नेपाल में आई आपदा के बाद चारों तरफ चीख-पुकार और अपनों की तलाश का सिलसिला जारी है. इस त्रासदी में अब तक 250 से ज्यादा लोगों की हो चुकी है, जबकि लगभग 1,500 लोग अब भी लापता हैं. इस बीच काठमांडू के अस्पताल के बाहर गुरुवार को लापता लोगों के परिजनों का तांता लगा रहा.
सैकड़ों लोग अपनों की एक खबर पाने के लिए अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं. लापता लोगों के नाम दर्ज कराने के लिए त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग हॉस्पिटल के बाहर जुटी भीड़ में शामिल सुबीना तमांग का दर्द झलक पड़ा.
अपने पति को ढूंढ रही सुबीना ने कहा, 'मेरी बस इतनी ही ख्वाहिश है कि मेरे पति सही-सलामत और एक पीस वापस मेरे पास आ जाएं. मुझे इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए.'
त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग हॉस्पिटल के उप निदेशक और प्रवक्ता गोपाल सेडैन ने बताया कि सड़कों के बह जाने और जमीनी संपर्क टूटने की वजह से मरीजों को सीधे हेलीकॉप्टर के जरिए अस्पताल लाया जा रहा है. उन्होंने कहा, 'अब तक अस्पताल में 31 घायलों को लाया गया है. अगर सड़क संपर्क बहाल होता, तो हमें और ज्यादा मरीजों के आने की उम्मीद थी. लेकिन देखते हैं कि आगे क्या स्थिति बनती है.'
लापता लोगों में 800 विदेशी नागरिक शामिल
नेपाली अधिकारियों के मुताबिक, लापता 1,500 लोगों में से लगभग 800 विदेशी नागरिक हैं. बुधवार को हिमालयी क्षेत्र में चट्टानों और मलबे का एक विशाल टीला सीधे नदी में आ गिरा था, जिसके बाद आई प्रचंड बाढ़ ने निचले इलाकों, कस्बों और घाटियों को तहस-नहस कर दिया.
कैसे आई ये आपदा?
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस आपदा की शुरुआत नेपाल की लांगटांग लिरुंग चोटी के उत्तरी ढलानों पर बड़े पैमाने पर हुए हिमस्खलन और चट्टान खिसकने से हुई. ये भारी मलबा तिब्बत की तरफ बहने वाली ल्हेंडे खोला नदी में जा गिरा, जिससे पानी का बहाव बेहद तेज हो गया.
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इस आपदा ने सीमा पार भारी तबाही मचाई है. बाढ़ के कारण कम से कम छह बड़े हाइड्रोपावर प्लांट और गीरोंग पोर्ट व्यापार केंद्र का बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो गया है. इसके अलावा, भारत की सीमा के करीब 100 किलोमीटर से ज्यादा निचले इलाके तक नदियों का रास्ता बदल गया है.
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