सितंबर के मध्य में पेरिस के आसपास के गरीब इलाकों से शुरू हुआ था. खासतौर पर 'सीन-सेंट-डेनिस' जैसे इलाकों के छात्रों ने स्कूलों की खराब स्थिति को लेकर आवाज उठाई. छात्रों का कहना है कि कई स्कूलों में जरूरत के मुताबिक शिक्षक नहीं हैं. कई कक्षाओं में छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा है और कुछ स्कूलों की इमारतें भी खराब हालत में हैं.
पेरिस के उत्तर में स्थित 'ऑबर्विलियर्स' जैसे इलाकों के छात्रों ने कहा कि उन्हें अमीर इलाकों के छात्रों के मुकाबले कम सुविधाएं मिल रही हैं. कुछ छात्रों ने यह भी शिकायत की है कि शिक्षकों की कमी के कारण पूरे विषय की पढ़ाई नहीं हो पाती और इसके बावजूद उनसे परीक्षाओं में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है.
1,200 से ज्यादा स्कूलों तक पहुंचा विरोध
कुछ ही दिनों में यह आंदोलन पेरिस से निकलकर फ्रांस के दूसरे शहरों तक पहुंच गया. इस सप्ताह 1,200 से ज्यादा हाई स्कूलों में विरोध या प्रदर्शन देखने को मिला. छात्रों ने कई जगह स्कूलों के गेट बंद कर दिए और कक्षाओं को रोकने की कोशिश की. शुक्रवार को करीब 400 स्कूल बंद थे, जबकि 560 स्कूलों में प्रदर्शन या अन्य तरह की गतिविधियों के कारण पढ़ाई प्रभावित हुई.
कुछ जगह छात्रों ने सड़क पर आगजनी की और पुलिस के साथ झड़प भी हुई. पेरिस के कुछ स्कूलों के प्रवेश द्वारों के पास आग लगने की घटनाएं भी सामने आईं.
पुलिस से झड़प और हजारों गिरफ्तारियां
प्रदर्शन का एक बड़ा हिस्सा अब हिंसा में बदलता दिखाई दे रहा है. कई शहरों में पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया. कुछ जगह छात्रों और पुलिस के बीच पत्थरबाजी और आगजनी की घटनाएं हुईं. पुलिस ने हजारों लोगों को गिरफ्तार किया है. अधिकारियों ने प्रदर्शन में हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं पर चिंता जताई है.
पेरिस के पुलिस प्रमुख ने 3 अक्टूबर को कहा कि छात्र आंदोलन नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है और प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने की अपील की. हालांकि, छात्रों और उनके समर्थकों का कहना है कि सरकार उनकी मूल समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है. उनका तर्क है कि अगर स्कूलों में शिक्षक, जरूरी सुविधाएं और पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे तो छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होगी.
सिर्फ शिक्षा नहीं, बजट भी बड़ा मुद्दा
फ्रांस में चल रहा यह आंदोलन ऐसे समय में तेज हुआ है जब सरकार ने 2027 के बजट में खर्च कम करने की योजना पेश की है. सरकार आर्थिक घाटे को नियंत्रित करना चाहती है, लेकिन बजट कटौती को लेकर कर्मचारियों, यूनियनों और छात्रों में नाराजगी है. 30 सितंबर को सरकारी कर्मचारियों ने भी वेतन और बजट कटौती के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन किया था.
इसमें शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, दमकल कर्मचारी और दूसरे सरकारी कर्मचारी शामिल हुए. यूनियनों ने देशभर में करीब 3 लाख लोगों के शामिल होने का दावा किया था, जबकि पेरिस में पुलिस ने संख्या करीब 30 हजार बताई थी.
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सरकार पर दोहरा दबाव
अब फ्रांस की सरकार पर दो तरफ से दबाव है. एक तरफ छात्रों और शिक्षकों की मांग है कि स्कूलों में ज्यादा संसाधन, शिक्षक और बेहतर सुविधाएं दी जाए. दूसरी तरफ सरकार को बढ़ते बजट घाटे को कम करने के लिए खर्च में कटौती करनी पड़ रही है. सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ कदम उठाने का संकेत दिया है, लेकिन प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि अभी तक घोषित उपाय उनकी समस्याओं के लिए पर्याप्त नहीं हैं.
इसी वजह से प्रदर्शनकारियों ने आने वाले दिनों में फिर बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है. इस बीच फ्रांस की आर्थिक स्थिति भी दबाव में है. सोमवार को यूरो डॉलर के मुकाबले 17 महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. निवेशकों की चिंता फ्रांस के बढ़ते कर्ज, बजट संकट और राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर है.
यानी पेरिस में शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब केवल स्कूलों की समस्या नहीं रह गया है. यह फ्रांस की शिक्षा व्यवस्था, सरकारी खर्च, बजट नीति और राजनीतिक असंतोष से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है. आने वाले दिनों में अगर छात्रों के साथ सरकारी कर्मचारी और यूनियन भी बड़े स्तर पर सड़कों पर उतरते हैं, तो सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है.
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